#96 सेवक वाली अगुवाई: बिना घमण्ड के अगुवाई करना
परिचय
अगुवाई और प्रभाव
जब आप पूछते हैं कि अगुवाई करने का क्या अर्थ है, तो आपके मन में क्या आता है?
अपनी कहूँ, तो विशेष रूप से वाशिंगटन डी.सी. में रहते हुए, मेरा ध्यान तुरन्त राजनीति की ओर चला जाता है। मैं उन लोगों के बारे में सोचता हूँ, जो शक्तिशाली राजनेताओं के लिए भाषण लिखते हैं, समाचार चैनलों पर दिखाई देते हैं, या सैकड़ों लोगों का प्रबंधन करते हैं। कुछ लोग विभिन्न विधेयकों का मसौदा तैयार करते हैं, संसार भर के देशों के साथ शान्ति संधियाँ करते हैं, और ऐसे निर्णय लेते हैं, जो लाखों लोगों के जीवन पर प्रभाव डालेंगे। परन्तु हो सकता है कि आपका ध्यान राजनेताओं की ओर न जाए। आप सोशल मीडिया पर उपस्थित लोगों के बारे में सोच सकते हैं। संसार के कई हिस्सों में, “इन्फ्लुएंसर” (प्रभाव डालने वाले) की उपाधि का महत्व किसी राजनेता या प्रोफेसर से कहीं अधिक होता है। अगुवाई के ये उदाहरण साबित करते हैं कि अगुवाई और प्रभाव कई रूप ले सकते हैं—और कभी-कभी वे अधिकार का प्रयोग करने वाले एक कठोर व्यक्ति की तरह दिखते हैं, और कभी-कभी वे ऐसे किसी व्यक्ति की तरह दिखते हैं, जिसके लाखों अनुयायी हैं।
परन्तु अगुवाई के केवल यही रूप नहीं हैं। सामान्य लोग (आप और मेरे जैसे सामान्य मसीही!) अपने आसपास के मित्रों और परिवार पर प्रभाव डालते हैं। मसीही अगुवाई केवल विशिष्ट वर्ग के लोगों के लिए ही आरक्षित नहीं है। यदि आप अभिभावक हैं, तो उन लोगों पर आपका प्रभाव छोटा (कम मात्रा में) परन्तु बहुत महत्वपूर्ण (अधिक गुणवत्ता में) होता है, जिनकी देखभाल के लिए परमेश्वर ने उन्हें आपको सौंपा है। हो सकता है कि आप अपनी कलीसिया में या अपने कार्यस्थल पर भी किसी अगुवाई के पद पर हों। भले ही वहाँ सैकड़ों लोग न हों, परन्तु रविवार की पाठशाला के एक शिक्षक, या एक सेवक अर्थात् डीकन, या एक सदस्य के रूप में आपकी भूमिका आपको अपने अधीन लोगों के बारे में सोचने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रेरित करती है। प्रभाव का आकार अलग-अलग हो सकता है, परन्तु चाहे वह वैश्विक हो या व्यक्तिगत्, उसका प्रभाव महत्वपूर्ण होता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो हम सभी प्रभाव डालते हैं। और हम सभी अगुवाई करते हैं।
“अगुवा कौन है?” जबकि इस प्रश्न का उत्तर हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है, परन्तु हम सभी उन परीक्षाओं और खतरों से परिचित हैं, जो अगुवों के पीछे-पीछे चलते हैं। प्रभाव का दुरुपयोग करने का सबसे स्पष्ट तरीका, घमण्ड के साथ और अपने निजी लाभ के लिए अगुवाई करना है। घमण्ड अधिकार को विकृत कर देता है। घमण्ड धीरे-धीरे, परन्तु निश्चित रूप से, अपने महत्व को बढ़ाता है और सेवक वाली अगुवाई का गला घोंट देता है। यह दूसरों को देने के बजाय अपने लिए लेता है; चंगा करने के बजाय यह घाव देता है; निर्माण करने के बजाय यह तोड़ डालता है।
दुर्भाग्य से, इस तरह की त्रासदी केवल सांसारिक अगुवों तक ही सीमित नहीं रहती। अधिकार का दुरुपयोग और घमण्डी अगुवे न केवल धर्मनिरपेक्ष संसार में पाए जाते हैं, बल्कि हमारी कलीसियाओं में भी यह बहुत अधिक फैले हुए हैं। पास्टर और अगुवे लगातार अपने प्रभाव का उपयोग करके अधार्मिकता से भरा लाभ उठाने के कारण सुर्खियों में रहते हैं। घमण्डी अगुवों से न केवल कलीसिया की बेंचें भरी हुई हैं, बल्कि घर भी भरे हुए हैं। यह दु:ख की बात है कि दुर्व्यवहार अब बहुत आम हो गया है, क्योंकि पति-पत्नी या माता-पिता यह गलत समझ लेते हैं कि वे कौन हैं और परमेश्वर के द्वारा दिए गए अधिकार का गलत उपयोग करते हैं।
हममें से कोई भी अपने ऊपर बुरे अगुवे नहीं चाहता। और कौन चाहता है कि उसे डाँट-फटकार कर सिखाया जाए? कौन चाहता है कि उसे कोई भ्रष्ट प्रोफेसर पढ़ाए? कौन ऐसे पति या पत्नी के पास घर जाना चाहता है, जो उसकी बात न सुने?
और आपका क्या? चाहे आप पास्टर हों, माता-पिता हों, या किसी कम्पनी के अध्यक्ष हों, हम सभी को इस बारे में मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि अपने प्रभाव का सही उपयोग कैसे करें, बिना घमण्ड के अगुवाई कैसे करें, और विनम्रता से दूसरों की सेवा कैसे करें। हमें यह जानने की आवश्यकता है कि एक उत्तम अगुवा कैसे बनते हैं। इसलिए, हम ऐसा कैसे कर सकते हैं, जिससे परमेश्वर की महिमा हो?
अगुवाई के बारे में बाइबल की आयतों और अपने आसपास के उदाहरणों से प्रेरणा लेते हुए, मैं आपको अगुवाई के तीन ऐसे गुण दिखाना चाहता हूँ, जो धार्मिकता से भरे हुए अगुवों की विशेषताएँ हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि और भी कई गुण गिनाए जा सकते हैं। परन्तु मैं अच्छे अगुवों की इन तीन गुणों पर इसलिए ध्यान दे रहा हूँ, क्योंकि मेरे जीवन में जो आत्मिक अगुवाई है, उनमें ये गुण सबसे स्पष्ट दिखाई देते हैं। ये कोई ऐसे-वैसे गुण नहीं हैं; मुझे उन धार्मिकता से भरे अगुवों के नाम और चेहरे याद आते हैं, जो अपने जीवन से उन बातों का उदाहरण पेश करते हैं, जिनकी चर्चा हम करने वाले हैं।
तो वे गुण कौन से हैं? सबसे पहले, हम देखेंगे कि विनम्र अगुवे परमेश्वर में, और विशेष रूप से, उसके वचन से उसके बारे में सीखकर आनन्द पाते हैं। इसके बाद, धार्मिकता से भरे हुए अगुवे स्वयं को स्थिर रखते हैं और परमेश्वर की कलीसिया के प्रति समर्पित रहते हैं। और अन्त में, वे जीवन के हर क्षेत्र और हर पहलू में, जिसमें दु:ख उठाना भी शामिल है, परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा रखते हैं।
उसका वचन, उसकी कलीसिया, और उसका प्रबन्ध
यह मार्गदर्शिका जल्दी वाले सुझावों या किसी सांसारिक, परिस्थितिजन्य अगुवाई वाले उदाहरण पर आधारित नहीं है। असल में, एक विनम्र अगुवा बनने का कोई भी जल्दी वाला तरीका नहीं है। एक अगुवा धीरे-धीरे निखरता है और उन्हें सुदृढ़ बनाने वाली परीक्षाओं के द्वारा परखा जाता है, जो न केवल उन्हें कठोर त्वचा, बल्कि एक कोमल हृदय भी प्रदान करेंगी। अपने प्रभाव का सही उपयोग करने के लिए परमेश्वर-केन्द्रित बुद्धि, और वातावरण, और निर्भरता की आवश्यकता होती है। मैं आशा करता हूँ कि इस मार्गदर्शिका के अन्त तक, आप यह देख सकेंगे कि अपने प्रभाव का सही उपयोग करना और बिना घमण्ड के अगुवाई करना, हमारे पास स्वाभाविक रूप से नहीं आता। हम केवल तभी धार्मिकता से भरे तरीके से अगुवाई कर सकते हैं, जब हम प्रभु में आनन्द मनाएँ, उसके अधीन रहें और उस पर भरोसा रखें।
—
चर्चा के लिए प्रश्न:
- आप किन क्षेत्रों में अपने प्रभाव को काम करते हुए देख पा रहे हैं?
- प्रभाव के कुछ अच्छे/बुरे उदाहरण कौन से हैं?
- आरम्भ करने से पहले, धार्मिकता से भरी अगुवाई की कुछ अन्य बुनियादें कौन सी हैं?
—
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#96 सेवक वाली अगुवाई: बिना घमण्ड के अगुवाई करना
भाग I: परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
इन दिनों आप किस बात का आनन्द ले रहे हैं?
हाल के दिनों में, मुझे एक प्याला बढ़िया कॉफी बनाने में आनन्द आ रहा है। मैं पानी को ठीक उसी तापमान तक उबालता हूँ, जितना मुझे चाहिए, और अपनी नयी हल्की भुनी हुई बीन्स को ग्राइंडर में डालकर, सही समय पर, सही मात्रा में पानी मिलाता हूँ। जब वह प्याला मेरी पसन्द के अनुसार नहीं बनता, तो मेरी पत्नी मुझे यूट्यूब से उसे बेहतर बनाने के वीडियो देखते हुए पकड़ लेती है।
परन्तु केवल यही बात नहीं है, जिसका मैं आनन्द लेता हूँ। मुझे दूसरे लोगों के साथ कॉफी के बारे में बात करना बहुत पसन्द है। इसलिए, एक शनिवार को, मैंने अपने कुछ मित्रों को अपने घर बुलाया और कॉफी चखने की एक अनौपचारिक प्रतियोगिता रखी। हमने एक दूसरे को दिखाया कि हम एक प्याला कॉफी कैसे बनाते हैं। मेरे मित्रों ने बताया कि उन्होंने कौन सी कॉफी बीन्स खरीदीं, वे घर पर अपनी कॉफी कैसे बनाते रहे हैं, और वे किस तरह के स्वाद निकाल पाने में सक्षम हुए हैं।
कॉफी बनाना केवल कॉफी के बारे में नहीं है। हाँ, मुझे कैफीन की आवश्यकता होती है! परन्तु जिस बात की मैं सच में सराहना करता हूँ, वह अच्छी कारीगरी और इसके बारे में बात करके और दूसरों के साथ इसका आनन्द उठाकर मित्रता और संगति बनाना है।
अत:, आजकल आप किस बात का आनन्द ले रहे हैं? यह महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि जिस बात का हम आनन्द लेते हैं, वह यह दिखाती और तय करती है कि हम कौन हैं। जैसे अच्छी तरह से बना हुआ एक प्याला अच्छे स्वाद और कारीगरी के लिए मेरी सराहना करवाता है, वैसे ही जिस बात का आप आनन्द लेते हैं, वह दिखाता है कि आप किस बात की सराहना करते हैं और किसे महत्व देते हैं। हो सकता है कि आपको अलग-अलग तरह का खाना पसन्द हो, और यह अलग-अलग संस्कृतियों के बारे में जानने और उनकी विविधता की आपकी सराहना की ओर संकेत करता है। और जैसे अच्छी कॉफी मुझे बातें कहने-सुनने के अवसर ढूँढ़ने के लिए प्रेरित करती है, वैसे ही जिस बात की आप बड़ाई करते हैं, वह आपके धन, समय और दैनिक जीवन को प्रेरित करेगी।
तो फिर, प्रभाव का सही उपयोग करने से इसका क्या सम्बन्ध है? जिन लोगों पर अगुवाई करने की जिम्मेदारी होती है, उनके लिए एक लगातार बना रहने वाला खतरा यह है कि वे इस बात के ही प्रेमी हो जाते हैं कि सच में दूसरों पर हमारा प्रभाव पड़ता है! यह परीक्षा आम भी है और गम्भीर भी है। यह आम इसलिए है, क्योंकि हम सभी नियंत्रण रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि लोग हमें पहचानें। हम सभी वह व्यक्ति बनना चाहते हैं, जिसकी बात सुनने के लिए दूसरे लोग आते हैं। परन्तु यह गम्भीर इसलिए भी है, क्योंकि केवल प्रभाव डालने से प्रेम करना अन्त में हमें अंधा बना देता है। यह प्रभाव डालने के खतरनाक उपयोग की ओर ले जाता है, और यदि इसे रोका न जाए, तो हम अपने अधीन आने वाले लोगों को नियंत्रित करने, उनके साथ हेराफेरी करने और उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करने लगते हैं।
यही परीक्षा यीशु के दिनों के पापी धार्मिक अगुवों की विशेषता थी, जो हमें अगुवाई के ऐसे नकारात्मक उदाहरण देती है, जिनसे हमें बचना चाहिए।
वे [फरीसी] अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं : वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं। भोज में मुख्य–मुख्य स्थान, और सभा में मुख्य–मुख्य आसन, बाजारों में नमस्कार, और मनुष्य में रब्बी कहलाना उन्हें भाता है… हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो! (मत्ती 23:5-7, 23-24)।
यदि हम अपने प्रभाव का सही उपयोग धार्मिकता से भरे तरीके से करना चाहते हैं और सच्ची मसीही अगुवाई का अभ्यास करना चाहते हैं, तो हमें अपने आप से भी बड़ी किसी बात का आनन्द लेना होगा। हमें अपनी पसन्द-नापसन्द को बदलने की आवश्यकता होगी, ताकि हम उस आनन्द की लालसा करें, जो हमारे बाहर से आता है। और उस आनन्द का मुख्य स्रोत परमेश्वर का वचन है। हम मसीह से सम्बन्धित होने से मिलने वाले आनन्द को याद करके अच्छी अगुवाई कर सकते हैं। जब पवित्रशास्त्र हमारा सामना करता है, तो हम अपने घमण्ड से लड़ पाते हैं और पवित्रशास्त्र के अधीन हो जाते हैं। इस अध्याय के बाकी हिस्से में हम इसी बारे में बात करेंगे कि: जब हम परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं, तो हम उसका आनन्द लेते हैं।
अध्ययन करते समय परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
सबसे पहली बात, परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने से उसमें हमारा आनन्द बढ़ जाता है। वह चाहे उन नयी बातों को सीखना हो, जो हमने पहले कभी नहीं देखीं, या उन सच्चाइयों को याद करना हो, जिन्हें हम लम्बे समय से जानते हैं, और परमेश्वर के वचन का अध्ययन ही वह चाबी है, जो पवित्रशास्त्र के पन्नों में छिपे आनन्द को खोलती है। परन्तु विनम्र अगुवाई और बिना घमण्ड के अगुवाई करने के लिए कौन से आनन्द सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं?
जब हम पवित्रशास्त्र का अध्ययन करते हैं, तो हमें विशेष रूप से यह याद दिलाया जाता है कि हम मसीह के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के कारण ही धर्मी और निर्दोष ठहराए गए हैं। कोई भी काम—जिसमें दूसरों के सामने अगुवाई के प्रभावशाली गुण या विनम्रता दिखाना शामिल है—हमें हमारे पापों से नहीं बचा सकता। “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफि. 2:8-9)।
हमें न केवल न्यायी परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया गया है, बल्कि हमें पिता परमेश्वर के परिवार में भी गोद ले लिया गया है। एक पास्टर ने ऐसा कहा, “जब परमेश्वर आपको निर्दोष ठहराने के लिए अपना हथौड़ा बजाता है, तो साथ ही वह आपको अपनी सन्तान बनाने के लिए गोद लेने का एक कागज भी थमा देता है।” पौलुस हमें बताता है कि गोद लिए जाने का यह सिद्धान्त परमेश्वर के हमारे प्रति अनन्त और अपनी स्वेच्छा से किए गए प्रेम का एक प्रमाण है। हमने इसके योग्य होने के लिए कुछ भी नहीं किया था, परन्तु उसकी सन्तान होने के लिए परमेश्वर ने “अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिये पहले से ठहराया” (इफि. 1:5-6)। बाइबल अपने हर पन्ने पर, हम जैसे पापियों के लिए परमेश्वर की असीम, विशाल और भरपूर दया की बात करती है। भले ही हम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे, फिर भी परमेश्वर ने हमारा उद्धार इसलिए किया, क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है।
तो फिर, धर्मी ठहराए जाने और गोद लिए जाने का आत्मिक अगुवाई और घमण्ड से क्या सम्बन्ध है? ये दोनों सिद्धान्त हमारे भीतर से हर तरह के घमण्ड को मिटा देते हैं, क्योंकि ये हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर की सन्तान कहलाने योग्य बनने के लिए हमने कुछ भी नहीं किया है। हमें यह जानकर आनन्द मिलता है कि मसीह में हमारी जो भी स्थिति और दर्जा है, वह हमें मुफ्त में इसलिए दिया गया है, क्योंकि वह हमसे बहुतायत से प्रेम करता है। और यही आनन्द विनम्रता की ओर ले जाता है, क्योंकि यह दिखाता है कि हमारी सबसे बड़ी दुविधा का समाधान हो चुका है — जो कि हमारे पापों से क्षमा किए जाने की आवश्यकता है।
इसके साथ ही, ये सिद्धान्त हमें बड़ाई और आलोचना, दोनों का सामना करने के लिए अगुवों के तौर पर मजबूत भी बनाते हैं। ऐसा कैसे होता है? क्योंकि वे हमें याद दिलाते हैं कि हमें इस जगत के परमेश्वर ने स्वीकार किया है और हमारी पुष्टि की है। यदि हम मनुष्यों की राय से प्रभावित नहीं होना चाहते, तो हमें बाइबल तथा अगुवाई के बीच के महत्वपूर्ण जुड़ाव को समझते हुए, परमेश्वर के वचन की दृढ़ नींव पर खड़ा होना होगा। मनुष्यों की बड़ाई की लत लग जाती है। यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो आप परमेश्वर को नहीं, बल्कि मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए जीवन जीएँगे। तो फिर, हमें यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर हमारे बारे में जो कहता है, वही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
जब बाइबल स्पष्ट रूप से यह सबसे बड़ा सुसमाचार बताती है कि परमेश्वर ने हमें धर्मी ठहराया है और गोद लिया है, तो इसकी सही प्रतिक्रिया यही है कि हम इसमें आनन्द मनाएँ। मुझे हैरानी होती है कि क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो परमेश्वर के सुसमाचार से आनन्दित होते हैं? भले ही वे अगुवे हों, परन्तु उनके लिए सबसे अधिक यह मायने नहीं रखता कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं, बल्कि अन्त में यह मायने रखता है कि परमेश्वर उनके बारे में क्या सोचता है। वे अपने जीवन में सुसमाचार की सच्चाई का अनुभव करके इतने विनम्र और आनन्दित होते हैं कि वे आलोचना और बड़ाई, दोनों को स्वीकार कर पाने में सक्षम होते हैं। वे धार्मिकता से भरी अगुवाई का उदाहरण पेश करते हुए अपने प्रभाव का सही उपयोग कर पाने में सक्षम होते हैं, क्योंकि उनकी पहचान इससे नहीं बनती कि वे क्या करते हैं, बल्कि इससे बनती है कि वे कौन हैं।
जबकि पवित्रशास्त्र का अध्ययन करने से हमें आनन्द मिल सकता है, परन्तु भरपूर आनन्द का अनुभव करने के लिए हम एक और कदम उठा सकते हैं। यदि हम सचमुच परमेश्वर के वचन से प्रभावित होना चाहते हैं, तो हमें न केवल उसका अध्ययन करना है, बल्कि उसके अधीन भी रहना है। जब हम बाइबल में अगुवाई पर ध्यान देते हैं, तो यह एक लगातार दिखने वाला विषय है।
अधीन रहते हुए परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
अधिकांश लोगों के लिए, आनन्द मनाना और अधीन रहना आमतौर पर एक साथ नहीं चलते। यदि आप किसी और के अधिकार के अधीन हैं, तो आप स्वतंत्र और प्रसन्न कैसे महसूस कर सकते हैं? यदि कुछ और नहीं, तो अधीनता आनन्द में रुकावट डालने वाली और उसे रोकने वाली लगती है। परन्तु मसीही अगुवाई में, हम जानते हैं कि सच्चा आनन्द किसी भी अधिकार से स्वतंत्र होने से नहीं मिलता; यह केवल परमेश्वर के द्वारा कही गई बातों के अधीन रहने से मिलता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो पवित्रशास्त्र के अधीन रहना ही उस आनन्द तक पहुँचने का एकमात्र तरीका है, जो हमें दूसरों की अच्छी तरह से अगुवाई करने में, अर्थात् उदाहरण के द्वारा सचमुच अगुवाई करने में सक्षम बनाता है। भजन संहिता 1 और 2 अध्यायों पर विचार करें। कई विद्वान अक्सर यह बताते हैं कि इन दोनों भजनों को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए1 और जबकि इस बात के कई कारण मिलते हैं, परन्तु एक ध्यान देने योग्य बात यह है कि सच्ची प्रसन्नता और आशीष पाने का तरीका यहोवा के निर्देशों पर मनन करना और उसके पुत्र के अधीन रहना है (भज. 1:1-2, 2:12)।
और यह प्रसन्नता केवल उस बारे में नहीं है, जिसका अनुभव हम स्वर्ग में करेंगे। नहीं, इसका अनुभव इस समय पर भी किया जा सकता है। यीशु के वचनों का पालन करना और उनके अधीन रहना आज भी आनन्द की ओर ले चलेगा, जब हम यीशु की भलाई का अनुभव करते हैं, चाहे वह हमें आशीष देने के रूप में हो या हमारी परीक्षाओं के समय हमें सहारा देने के रूप में हो। जॉन वेबस्टर लिखते हैं, “परमेश्वर की व्यवस्था का अर्थ… परमेश्वर के द्वारा हमारा पालन-पोषण करना है, जिसमें वह हमें मानवीय उत्कर्ष के सच्चे स्वरूप के बारे में सिखाता है। यदि हमें अस्तित्व में रहना है, और यदि हम फलना-फूलना चाहते हैं, तो इसका अर्थ यही है कि हम परमेश्वर की ओर से, उसके साथ और उसके अधीन रहकर आनन्दपूर्वक जीवन जीएँ।”2
और वह परमेश्वर कौन है, जिसके अधीन हम रहते हैं? वह कोई दूर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं है, जो बस यह बताता रहे कि हमें क्या करना है। वह अन्त में हमें यह दिखाता है कि उसके वचन के अधीन कैसे रहा जाए, क्योंकि उसने मानव-देह धारण करके हमारे बीच आने की विनम्रता दिखाई। हम एक सेवक-अगुवे के रूप में यीशु के अधीन रहते हैं, जो “इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे,” और जिसने अन्त में हम जैसे पापियों के लिए अपने प्राण त्याग दिए। हम उसकी सेवा करते हैं, जिसने हमारे प्रति विनम्रता दिखाई और “दास का स्वरूप धारण किया” (फिलि. 2:7), और जो बाइबल-आधारित सेवक वाली अगुवाई का एक उत्तम आदर्श है। हम इस बात को लेकर सुनिश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर के वचन का पालन करने में ही आनन्द मिलता है, क्योंकि स्वयं मसीह ने अपने पिता की इच्छा के अधीन रहकर हमारे लिए एक मार्ग प्रशस्त किया है।
क्या इस खण्ड को पढ़ते समय आपको कोई हैरानी हुई? “मुझे तो लगा था कि यह लेख बाइबल और सुसमाचार के बारे में नहीं, बल्कि सेवक वाली अगुवाई के उदाहरणों के बारे में होगा।” “मुझे मालूम है कि वे बातें महत्वपूर्ण हैं, परन्तु मुझे यह बताइए कि कलीसिया में या घर पर एक अच्छा अगुवा कैसे बना जाए!” हममें से बहुत से लोग यह सोचने की परीक्षा में पड़ जाते हैं कि हम एक बड़ा अगुवा बनने, अगुवाई के कौशल, कलीसिया के कामकाज और दल के प्रबन्धन के बारे में सांसारिक पुस्तकों से और भी अधिक सीख सकते हैं। इस सोच में कुछ सच्चाई तो है। हमें इन विषयों पर अच्छी पुस्तकों की आवश्यकता है, और मैं यह आशा भी करता हूँ कि यह छोटी-सी पुस्तिका भी आपके लिए सहायक होगी!
परन्तु, भजन संहिता 119 अध्याय में, लेखक यह घोषणा करता है कि उसके पास शत्रुओं से अधिक समझदारी और शिक्षकों से अधिक गूढ़ज्ञान इसलिए है, क्योंकि वह यहोवा के निर्देशों पर मनन करता है (भज. 119:98-99)। और वे निर्देश क्या थे? अधिकांश सम्भावना यही है कि जिन निर्देशों को वह संदर्भित कर रहा था, वे इस बात की याद दिलाने वाले थे कि परमेश्वर कौन है, और परमेश्वर के साथ वाचा में बंधे होने के नाते वे लोग कौन हैं, और जब वे परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो क्या होता है। उस भजनकार को किसी और बात से अधिक, बाइबल और अगुवाई के बीच के जुड़ाव की अधिक परवाह थी, अर्थात् परमेश्वर क्या कहना चाहता है।
हमें यह भी मानना चाहिए कि पवित्रशास्त्र हमें अगुवाई में विश्वास के बारे में भी सिखाता है, और यह सबसे पहले उस विषय के व्यावहारिक पहलू नहीं बताता, बल्कि हमें हमारी पहचान की याद दिलाता है। अगुवाई में प्रभाव का सही उपयोग करना और विनम्रता के साथ अगुवाई करना, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, केवल कौशल प्रबन्धन का नहीं, बल्कि आत्मिक विकास का परिणाम है। पवित्रशास्त्र हमें सुसमाचार के उस अनन्त आनन्द में डूबने और उसका भरपूर अनुभव करने की याद दिलाता है, जो हमें परमेश्वर की सन्तान बनने के रूप में दिखाता और गढ़ता है। वह आनन्द, और केवल वही आनन्द, एक विनम्र और प्रभावशाली अगुवे की नींव है।
—
चर्चा के लिए प्रश्न:
- आपके आनन्द का स्रोत क्या है? क्या यह कुछ ऐसा है, जिसे आप करते हैं, या जिसमें आप हैं? (लूका 10:20)
- आप वचन में परमेश्वर और अपने बारे में क्या सीख रहे हैं, और जैसे आप अपने आसपास के लोगों पर प्रभाव डालते हैं, इसका उस पर क्या असर पड़ रहा है?
- परमेश्वर आपको किन बातों के लिए सचेत कर रहा है या आपको सुधार रहा है, और जैसे आप अपने आसपास के लोगों पर प्रभाव डालते हैं, इसका उस पर क्या असर पड़ रहा है?
- कौन से दूसरे सिद्धान्त आपको अपने अधीन काम करने वालों का अगुवाई करने में सहायता कर सकते हैं? परमेश्वर के स्वरूप के सिद्धान्त के बारे में आपका क्या विचार है? या पाप के सिद्धान्त के बारे में आपका क्या विचार है?
—
भाग II: परमेश्वर की कलीसिया के प्रति समर्पित होना
मैं आपको तीन लोगों से मिलवाना चाहता हूँ।
पहला है जॉन। वह यीशु का अनुसरण करता है, परन्तु उसे संगठित धर्म में विशेष रुचि नहीं है। उसके विचार से कलीसिया की अगुवाई वाली भूमिकाओं के लोग अक्सर अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हैं। इसलिए, जॉन को लगता है कि वह रविवार के दिन कहीं सैर-सपाटे पर जाकर ही परमेश्वर की सबसे अच्छी आराधना करता है।
अगली लीएन है। उसे कलीसिया जाने में कोई समस्या नहीं है, परन्तु वह किसी एक कलीसिया के प्रति समर्पित होने के बजाय, हर सप्ताह एक कलीसिया से दूसरी कलीसिया में फुदकती रहती है। वह कुछ समय के लिए फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च जाती है, और फिर कुछ समय के लिए ग्रेस कैल्वरी चर्च में शामिल होने लगती है। लीएन हर रविवार को कलीसिया जाती है। बस एकमात्र समस्या यही है कि हर बार वह एक अलग ही कलीसिया में होती है।
और अन्त में मैट है। मैट को अपनी कलीसिया में होने वाला प्रचार बहुत पसन्द है, परन्तु उसके समाप्त होते ही वह तुरन्त वहाँ से निकल जाता है। उसे ऐसा महसूस नहीं होता कि उसे वहाँ के लोगों के साथ जुड़ने की कोई आवश्यकता है। उसे उसने क्यों जुड़ना चाहिए? क्या एक मसीही होने के नाते बाइबल और प्रचार ही सबसे महत्वपूर्ण बातें नहीं हैं? और चूँकि उसे प्रचार सुनने में आनन्द आता है, इसलिए उसने सच में कभी भी एक सदस्य के रूप में जुड़ने के बारे में नहीं सोचा। ऐसा करने से क्या हो जाएगा? ये सभी मनोवृत्तियाँ कलीसिया में अगुवाई के बड़े महत्व के बारे में एक गलतफहमी को दर्शाती हैं।
इन तीनों लोगों में कौन सी बात एक समान है? आरम्भ में, हमें भरोसा है कि वे सच्चे मसीही हैं। तीनों ही यीशु का अनुसरण करना और उससे प्रेम करना चाहते हैं। और फिर भी, उनमें एक और समानता यह है कि यीशु का अनुसरण करने का उनका प्रयास स्थानीय कलीसिया से कटा हुआ है। उनके तरीके वाली मसीहियत, पवित्रशास्त्र में दिखाए गए स्वरूप की तुलना में अधिक व्यक्तिवादी है।
परन्तु बाइबल मसीही जीवन को किस दृष्टि से देखती है? पुराने नियम से लेकर नये नियम तक, जब परमेश्वर किसी व्यक्ति का उद्धार करता है, तो वह उसे एक समुदाय में शामिल करके बचाता है। विश्वास हमेशा व्यक्तिगत् होता है, परन्तु कभी भी निजी नहीं होता। मसीही जीवन केवल आपके और यीशु के बीच का मामला नहीं है; यह अन्य विश्वासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बारे में है। इसलिए, चाहे आप अगुवे हों या न हों, परमेश्वर सभी मसीहियों को कलीसिया का हिस्सा बनने, और अपने विश्वास तथा अगुवाई को एक समुदाय के भीतर एकजुट करने की आज्ञा देता है।
परन्तु किसी कलीसिया में शामिल होने का, अपने प्रभाव का सही उपयोग करने से क्या सम्बन्ध है? इस खण्ड में, मैं यह दिखाने का प्रयास करूँगा कि कलीसिया स्वस्थ अगुवाई को बढ़ावा देती है, क्योंकि कलीसिया ही वह स्थान है, जहाँ स्वस्थ अगुवाई सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित होती है। विशेष रूप से, हम देखेंगे कि एक स्थानीय कलीसिया ही वह स्थान है, जहाँ विनम्र अगुवाई सिखाई जाती है और उसका उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। मुझे आशा है कि इस खण्ड के अन्त तक, आप यह समझ जाएँगे कि परमेश्वर की कलीसिया, उस मसीही अगुवाई को विकसित करने और बनाए रखने में महत्वपूर्ण है, जो आत्मा का फल उत्पन्न करती है।
सिखाई जाने वाली अगुवाई
जब मैं कहता हूँ कि एक स्थानीय कलीसिया में स्वस्थ अगुवाई सिखाई जाती है, तो इससे मेरा क्या अर्थ है? वैसे, इससे मेरा अर्थ यह है कि एक स्थानीय कलीसिया ही वह सटीक स्थान है, जहाँ मसीही लोग एक दूसरे के आत्मिक स्वास्थ्य के प्रति जवाबदेह बनकर, एक दूसरे को शिष्य बनाते हैं और जिसमें यह बात भी शामिल है कि आप अपने प्रभाव का सही उपयोग कैसे करते हैं। अगुवाई में जवाबदेही का मूल सार यही है। जिस तरह से आप—चाहे अपने परिवार में, व्यवसाय में, या विद्यालय में—अगुवाई करते हैं, वह अब दूसरों की सहायता के लिए एक खुली पुस्तक बन जाता है। बाइबल-आधारित अगुवाई अक्सर कलीसिया की सदस्यता के दौरान सिखाई और सुधारी जाती है।
कलीसिया की सदस्यता के बारे में एक पास्टर का यह कहना है: “बाइबल-आधारित सदस्यता का अर्थ जिम्मेदारी लेना होता है। यह जिम्मेदारी हमारे उन आपसी दायित्वों से उत्पन्न होती है, जिनका उल्लेख पवित्रशास्त्र के ‘एक दूसरे’ वाले सभी अंशों में किया गया है—एक दूसरे से प्रेम करो, एक दूसरे की सेवा करो, एक दूसरे को प्रोत्साहित करो।”3
लोग अक्सर इस जिम्मेदारी को सार्थक रिश्तों के रूप में देखते हैं, जहाँ लोग कलीसिया के अन्य सदस्यों से अच्छे आत्मिक प्रश्न पूछते हैं। यद्यपि, यह एक ऐसी जिम्मेदारी भी है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता और इसका अर्थ केवल प्रश्न पूछना नहीं, बल्कि अपने जीवन के बारे में भी सच्चा और खुला रहना है। किसी स्थानीय कलीसिया में अपने जीवन को सबके सामने खोलना और जवाबदेही को स्वीकार करना, इस बात का सबसे बेहतरीन संकेत है कि आप अगुवाई और विनम्रता के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ ऐसी मित्रता विकसित करना है, जो प्रोत्साहित करने और आलोचना करने के अवसर उत्पन्न करे।
मुझे याद है कि मैं कलीसिया के एक व्यक्ति नेट के साथ दोपहर के भोजन पर गया था। नेट काफी समय से यह देख रहा था कि मैं अपने बच्चों का पालन-पोषण कैसे करता हूँ, काम कैसे करता हूँ, और एक मसीही के तौर पर अपना जीवन कैसे जीता हूँ और मुझे उस पर पूरा भरोसा है कि वह प्रेमपूर्वक मेरे जीवन के बारे में मुझसे बात करेगा। अगुवाई में भरोसा—यहाँ तक कि अपने साथियों की अगुवाई में भी—इसी तरह की ईमानदारी और खुलेपन पर टिका होता है। और इसलिए मैंने उससे पूछा, “क्या आपको मेरे जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र दिखता है, जिसमें मुझे सुधार करने की आवश्यकता हो?” नेट ने कुछ मिनट सोचकर मुझे एक सुधार करने के लिए कहा। उसने बताया कि उसने मुझे कुछ संवेदनशील जानकारियों को जिस तरह से सम्भालते हुए देखा था, उसे कुछ लोग गपशप समझ सकते हैं। नेट एक दयालु व्यक्ति है, और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बिलकुल सही था। मुझे तुरन्त समझ आ गया कि वह किस बारे में बात कर रहा था, और मैंने उसकी बात मान ली—क्योंकि मैं उन निजी जानकारियों को ठीक से सम्भाल नहीं पाया था।
क्या आपके जीवन में भी नेट जैसा कोई मित्र है? कोई ऐसा सच्चा अगुवा, जो सच बोलने से थोड़ा भी न डरता हो?
नेट कलीसिया की उस वाचा को निभा रहा था, जिस पर मैंने और उसने उस समय हस्ताक्षर किए थे, जब हम सदस्य के रूप में हमारी कलीसिया से जुड़े थे। यदि आप भी मेरी कलीसिया के सदस्य बनना चाहते हैं, तो आपको भी उसी कलीसियाई वाचा पर हस्ताक्षर करने होंगे। कलीसिया के सभी सदस्यों के साथ, मैंने जो वादे किए थे, उनमें से एक यह भी था कि “हम एक-दूसरे की स्नेहपूर्वक देखभाल और निगरानी करेंगे, और जब भी अवसर मिलेगा, तो पूरी विश्वायसोग्यता के साथ एक-दूसरे को सलाह देंगे और अनुनय-विनय करेंगे।” कलीसिया की सदस्यता आपको यह अवसर देती है कि आप दूसरों को सिखाएँ और दूसरों से यह सीखें कि अगुवाई कैसे की जाती है। यह दूसरों को आपके जीवन के बारे में बात करने के लिए जगह देती है।
तो फिर, आपके जीवन में आपको दूसरों की राय कहाँ से मिलती है? और शायद इससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आपको अपने जीवन में किसी से कोई राय मिल भी रही है? क्या आपने स्वयं को यह सुनने से बन्द कर रखा है कि एक पिता या एक पति के रूप में आप कैसा कर रहे हैं? क्या आपके जीवन में ऐसे बड़े-बुज़ुर्ग हैं, जिनके पास आप अपने प्रश्नों के साथ या सुधार पाने के लिए जा सकें? जब कोई आपको सुधारता है, तो आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं? क्या आप रक्षात्मक हो जाते हैं, या बहाने बनाते हैं? केवल सांसारिक अगुवों के द्वारा ही यह विस्तृत रूप से स्वीकार नहीं किया गया कि रचनात्मक आलोचना बहुत महत्वपूर्ण होती है, बल्कि परमेश्वर के वचन में भी इसे स्वीकार किया गया है। नीतिवचन की पुस्तक कहती है: “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं परन्तु बैरी अधिक चुम्बन करता है” (नीति. 27:6)।
क्या आपके पास कोई ऐसा व्यक्ति है, जो सच बोलकर आपके प्रति विश्वासयोग्य रह सके? यदि आप अगुवाई का प्रदर्शन करना चाहते हैं, और एक अच्छा अगुवा बनना चाहते हैं, तो यह अति महत्वपूर्ण है! और यदि आपके पास कोई सच बोलने वाला व्यक्ति नहीं है, तो प्रार्थना करें! और प्रार्थना करें कि प्रभु आपके जीवन में किसी ऐसे व्यक्ति को लाए, जो आपको सच बताकर आपसे प्रेम करे और आपकी परवाह करे। शायद आपके लिए यह अधिक आसान हो कि कोई आपको यह न बताए कि आप घर पर अगुवाई कैसे कर रहे हैं, परन्तु यदि कोई ध्यान देने वाला और टिप्पणी करने वाला न हो, तो आपको कैसे पता चलेगा कि आप इसे सही से कर रहे हैं? प्रार्थना करने के बाद, विनती करें। अपने पास्टर से विनती करें कि वे आपको शिष्य बनाएँ। अपने पास्टर से विनती करें, कि क्या वे किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो दूसरों को शिष्य बनाना चाहता हो। अगुवाई में मार्गदर्शन की खोज करें।
एक खतरनाक झूठ जिस पर हम अपने बारे में विश्वास कर सकते हैं, वह यह है कि हमें जवाबदेही की आवश्यकता नहीं है, और हम इतने बुद्धिमान एवं चालाक हैं कि सब काम अपने आप कर सकते हैं। परन्तु जैसे नीतिवचन चेतावनी देता है, “विनाश से पहले गर्व, और ठोकर खाने से पहले घमण्ड आता है” (नीति. 16:18)। विनाश शायद तुरन्त न आए, परन्तु वह रास्ते में हो सकता है।
कलीसिया में न केवल अगुवाई करना सिखाया जाता है, बल्कि लगातार अगुवाई के उदाहरणों के माध्यम से इसे करके भी दिखाया जाता है।
अगुवाई का उदाहरण
जब प्रेरित पौलुस ने अपने मित्रों से कहा कि वे उसकी सी चाल चलें, तो वह घमण्डी या अहंकारी नहीं था (1 कुरि. 4:16, 11:1; फिलि. 3:17)। परमेश्वर ने मसीही जीवन को इस तरह से बनाया है कि जहाँ परिपक्व विश्वासियों को सबके सामने रखकर, अगुवाई के एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एक अगुवे के रूप में यीशु सबसे उत्तम उदाहरण है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। परन्तु बाइबल मसीहियों को यह भी प्रोत्साहन देती है कि वे ऐसे उदाहरणों के लिए अगुवों, और विशेष रूप से प्राचीनों की तरफ देखें, कि एक धार्मिकता से भरा, परिपक्व और स्थिर जीवन कैसा दिखता है। वे इस सच्चाई को साकार करते हुए विश्वासयोग्यता के साथ अगुवाई करने का प्रदर्शन करते हैं कि एक अगुवा वह होता है, जो रास्ता जानता है और उसी पर चलता है।
वर्तमान में, अगुवाई में अधिकार को (और जिनके पास अधिकार है, उन्हें) सन्देह और विरोध का सामना करना पड़ता है। कुछ हद तक तो यह समझ में भी आता है। अधिकारों का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है। जिन लोगों को रक्षा और देखभाल करनी चाहिए, उनके द्वारा किया गया अन्याय विशेष रूप से दु:खद और हानिकारक होता है। फिर भी, बुरे अधिकार का उत्तर अच्छा अधिकार होना चाहिए, और ऐसा न हो कि कोई अधिकार ही न हो।2 हमें अच्छे अधिकार का प्रयोग होते हुए और उसका उदाहरण प्रस्तुत होते हुए देखने की आवश्यकता है।
यदि आप किसी स्थानीय कलीसिया से जुड़े हुए हैं, तो परमेश्वर आपको जो उदाहरण देता है, उनमें से एक आपके पास्टर हैं। आपके आत्मिक अगुवे को यह दिखाना चाहिए कि परिपक्वता और भक्ति कैसी दिखती है। आपको अपने पास्टर की ओर संकेत करके यह कह पाने में सक्षम होना चाहिए, “मैं उन्हीं के जैसा बनना चाहता हूँ। मैं भी उन्हीं की तरह एक परिवार/कलीसिया का अगुवाई करना चाहता हूँ।” मुझे आपके बारे में तो नहीं पता, परन्तु मैं अपने पास्टरों को पाकर आशीषित हूँ। वे जिस तरह से लोगों की रखवाली और अगुवाई करते हैं और उन पर प्रभाव डालते हैं, वह प्रभु को प्रसन्न करता है। यहाँ सेवक अगुवाई के कुछ उदाहरण और तरीके दिए गए हैं, जिन्हें मैंने उनकी अगुवाई में देखा है:
प्रभाव को बाँटना: प्रभाव को संचय करने के बजाय, मेरे पास्टर उसे बाँट देते हैं।
– वे दूसरे लोगों को सिखाने के अवसर देने में उदार हैं।
– वे मण्डली के पुरुषों को लगातार यह याद दिलाते रहते हैं कि उन्हें दूसरों को शिष्यत्व सिखाकर, परिवार की सेवा करके और सिखाने के अवसरों को लेकर अगुवाई करने के द्वारा अपने प्रभाव का सही उपयोग करना चाहिए।
– वे पास्टर जानबूझकर ऐसे पुरुषों को ढूँढ़ते हैं, जिन्हें वे कलीसिया में अन्य प्राचीनों के तौर पर तैयार कर सकें। और वे ऐसे कठिन प्रश्न पूछते हैं, जैसे कि दूसरों के साथ उनके रिश्ते कैसे चल रहे हैं, वे अपने परिवार के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, इस सप्ताह हमने किन पापों का अंगीकार किया है, इत्यादि।
– वे पास्टर सेवकाई का काम करने के लिए सदस्यों पर भरोसा करते हैं। इसका अर्थ है कि वे निगरानी तो रखते हैं, परन्तु लोगों के हर छोटे-बड़े काम में हस्तक्षेप नहीं करते।
निर्माण करना: वे पास्टर देह को प्रोत्साहित करने के लिए कलीसिया में अपनी अगुवाई का उपयोग करते हैं।
– वे सुसमाचार को उभारने के लिए अपनी अगुवाई का उपयोग करते हैं। उनकी शिक्षाएँ, प्रोत्साहन, और सुधार, उनके हृदय में अधिकाई से बसे हुए मसीह के वचन से निकलते हैं।
– वे अपनी पसन्द को मानक बनाने में धीमे होते हैं, और बाइबल का उपयोग करके बात को सही करने में फुर्तीले होते हैं।
– वे पास्टर प्राचीनों की बैठक में सदस्यों के लिए प्रार्थना करने में बहुत अधिक समय बिताते हैं। वे विवाहों, सदस्यों के बीच एकता, और कमजोर व बेसहारा भेड़ों के लिए प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर उन्हें सामर्थ्य दे और उनकी रक्षा करे।
– वे कलीसिया के सदस्यों को उनके काम के घण्टों से पहले या बाद में शिष्यत्व सिखाते हैं और उन्हें परामर्श देते हैं।
दूसरे अधिकारियों के अधीन रहना
– वे पास्टर दूसरे पास्टरों के अधीन रहते हैं। इसका अर्थ है कि जब प्राचीनों की बैठक में उनके पक्ष में मतदान नहीं होता, तब वे अपनी अगुवाई और विनम्रता का प्रदर्शन करते हुए सन्तुष्ट रहते हैं।
– क्योंकि वे पास्टर जानते हैं कि वे भी मण्डली के अधिकार के अधीन हैं, इसलिए वे सदस्यों की बैठक की तैयारी में पूरी लगन से जुट जाते हैं, जिससे मण्डली को बता सकें कि उन्हें किस तरह सोचना चाहिए और मतदान करना चाहिए।
– वे पास्टर हर सप्ताह होने वाली “सेवा की समीक्षा” के लिए समर्पित रहते हैं, जिसमें पासबानी के अन्य कर्मचारी और आम सदस्य, उन बातों के बारे में धार्मिकता से भरा प्रोत्साहन और धार्मिकता से भरी आलोचनाएँ बता सकते हैं, जो उन्हें रविवार के दिन सिखाई गई थीं।
– मेरे वरिष्ठ पास्टर, कर्मचारियों के एक समूह को शामिल करके यह निर्णय लेते हैं कि भविष्य में उन्हें (दूसरी कलीसियाओं या सम्मेलनों इत्यादि में) प्रचार करने के कौन से अवसरों पर ध्यान देना चाहिए। वे इस बात पर अपनी राय देने के लिए प्रोत्साहित करते हुए दूसरे कर्मचारियों/पास्टरों के अधीन हो जाते हैं कि क्या रविवार के दिनों में कहीं बाहर होना बुद्धिमानी होगी।
ये कुछ ऐसे तरीके हैं, जिनसे मैंने अपने आसपास धार्मिकता से भरे पास्टरों को एक अच्छे अगुवे के गुणों को सही से निभाते हुए देखा है। और, परमेश्वर के अनुग्रह से, यह बहुत फलवन्त हो रहा है। मेरे अपने जीवन में भी यह फलवन्त हो रहा है, क्योंकि मैं ऐसी अगुवाई के अधीन हूँ, जो मुझे तैयार करती है और मुझे घर एवं काम पर कैसा होना चाहिए, इसका मेरे लिए आदर्श रखती है। यह दूसरों के जीवन में भी फलवन्त हो रहा है, क्योंकि मैं अपने मित्रों से मिलकर उन्हें बताता हूँ कि हम कलीसिया से क्या सीख रहे हैं। हमारी बातचीत केवल इस बात के चारों ओर नहीं घूमती कि हम क्या सीख रहे हैं, बल्कि इस बात के भी कि हम किससे सीख रहे हैं। बाइबल में बताई गई सेवक वाली अगुवाई और जीवन के हर क्षेत्र में विनम्रता कैसी होनी चाहिए, प्राचीन लोग इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। जिस तरह वे अपने प्रभाव का सही उपयोग करते हैं, उसी तरह हमें भी उनसे सीखने और उनकी सी चाल चलने के लिए बुलाया गया है।
यदि आप विनम्रता के साथ अगुवाई करना चाहते हैं, तो स्वयं को किसी स्थानीय कलीसिया के प्रति समर्पित करें।
—
चर्चा के लिए प्रश्न:
- क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है, जो धार्मिकता से भरी अगुवाई करने के लिए प्रोत्साहित कर सके और सिखा सके?
- आपने अपनी कलीसिया के अगुवों को धार्मिकता से भरी अगुवाई का उदाहरण देते हुए कैसे देखा है?
- क्या आपने स्वयं को धार्मिकता से भरी आलोचना के लिए खोला हुआ है? यदि नहीं, तो इस सप्ताह आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?
—
भाग III: परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा रखना
मेरी पहली सेवकाई की नौकरी मेरे लिए जागने का संकेत थी।
कुछ समय पहले ही मेरा विवाह हुआ था और मैं सेमिनरी में अपनी कक्षाएँ पूरी करने ही वाला था। मेरी पत्नी और मैं अपने घर के पास एक बहुत अच्छी कलीसिया में थे, और हमें लगा कि अब हम अपना अलग घर बसाने के लिए तैयार हैं। वैसे भी, मैं पिछले चार वर्षों से पास्टर बनने की तैयारी कर रहा था! मित्रों के माध्यम से मुझे एक बहुत ही रोमांचक सौदे के बारे में पता चला, और कई बातचीत के बाद, मेरी पत्नी और मुझे, दोनों को ही वह सौदा बहुत पसन्द आया। यह एक बहुत अच्छी कलीसिया में एक बढ़िया भूमिका, परिवार आरम्भ करने के लिए एक अद्भुत शहर, और एक बहुत अच्छे पास्टर से सीखने एवं उनके साथ मिलकर काम करने जैसा लगा।
परन्तु, हमारे वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद, सब कुछ बिखरने लगा। गलतफहमियाँ और असुरक्षाएँ हावी हो गईं। इसके बाद घमण्ड करना और दोष लगाना आरम्भ हो गया। और अन्त में, आरोप-प्रत्यारोप और त्यागपत्र आ पहुँचा।
एक वर्ष से भी कम समय में मैं बेरोजगार हो गया।
हमने विवाह का अपना बहुत सारा सामान बेच दिया, जो हमने इस अपेक्षा से खरीदा था कि हम यहाँ लम्बे समय तक रहेंगे। और अपनी एक महीने की पहली सन्तान, और पुस्तकों एवं कपड़ों से भरे एक बड़े बक्से के साथ, मैं गाड़ी चलाकर अपने ससुराल लौट आया। जिसे मैं लम्बे समय तक सेवा करने का स्थान होने की आशा कर रहा था, वह अन्त में एक अचानक बुझ जाने वाली लौ की तरह साबित हुआ।
तरह-तरह की भावनाओं की लहर उमड़ पड़ी। उस समय, मैं निराश, हताश, शर्मिंदा और चिन्तित था और ये तो बस कुछ ही भावनाएँ थीं। “मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है? मैं इससे बेहतर के योग्य हूँ।”
परन्तु लगभग 5 वर्ष बाद, मैं धन्यवादी होकर पीछे मुड़कर देखता हूँ। आपको यह अजीब सा लग सकता है कि एक टूटा हुआ सपना और सेवकाई का विफल प्रयास, कृतज्ञता कैसे उत्पन्न कर सकता है। कड़वाहट या नाराजगी अधिक स्वाभाविक लगते हैं। और कहने का मेरा अर्थ यह नहीं है कि मैं एकदम सही था। काश, जो कुछ भी हुआ, उसके दौरान और उसके बाद भी मैं और अधिक धीरज धरने वाला, क्षमा करने वाला और विनम्र होता। परन्तु मैं धन्यवादी होकर पीछे मुड़कर देखता हूँ, क्योंकि मैं उन कुछ बातों को देख पाता हूँ, जो परमेश्वर ने उस अनुभव के माध्यम से मेरे लिए की हैं।
परमेश्वर ने मुझे घर में अगुवाई करने के बारे में सिखाते हुए, मेरे विवाह को मजबूत किया। परीक्षाओं का मिलकर सामना करने से बेहतर और कोई भी बात विवाह को मजबूत और सुदृढ़ नहीं करती, और हमारी परीक्षाओं ने हमें एक दूसरे से और भी अधिक प्रेम करने और एक दूसरे पर भरोसा रखने के लिए प्रेरित किया। उसने मेरे विश्वास को भी बनाए रखा। परमेश्वर के वादे घने बादलों के बीच सबसे अधिक चमकते हैं, और यह जानने से अधिक शान्ति देने वाली कोई बात नहीं थी कि परमेश्वर वह देख रहा है और जानता है, जिससे मैं होकर गुजर रहा हूँ। यह परीक्षा, विश्वासयोग्य अगुवाई का एक अग्नि-कुण्ड था। उसने मेरे हृदय को पवित्र किया। और मैंने न केवल परमेश्वर के बारे में और भी अधिक सीखा, बल्कि मैंने अपने बारे में भी बहुत कुछ जाना। अपने जीवन की योजना बनाना और फिर पूरी तरह से एक नयी दिशा में मुड़ जाना, इससे अधिक विनम्र करने वाली कोई बात नहीं होती। मैंने अपना बुरा पहलू भी देखा है, और मैंने यह भी देखा है कि कैसे परमेश्वर मुझे सुधारने के लिए मेरे पापों को उजागर कर रहा था।
मैं इसलिए भी धन्यवादी हूँ, क्योंकि यदि वह अनुभव न हुआ होता, तो आज मैं जहाँ हूँ, वहाँ कभी न पहुँच पाता। हम शायद कभी वॉशिंगटन, डी.सी. न जाते, किसी बढ़िया कलीसिया से न जुड़ते, ऐसे मित्रों से न मिलते, जिनसे हमारी तुरन्त गहरी मित्रता हो गई, अच्छे प्रचार और अगुवाई के सानिध्य में न बैठते, और उस कलीसिया में काम करना आरम्भ न करते, जिससे मुझे प्रेम है।
मेरी पहली सेवकाई की नौकरी मेरे लिए जागने का संकेत थी। मुझे मालूम नहीं था कि परमेश्वर उस समय क्या कर रहा था। फिर भी, जैसे-जैसे समय बीतता चला गया, वैसे-वैसे परमेश्वर मेरे भीतर, मेरे द्वारा और मेरे लिए, ऐसे तरीकों से चुपचाप और उद्देश्य के साथ काम करता रहा, जिनके बारे में मुझे जानकारी नहीं थी। उसने लोगों और परिस्थितियों का उपयोग करके मुझे पवित्र और विनम्र बनाया। परमेश्वर ने मुझे उसका प्रबन्ध दिखाने के लिए जगाया।
पिछले खण्डों में, हमने उन अलग-अलग तरीकों को देखा, जिनसे हम अपनी अगुवाई और प्रभाव का सही उपयोग करने में बढ़ सकते हैं। वह प्रभाव चाहे किसी राजनीतिक दल के भीतर हो, या कलीसिया की सभाओं में हो, फिर भी सारे मसीही विश्वासी, परमेश्वर के वचन का आनन्द लेकर और परमेश्वर के कलीसिया के प्रति समर्पित होकर, विनम्रता के साथ अगुवाई करने में परिपक्व होते चले जाते हैं। इस अध्याय में, हम एक और ऐसी बात के बारे में चर्चा करेंगे, जो एक विनम्र अगुवे का निर्माण करती है। एक अगुवा केवल तभी विनम्र बन पाता है, जब वह इस बात पर भरोसा करता है कि उसके जीवन की सब बातें जिसमें अगुवाई और प्रभाव भी शामिल है, परमेश्वर के द्वारा निर्धारित की गई हैं। यह जानना कि उसके पास जो कुछ भी है—चाहे वह अच्छा हो या बुरा, छोटा हो या बड़ा—वह सब हमारे प्रेमी पिता के हाथों से मिला है। विनम्र अगुवाई का मूलमंत्र यही है।
इससे पहले कि हम गहराई में उतरें, हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि असल में प्रबन्ध क्या है। यह अवधारणा, धार्मिकता से भरी अगुवाई की बुनियाद है। ऐसी कई सहायक परिभाषाएँ मौजूद हैं, जो ईश-वैज्ञानिकों ने प्रस्तुत की हैं। यहाँ हैडलबर्ग धर्म-प्रश्नोत्तरी से एक उदाहरण दिया गया है:
प्रश्न. आप परमेश्वर के प्रबन्ध से क्या समझते हैं?
उत्तर. परमेश्वर का प्रबन्ध उसकी महाप्रतापी और सर्वदा-उपस्थित सामर्थ्य है, जिसके द्वारा वह, मानो अपने हाथ से, आज भी आकाश और पृथ्वी तथा सभी प्राणियों को थामे हुए है, और उन पर इस प्रकार शासन करता है कि पत्ती और घास, वर्षा और सूखा, फलदायी और बंजर वर्ष, भोजन और पेय, स्वास्थ्य और बीमारी, धन-सम्पत्ति और निर्धनता, वास्तव में, सभी बातें हम तक संयोग से नहीं, बल्कि उसके पिता-तुल्य हाथ से आती हैं।
आप इसे वास्तव में इससे बेहतर ढंग से परिभाषित नहीं कर सकते! परन्तु आइए कुछ बातों पर ध्यान करें। सबसे पहली बात, परमेश्वर का प्रबन्ध सक्रिय है। उसकी “महाप्रतापी और सर्वदा-उपस्थित सामर्थ्य” संसार को गति देकर फिर पीछे नहीं हट जाती। इसके बजाय, जब हम चलते-फिरते और जीवन जीते हैं, परमेश्वर इस संसार को “तब भी थामे रहता है” और उस पर “शासन करता है।” यहाँ तक कि जब हम सो रहे होते हैं, तब भी वह काम कर रहा होता है।
दूसरी बात, परमेश्वर का प्रबन्ध सर्वव्यापी है। परमेश्वर सभी वस्तुओं को थामे रहता है और उन पर शासन करता है, चाहे वे कौवे और पहाड़ी बकरों जैसे सजीव प्राणी हों, या चाहे समुद्री शैवाल और तारों जैसी निर्जीव वस्तुएँ हों। परमेश्वर उनमें से किसी को भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देता। चाहे वे कुछ भी हों और कहीं भी हों, परमेश्वर का प्रबन्ध जगत की हर वस्तु तक पहुँचता है। कोई भी वस्तु या कोई भी व्यक्ति उसके नियंत्रण से बाहर नहीं है।
तीसरी बात, परमेश्वर का प्रबन्ध निरन्तर जारी रहता है। ध्यान दें कि परमेश्वर का प्रबन्ध अच्छे और बुरे में; वर्षा और सूखे में; फलदायी और बंजर में; स्वास्थ्य और बीमारी में; धन-सम्पत्ति और निर्धनता में, दोनों ही परिस्थितियों में कितना सक्रिय और उपस्थित रहता है। परमेश्वर का नियंत्रण केवल तभी नहीं होता, जब सब काम अच्छे से हो रहे हों। नहीं, अच्छा और बुरा, दोनों ही परमेश्वर की ओर से आते हैं।
और अन्त में, परमेश्वर का प्रबन्ध स्नेहपूर्ण है। आदि और अन्त में, परमेश्वर के प्रबन्ध को उसके “हाथ” के द्वारा संचालित होते हुए बताया गया है। किसी कम धार वाले साधन के बजाय, अपने हाथ का उपयोग करने में एक व्यक्तिगत् बात होती है। आप किसी छड़ी से नियंत्रण कर सकते हैं, या तलवार से शासन कर सकते हैं। परन्तु परमेश्वर का शासन उसके अपने हाथ से चलता है। और इसे केवल उसका हाथ ही नहीं, बल्कि उसका “पिता-तुल्य” हाथ बताया गया है। परमेश्वर हमारे जीवनों में जो कुछ भी निर्धारित करता है, वह सब केवल उसकी सन्तान के रूप में हमारे प्रति उसके पिता-तुल्य स्नेह और देखभाल से ही आता है और उसी के माध्यम से घटित होता है। परमेश्वर के प्रबन्ध का अर्थ वही है, जो एक पिता अपनी सन्तान की भलाई के लिए करता है। यीशु वह अगुवा है, जिसने इस पिता-तुल्य हाथ पर पूरी तरह भरोसा किया।
परमेश्वर का प्रबन्ध सक्रिय, सर्वव्यापी, निरन्तर और स्नेहपूर्ण होता है। यह बात हमारे विषय पर और हमारी इस समझ पर कैसे लागू होती है कि अगुवाई करने से आपका क्या अर्थ है?
लोगों का प्रबन्ध
यदि हम यह विश्वास करते हैं कि सब कुछ परमेश्वर के नियंत्रण में है, तो हमें इस बात पर भी भरोसा करना चाहिए कि परमेश्वर ने ही कुछ विशेष लोगों को हमारे जीवन में भेजा है। हमारे जीवन के आरम्भिक दिनों से लेकर आज तक, परमेश्वर ने हम सभी पर इस तरह से शासन किया है और अब भी शासन कर रहा है, जो किसी उद्देश्य से जुड़ा है। यह सच्चाई हमारी अगुवाई और प्रभाव को समझने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे मुझे अपने बच्चों का पालन-पोषण करते समय स्वयं को याद दिलाते रहना पड़ता है। बच्चों की देखभाल करना थकाने और बोझिल कर देने वाला हो सकता है। कभी-कभी, आपको पूरी रात जागना पड़ता है। कभी-कभी उन्हें चोट लग जाती है और वे आपकी दिनचर्या को पूरी तरह से बिगाड़ देते हैं, क्योंकि आपको आपातकालीन कक्ष जाना पड़ता है! यह सोचना आसान है कि बच्चों का पालन-पोषण आपको धीमा कर देता है या आपको दूसरे अवसरों का लाभ उठाने से रोक देता है। परन्तु प्रबन्ध का सिद्धान्त हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर ने हमारे बच्चों को हमारे जीवन में किसी विशेष कारण से भेजा है। मुख्य रूप से, यह हमें पवित्र बनाने के लिए है। बच्चों का पालन-पोषण एक बहुत बड़ी अगुवाई की जिम्मेदारी है, जो हमारे जीवन के अंधकारमय क्षेत्रों को जल्दी से उजागर कर देती है, और हमें यह एहसास दिलाने में सहायता करती है कि हम अपने आपको जितना धीरजवन्त और कोमल सोचते हैं, असल में हम उससे कम ही हैं। हमें इस बात की भी जानकारी हो जाती है कि हम अक्सर कमजोर और चंचल होते हैं, जबकि परमेश्वर हमारा स्थिर और परिपूर्ण स्वर्गीय पिता है, जो हमेशा हमारी भलाई और अपनी महिमा के लिए हमारा मार्गदर्शन करता है।
उन लोगों का क्या करें, जिन पर हम प्रभाव डालते हैं? यह हमें कार्यस्थल पर अगुवाई की बात पर ले आता है। हो सकता है कि आपके सहकर्मी आपसे अलग राय रखने वाले हों, या उनके साथ काम करना कठिन हो, या उनके साथ घुलना-मिलना आसान न हो। हो सकता है कि वे आपकी बुराई करें या आपके अधिकार को कमजोर करें। हो सकता है कि जिन लोगों की देखरेख करने के लिए आपको रखा गया है, उन्हें देखकर आपको गुस्सा आए या आप चिढ़ते रहें। या फिर आपकी कलीसिया के किसी सदस्य का क्या करें? मैं जानता हूँ कि हमें अपने भाई-बहनों से प्रेम करने के लिए बुलाया गया है… परन्तु कभी-कभी वे आपके धीरज को तोड़ देते हैं। हो सकता है कि वे राजनीति, शिक्षा या सामाजिक मुद्दों पर आपसे असहमत हों, जिससे वे आपको भाई-बहन के बजाय शत्रु अधिक लगने लगें। परन्तु उन्हें भी परमेश्वर ने अपनी सम्प्रभुता से ही हमारे जीवन में भेजा है। वह जानता है कि वह क्या कर रहा है, और वह इसे हमारी भलाई के लिए ही करता है।
परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा करने से इस बात पर प्रभाव पड़ेगा कि हम दूसरों का अगुवाई कैसे करते हैं, और यह अगुवाई के प्रति हमारे विश्वास को भी तय करता है। हम उन्हें समस्याओं के रूप में कम, बल्कि उन साधनों के रूप में अधिक देखते हैं, जिनका उपयोग परमेश्वर हमें यीशु के जैसा बनाने के लिए कर रहा है। हम विनम्रता और प्रेम के साथ, यह भरोसा रखते हुए अगुवाई करते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें केवल हमारी भलाई के लिए नहीं, बल्कि उनकी भलाई के लिए भी हमारी देखरेख में सौंपा है। हमारे जीवन में जब हम कुछ लोगों के विषय में कुड़कुड़ाने की परीक्षा में पड़ते हैं, तो हम स्वयं को याद दिला सकते हैं कि परमेश्वर इस संसार की हर बात पर “शासन करता है”, कि हमें परिपक्व बनाए और हमें बढ़ने में सहायता करे। प्रबन्ध पर भरोसा करना महत्वपूर्ण होता है, और इस भरोसे से ही विनम्रता आती है।
परिस्थितियों में प्रबन्ध
परमेश्वर के प्रबन्ध में केवल रिश्ते ही नहीं, बल्कि परिस्थितियाँ भी शामिल हैं। जैसा हमने परमेश्वर के प्रबन्ध की अपनी परिभाषा में देखा, अच्छी और बुरी दोनों ही बातें परमेश्वर के सम्प्रभु नियंत्रण के छाते के अधीन आती हैं। हो सकता है कि आप अपने काम में बहुत अच्छा कर रहे हों; आपके वरिष्ठ अधिकारी आपके बेहतरीन प्रदर्शन को देखकर उसकी बड़ाई कर रहे हों, या फिर आपके सहकर्मी आपको बहुत पसन्द करते हों। या हो सकता है कि आपका घर विश्राम और शान्ति की जगह न हो; आपके विवाहित जीवन में ठहराव आ गया हो, या बच्चों के पालन-पोषण को लेकर आप पूरी तरह से हताश हो चुके हों। आप चाहे किसी भी परिस्थिति में क्यों न हों, प्रभु ने आपको अकेला नहीं छोड़ा है, या उसका नियंत्रण समाप्त नहीं हुआ है। उसे भली-भाँति मालूम है कि वह क्या कर रहा है।
मिशनरियों के जीवन अक्सर आसान नहीं होते। बर्मा (म्यांमार) में मिशनरी के तौर पर काम करने वाले एडोनीराम जडसन का जीवन तो निश्चय ही आसान नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की महिमा करने वाला और समर्पित जीवन जिया, बाइबल का बर्मी भाषा में अनुवाद किया, कलीसियाओं की स्थापना की, और समाज के हर वर्ग के लोगों तक सुसमाचार पहुँचाया—वे विश्वास और अगुवाई का एक सच्चा उदाहरण थे। परन्तु उनका जीवन दु:ख और मृत्यु से भरा हुआ था। उन्होंने बीमारी के कारण अपने कई बच्चों को खो दिया। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी प्यारी पत्नी, ऐन को भी खो दिया, जिन्होंने म्यांमार की यात्रा की और कई वर्षों तक गलत तरीके से जेल में बन्द रहे जडसन की देखभाल की। परिस्थितियाँ तब और भी बुरी हो गईं, जब छह वर्ष तक लगातार प्रचार करने के बाद, उन्हें अपना पहला हृदय परिवर्तित व्यक्ति मिला।
चार्ल्स स्पर्जन जैसे पास्टरों को भी दु:ख उठाना पड़ा। वे न केवल मंच पर से सिंह की तरह गरजने के लिए प्रसिद्ध थे—अर्थात् वे एक सामर्थी आत्मिक अगुवे थे—बल्कि उन्होंने अपने अवसाद के बारे में भी खुलकर बात की थी, जो कभी-कभी उन्हें अपनी सेवकाई करने से पूरी तरह रोक देता था और उनके जीवन पर एक गहरा साया डाल देता था। उन्हें जिस पुरानी बीमारी का सामना करना पड़ा, और साथ ही सुरे गार्डन्स की उस कुख्यात आपदा ने जिसमें 7 लोग मर गए थे, उन्हें इस बात का गहरा एहसास करवाया कि यद्यपि हर बात पर परमेश्वर का नियंत्रण हो, परन्तु वह हमेशा अपने लोगों के जीवन से दु:खों को दूर नहीं करता।
एक बार चार्ल्स स्पर्जन ने यहेजकेल की पुस्तक से, परमेश्वर के प्रबन्ध पर प्रचार किया था। स्पर्जन ने परमेश्वर के प्रबन्ध को एक पहिये से जोड़कर बताया। जिस तरह पहिये के अलग-अलग हिस्से अपनी जगह बदलते हुए ऊपर-नीचे होते रहते हैं, और उन्हें नहीं पता होता कि वे अगली बार कब ऊपर या नीचे होंगे, उसी तरह जीवन में भी अलग-अलग दौर आते रहेंगे। कुछ दौर दूसरों की तुलना में बेहतर होंगे। कुछ दौर बारिश से परिभाषित होंगे, तो कुछ सूखे से परिभाषित होंगे।
वे एक दृष्टिकोण देते हुए जो जीवन में अस्थिरता महसूस होने पर भी, हमें अगुवाई का प्रदर्शन करने में सहायता करता है, कहते हैं:
क्या आप जानते हैं कि एक पहिये में एक ऐसा हिस्सा होता है, जो कभी नहीं घूमता, और वह धुरी अर्थात् चूल होता है। इसलिए, परमेश्वर के प्रबन्ध में भी एक ऐसी धुरी होती है, जो कभी नहीं हिलती। हे मसीही जन, आपके लिए यहाँ एक प्यारा विचार है! आपकी दशा हमेशा बदलती रहती है; कभी आप ऊँचाई पर होते हो, और कभी निराशा में होते हो; फिर भी, आपकी दशा में एक न हिलने वाली जगह है। यह धुरी क्या है? वह मुख्य बात क्या है, जिसके चारों ओर सारे कलपुर्जे घूमते हैं? यह परमेश्वर की वाचा में बंधे हुए लोगों के प्रति उसके अनन्त प्रेम की धुरी है। पहिये का बाहरी हिस्सा बदलता रहता है, परन्तु उसके बीच का हिस्सा हमेशा स्थिर रहता है। दूसरी बातें भले ही हिल-डुल सकती हैं, परन्तु परमेश्वर का प्रेम कभी नहीं हिलता, यही उस पहिये की धुरी है; और यह एक और कारण है कि परमेश्वर के प्रबन्ध की तुलना एक पहिये से क्यों की जानी चाहिए।1
परीक्षाओं के समय में, घमण्ड का सहारा लेने पर आपको ऐसा महसूस होगा कि आप इससे बेहतर के योग्य हैं, परन्तु आपको सबसे बुरा मिल रहा है। आपको लगेगा कि आप अधिक मिलनसार सहकर्मियों, या अधिक आज्ञाकारी बच्चों, या एक बेहतर जीवनसाथी के योग्य हैं। इसके बजाय, आपको लगेगा कि जो आपके पास है, आप उसी में फँसकर रह गए हैं। घमण्ड आपकी आँखों पर पट्टी बाँध देगा, और मन में सन्देह उत्पन्न कर देगा, और आपको यह देखने से रोक देगा कि परमेश्वर कौन है और वह क्या कर रहा है।
परन्तु परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा करने से आपकी आँखें ऊपर की ओर उठ जाती है। जबकि परीक्षाएँ अपने आप ही समाप्त न हों, फिर भी आप यह देख पाते हैं कि दु:ख भी लगाव और उद्देश्य के साथ आता है—अर्थात् यह परमेश्वर का वह प्रेमपूर्ण हाथ है, जो आपमें कुछ अच्छा करना चाहता है। यीशु और अगुवाई को समझने के लिए यह दृष्टिकोण मुख्य है; जिसने पिता की योजना पर पूरा-पूरा भरोसा रखते हुए, अपने सामने रखे हुए उस आनन्द के लिए ही क्रूस को सह लिया।
और परमेश्वर को नकारना नहीं, परन्तु उस पर भरोसा रखना ही हमें दूसरों को तैयार करने की क्षमता और सामर्थ्य प्रदान करता है। यह हमारे भीतर उस विनम्रता को जगाता है, जिसकी आवश्यकता अगुवों को अपने आसपास के लोगों से प्रेम करने और उनकी सेवा करने के लिए होती है। या फिर, यह हमें और अधिक करुणामयी बनाता है—जो सेवक वाली अगुवाई की 10 सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है—और हमें सहानुभूति के साथ बात करने के लिए एक नयी भाषा प्रदान करता है। ऐसा करके, हम यीशु के अगुवाई के गुणों का अनुकरण करते हैं, जिसने हमेशा करुणा के साथ और अपने पिता पर निर्भर होते हुए ही अगुवाई की थी।
आप किस परिस्थिति में हैं? और आप उस परिस्थिति पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं? अपनी आँखें ऊपर, परमेश्वर पिता की ओर उठाएँ, जो अपने प्रबन्ध में आपसे प्रेम करता है, और भरोसा रखें कि वे आपकी परिस्थितियों के बीच आपको पवित्र कर रहा है। और होने दें कि परमेश्वर पर यह भरोसा दूसरों के लिए प्रेम में बदल जाए। याद रखें कि आपके जीवन की हर बात पिता के हाथों से निर्धारित की गई है। उसकी आँखें आप पर से नहीं हटतीं। वह आपके साथ है।
—
चर्चा के लिए प्रश्न:
- आपके जीवन में परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा करना कैसा रहा है?
- जब आप परमेश्वर की सम्प्रभुता को याद नहीं रखते, तो किन तरीकों से आप लोगों और परिस्थितियों के साथ व्यवहार करने की परीक्षा में पड़ जाते हैं?
- परमेश्वर ने परीक्षाओं के बाद आपको कौन से सबक सिखाए हैं? क्या आप किसी ऐसी परीक्षा के बारे में सोच सकते हैं, जो व्यर्थ चली गई हो?
—
निष्कर्ष
विनम्रता से अगुवाई का आरम्भ सबसे पहले परमेश्वर के वचन में आनन्द लेने से होता है। घमण्ड परमेश्वर के वचन में अपनी जड़ें नहीं जमा सकता। इसके बजाय, परमेश्वर के वचन की मिट्टी में ही विनम्रता रोपी और बढ़ाई जाती है। जब हम पवित्रशास्त्र में आनन्द लेते हैं और उस पर मनन करते हैं, तो हमें याद आता है कि हम उसकी महिमा के लिए बनाए गए हैं, और हमारा आनन्द अन्त में उसके साथ मेल-मिलाप करने से आता है। विनम्रता से भरी मसीही अगुवाई उसकी कलीसिया के प्रति समर्पित होने की भी माँग करती है। परमेश्वर की कलीसिया वह व्यायामशाला है, जहाँ मसीही लोग विश्वासयोग्यता के साथ अगुवाई करने का अभ्यास होते देखते हैं और स्वस्थ अगुवों की सी चाल चल सकते हैं। और अन्त में, प्रभाव के सही उपयोग के लिए हर परिस्थिति में परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा करना आवश्यक है। अगुवाई के माध्यम से अपने प्रभाव का सही उपयोग कर पाने में हम केवल तभी सक्षम होते हैं, यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि यह अगुवाई उस सम्प्रभु परमेश्वर के द्वारा हमारी भलाई के लिए दी गई थी।
ये सच्चाइयाँ हमें याद दिलाती हैं कि विनम्रता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मसीह पर निर्भरता में निहित एक सामर्थ्य है। यह परमेश्वर का वचन, परमेश्वर की कलीसिया और परमेश्वर का प्रबन्ध है। जब हम इस भाव से अगुवाई करते हैं, तो हमारा प्रभाव स्वार्थी होने के बजाय जीवनदायक बन जाता है। यह उन लोगों को जीवन और समृद्धि प्रदान करता है, जो हमसे जुड़े हुए हैं, हमारे लिए काम करते हैं, हमारी बात सुनते हैं और हमारी आज्ञा मानते हैं। हे पास्टरों और अभिभावकों, आप विशेष रूप से एक अनूठा अधिकार रखते हैं, जिसके लिए भण्डारीपन की, अर्थात् घर और सेवकाई दोनों की अगुवाई में सन्तुलन बनाने की आवश्यकता होती है। आप इसे कैसे सम्भाल रहे हैं? क्या आपकी अगुवाई विनम्रता से भरी हुई है या अहंकार से भरी हुई है? क्या आप दूसरों की बात सुनते हैं या केवल अपनी ही बात सुनते हैं?
आप बाइबल-आधारित सेवक वाली अगुवाई का वर्णन कैसे करेंगे? दूसरों के लिए अधिकार और प्रभाव का सही उपयोग करना कैसा दिखता है? यह प्रेम जैसा दिखता है—अर्थात् ऐसा प्रेम, जो दूसरों के लिए स्वयं को पूरी तरह से उण्डेल देता है। सेवक वाली अगुवाई के बारे में सबसे बेहतरीन आयतों के पीछे की मूल भावना यही है। प्रेरित पौलुस बताता है, “प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं, वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है” (1 कुरिं. 13:4-7)।
तो आइए, हम ऐसे अगुवे बनने का प्रयास करें, जो यीशु के चरित्र को प्रतिबिम्बित करें—जो इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे—और जो सच्ची धार्मिकता से भरी अगुवाई का स्वरूप है, ताकि जो लोग हमारी देखरेख में हैं, वे हमें नहीं, बल्कि उसी को आशा और आनन्द के परम स्रोत के रूप में देखें।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- क्रिस्टोफर ऐश की पुस्तक, द साम्स: अ क्राइस्ट-सेंटर्ड कमेंट्री (The Psalms: A Christ-Centered Commentary), II.5-6 को देखें।
- जॉन वेबस्टर, क्राइस्ट आवर सेलवेशन: एक्सपोजिशन्स एण्ड प्रोक्लेमेनेशन्स (Christ Our Salvation: Expositions and Proclamations), सम्पादक डैनियल जे. बुश (बैलिंघम, डब्ल्यू.ए.: लैक्सहम प्रेस, 2020), 21.
- डेवर, वाट इज़ अ हेल्दी चर्च? (What Is a Healthy Church?), 98
- जोनैथन लीमैन द्वारा लिखित अथॉरिटी (Authority) को देखें।
- https://archive.spurgeon.org/sermons/3114.php
लेखक के बारे में
सैम कू वाशिंगटन, डी.सी. में स्थित कैपिटल हिल बैपटिस्ट चर्च में पास्टर के सहायक के रूप में सेवा करते हैं। उनका विवाह एना से हुआ है, और उन दोनों के दो बेटे जेम्स और नोआ हैं।
विषयसूची
- भाग I: परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
- अध्ययन करते समय परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
- अधीन रहते हुए परमेश्वर के वचन का आनन्द लेना
- चर्चा के लिए प्रश्न:
- भाग II: परमेश्वर की कलीसिया के प्रति समर्पित होना
- सिखाई जाने वाली अगुवाई
- अगुवाई का उदाहरण
- प्रभाव को बाँटना: प्रभाव को संचय करने के बजाय, मेरे पास्टर उसे बाँट देते हैं।
- निर्माण करना: वे पास्टर देह को प्रोत्साहित करने के लिए कलीसिया में अपनी अगुवाई का उपयोग करते हैं।
- दूसरे अधिकारियों के अधीन रहना
- चर्चा के लिए प्रश्न:
- भाग III: परमेश्वर के प्रबन्ध पर भरोसा रखना
- लोगों का प्रबन्ध
- परिस्थितियों में प्रबन्ध
- चर्चा के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में