#97 अनुग्रहपूर्ण वृद्धावस्था: जीवन के अन्तिम वर्षों में मार्गदर्शन करना
परिचय: एक प्राण जो वृद्ध होता जा रहा है
हाल ही मैं चालीस वर्ष का हुआ हूँ। यह लिखना भी कुछ अजीब सा लग रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे साथ भी ऐसा होगा। मेरे बाल सफ़ेद होने लगे हैं। मेरे जोड़ों में दर्द रहने लगा है। लोग अब मेरे साथ पहले जैसा व्यवहार नहीं करते हैं। अब मुझे पहले की तुलना में कहीं अधिक “श्रीमान” और “महाशय” कहकर संबोधित किया जाता है। यह शिष्टता तो है, पर साथ ही यह एक स्मरण भी दिलाता है कि अब मैं कमरे में उपस्थित सबसे युवा व्यक्ति नहीं रहा। न ही अब मैं पहले जैसा आकर्षक समझा जाता हूँ। और ऐसा लगता है कि चाहे मैं कितना भी संतुलित भोजन करूँ या कितने भी परिश्रम से व्यायाम करूँ, इस आयु में बाहर निकलते हुए पेट से बच पाना मेरे लिए संभव नहीं है।
जब मैं बीस वर्ष का था, तब मैं सोचता था कि बुढ़ापा दूसरों के लिए है। या यदि वह मेरे लिए भी है, तो वह इतना दूर है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन अब वह समय आ पहुँचा है, और मैं इस सच्चाई को समझने लगा हूँ कि मैं भी, हर दूसरे व्यक्ति के समान वृद्ध होता जा रहा हूँ। और जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ रही है, मैं यह भी समझ रहा हूँ कि वृद्ध होना केवल शारीरिक प्रक्रिया ही नहीं, वरन् आत्मिक प्रक्रिया भी है। अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ है कि उन अनिवार्य परिवर्तनों को स्वीकार करना जो आयु के साथ होते हैं, और साथ ही अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर अपने विश्वास और भरोसे को और अधिक गहरा करना है।
मैं वृद्धावस्था का कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ। मैं यह मार्गदर्शिका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिख रहा हूँ जो अपने नष्ट होने की वास्तविकता से जूझ रहा है, जो सचमुच अपनी हड्डियों में कमी होने की प्रक्रिया को महसूस कर रहा है। आपके ही समान मेरे वृद्ध होते हुए प्राण को भी सेवा और सामर्थ्य देने के लिए सुसमाचार रूपी औषधि की आवश्यकता है।
बढ़ती हुई आयु ने मेरे हृदय में छिपे हुए पापों को उजागर कर दिया है: अहँकार, रूप-रंग पर व्यर्थ घमण्ड, और उन बातों को नियंत्रित करने की इच्छा जिन्हें मैं नियंत्रित नहीं कर सकता हूँ। वृद्धावस्था के विषय में बाइबल की आयतें इस प्रकार कहती हैं, जैसे कि भजन संहिता 71:9 (“बुढ़ापे के समय मेरा त्याग न कर; जब मेरा बल घटे तब मुझ को छोड़ न दे”) इस वचन ने मुझे उस बुद्धि पर मनन करने में सहायता की है जो आयु बढ़ने के साथ आती है। बढ़ती आयु मुझे दिखा रही है कि संसार कितनी शीघ्रता से मेरे बिना आगे बढ़ रहा है, और मेरा हृदय इस वास्तविकता का सामना करने में कितना संघर्ष कर रहा है। यह मुझे बताती है कि मेरा यौवन बीत चुका है और वह कभी लौटकर नहीं आएगा, चाहे दीर्घायु का दावा करने वाले विशेषज्ञ मुझे कुछ भी बेचने का प्रयास करें। और यदि मैं अपनी आयु की वास्तविकता का सामना सुसमाचार से मिलने वाली आशा के साथ नहीं करूँगा, तो मैं कड़वाहट से भर जाऊँगा, चिन्ता में डूब जाऊँगा, या फिर समय के साथ जो कुछ खो रहा हूँ उसे बचाए रखने की धुन में लग जाऊँगा।
सुसमाचार एक बेहतर मार्ग प्रस्तुत करता है। यह मुझे बताता है कि यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश होता जा रहा है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन-प्रतिदिन नया बनाया जा सकता है (2 कुरिन्थियों 4:16)। यह मुझे बताता है कि मृत्यु अन्तिम शब्द नहीं है, क्योंकि पुनरुत्थान आ रहा है। और यह मुझे यह भी बताता है कि मेरा मूल्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि मैं जवान, स्वस्थ या लोगों की दृष्टि में आकर्षक हूँ, परन्तु इस बात पर निर्भर करता है कि मैं मसीह में पाया जाता हूँ। विश्वासयोग्यता के साथ वृद्ध होने का अर्थ यह भरोसा रखना होता है कि हमारे लिए परमेश्वर के उद्देश्य बढ़ती हुई आयु के साथ कम नहीं होते हैं।
मैं यह जीवन-कौशल मार्गदर्शिका इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे इन सच्चाइयों की आवश्यकता है कि वे मेरे प्राण की सेवा करें, और शायद आपको भी उनकी आवश्यकता होगी। संभव है कि आपने बढ़ती हुई आयु की चुभन को महसूस किया होगा, ऐसी देह की निराशा का अनुभव किया होगा जो पहले के समान साथ नहीं देती है, या अपने आसपास के युवा चेहरों के प्रति मन में खीझ रखने के प्रलोभन का सामना किया होगा। यदि ऐसा है, तो आइए इस मार्ग पर साथ-साथ चलते हैं। हो सकता है कि हमारी आयु बढ़ रही हो, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से हम विश्वासयोग्यता के साथ वृद्ध होना भी सीख सकते हैं, और हाँ, ऐसा वृद्ध होना भी सीख सकते हैं जो वास्तव में सुन्दर है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#97 अनुग्रहपूर्ण वृद्धावस्था: जीवन के अन्तिम वर्षों में मार्गदर्शन करना
भाग I: बढ़ती हुई आयु के विषय में बाइबल आधारित दृष्टिकोण
बाइबल वृद्धावस्था के विषय में आश्चर्यजनक रूप से वास्तविक जीवन के अनुरूप है। यह हमें नहीं बताती कि यदि हम केवल अपने आपको जवान समझते रहें, तो हम जवान बने रहेंगे। यह भी प्रतिज्ञा नहीं करती कि यदि हम पर्याप्त मात्रा में स्वास्थ्यवर्धक पेय पीते रहें या जिससे विभिन्न स्वास्थ्य और सौंदर्य समस्याओं के उपचार में सहायता मिलती है तो हम सदैव तीस वर्ष के व्यक्ति जैसे दिखेंगे और वैसा ही अनुभव करेंगे। परन्तु ऐसा नहीं है, पवित्रशास्त्र इससे कहीं अधिक जानता है। वह जानता है कि आयु का बढ़ना एक वरदान भी है और एक कष्टकारी समय भी है। बढ़ती हुई आयु के साथ कुछ आशीषें आती हैं: जैसे बुद्धिमानी, व्यापक दृष्टिकोण और धीरज। साथ ही कुछ कठिनाइयाँ भी आती हैं: जैसे शरीर में होने वाली रहस्यमय पीड़ाएँ, रोग और बीमारियाँ, तथा उन मित्रों और परिवार के जनों को धीरे-धीरे खो देने का दुःख, जो हमसे पहले इस संसार से चले गए हैं।
बाइबल इन दोनों बातों की पुष्टि करती है: पक्के बाल शोभायमान मुकुट ठहरते हैं; (नीत. 16:31), फिर भी “हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं, और चाहे बल के कारण अस्सी वर्ष भी हो जाएँ, तो भी उनका घमण्ड केवल कष्ट और शोक ही शोक है; क्योंकि वह जल्दी कट जाती है, और हम जाते रहते हैं।” (भज. 90:10)। आशीषें और कठिनाइयाँ, दोनों आपके शरीर और प्राण में एक साथ बँधी हुई हैं। बुढ़ापे के विषय में बाइबल के वचन, जैसे सभोपदेशक 12:1 कहता है (“अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख, इससे पहले कि विपत्ति के दिन और वे वर्ष आएँ, जिनमें तू कहे कि मेरा मन इनमें नहीं लगता)। ये वचन हमारा इस प्रकार से मार्गदर्शन करते हैं कि बढ़ती हुई आयु के साथ उद्देश्यपूर्ण और बुद्धिमानी से कैसे जीवन बिताया जाए।
सभोपदेशक अध्याय 12 संभवतः बाइबल में बुढ़ापे के विषय में सबसे स्पष्ट और सच्चा वर्णन प्रस्तुत करता है। सुलैमान काँपते हुए हाथों, झुकी हुई पीठ, धुँधली पड़ती दृष्टि, कमज़ोर होती सुनने की शक्ति, और ऐसे दाँतों का वर्णन करता है जो गिने-चुने रह जाते हैं। पवित्रशास्त्र हमारे शरीर के क्षीण होने की वास्तविकता को सुन्दर बनाकर प्रस्तुत नहीं करता; वरन् वह उसे हमारे सामने ऐसे रखता है जैसे एक दर्पण, जिससे हम अपनी दृष्टि हटा नहीं सकते। फिर भी, इन सब बातों के बीच हमें अनुग्रह और विश्वास के साथ बुढ़ापे को स्वीकार करने के लिए बुलाया गया है। हमें अपने जीवन में आने वाले परिवर्तनों को अपनाते हुए, परमेश्वर की प्रभुता करने वाली पूर्ण इच्छा पर भरोसा रखना है और विश्वास के साथ आगे बढ़ना है।
अनुग्रह के साथ बुढ़ापे की ओर बढ़ना
निश्चित रूप से बुढ़ापा तो आना ही है। इसी कारण मूसा भजन संहिता 90 में प्रार्थना करता है: “हमको अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।” आप अपने सफेद बालों को छिपा सकते हैं, त्वचा की झुर्रियों को कम करने के उपाय कर सकते हैं, व्यायाम कर सकते हैं और स्वस्थता बनाए रखने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ ले सकते हैं, परन्तु अंततः शरीर का क्षीण होना आपकी सजने-सँवरने, रंग-रोगन करने और बाहरी रूप को सँभालने की क्षमता से आगे निकल जाएगा। दूसरे शब्दों में कहूँ तो, यह दिखावा करने में अपना समय व्यर्थ न करें कि आप बूढ़े नहीं हो रहे हैं। अपनी आयु की शारीरिक वास्तविकता से जीवन भर संघर्ष मत कीजिए। उसका साहस के साथ सामना कीजिए।
और यही आशा की बात है: यह सत्य हमें निराश करने के लिए नहीं दिया गया है। इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र हमें सत्य बताता है ताकि हम संसार की झूठी धारणाओं और अपने हृदय के आत्म-भ्रम से स्वतंत्र हो जाएँ। पौलुस स्पष्टता और साहस के साथ कह सकता है, “यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तो भी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।” (2 कुर. 4:16)। हाँ, शरीर दुर्बल होता चला जाता है। यह एक वास्तविकता है। परन्तु उतनी ही वास्तविक बात यह भी है कि पवित्र आत्मा भीतर से हमें नया करता जाता है। यदि दर्पण में आपको आँखों के किनारों की झुर्रियाँ दिखाई देती हैं, तो वह उस गहरे आनन्द के चिन्ह भी दिखा सकता है जो यीशु का अनुसरण करते हुए बिताए गए जीवन से उत्पन्न हुए हैं। अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ जीवन में आने वाले इन परिवर्तनों को स्वीकार करना, और उन्हें हमारे जीवन के लिए परमेश्वर की योजना का एक भाग समझकर ग्रहण करना है।
बुढ़ापे के विषय में बाइबल यही सिखाती है कि हमें इसकी वास्तविकताओं का सामना करना चाहिए, आशा बनाए रखनी चाहिए, और यह स्वीकार करना चाहिए कि बुढ़ापा आना निश्चित रूप से सच्चाई है। प्रश्न यह नहीं है कि हम वृद्ध होंगे या नहीं, वरन् यह है कि हम वृद्ध कैसे होंगे। क्या हम कड़वाहट, असंतोष और अनुग्रह के अभाव के साथ, बीते हुए यौवन को पकड़कर रखने का प्रयास करते हुए वृद्ध होंगे? या फिर हम बुद्धिमानी के साथ अपने दिनों को गिनेंगे और उस परमेश्वर में नया बल पाएँगे, जो हमारे सफेद बाल होने तक और उसके बाद भी हमें सँभाले रखता है (यशा. 46:4)? अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ विश्वास के साथ बुढ़ापे की स्वाभाविक प्रक्रिया को स्वीकार करना, आत्मिक उन्नति पर ध्यान देना, और जीवन के प्रत्येक समय में स्वयं को परमेश्वर के भरोसे सौंप देना है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- बढ़ती हुई आयु की वास्तविकता को स्वीकार करने में आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है, और पवित्रशास्त्र उस संघर्ष के विषय में क्या कहता है?
- आपने किन तरीकों से देखा है कि परमेश्वर ने आपके जीवन के बदलते समय का उपयोग आपके विश्वास को गहरा करने या आपके दृष्टिकोण को बदलने के लिए किया है?
- आप ऐसा दृष्टिकोण कैसे विकसित कर सकते हैं जो बुढ़ापे को केवल शारीरिक क्षीणता के रूप में नहीं, परन्तु आत्मिक उन्नति और प्रभु पर अधिक निर्भर होना सीखने के अवसर के रूप में देखता हो?
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भाग II: वे झूठ जो हमारी संस्कृति हमें सिखाती है
जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ती जा रही है, मैं उतना ही अधिक समझ रहा हूँ कि बुढ़ापा केवल शरीर पर ही नहीं, वरन् पूरे व्यक्ति पर प्रभाव डालता है। झुर्रियाँ केवल झुर्रियाँ नहीं हैं; वे इस बात का प्रमाण हैं कि मैं अब युवा नहीं रहा। सफेद बाल केवल सफेद बाल नहीं हैं; वे मेरी बेटी के मित्रों को यह संकेत देते हैं कि अब उन्हें शायद मुझे “श्रीमान” कहकर संबोधित करना चाहिए। ऐसी संस्कृति जो युवावस्था का गुणगान करती है और बुढ़ापे का विरोध करती है, उसमें अनुग्रह के साथ वृद्ध होना आसान नहीं है। परन्तु इस परिस्थिति में सादगी से जीवन जीने का अर्थ अपनी बढ़ती आयु को सहजता से स्वीकार करना है और ऐसा हृदय रखना जो परमेश्वर को खोजता हो, न कि उस संस्कृति की स्वीकृति को, जो अनन्त मूल्य से अधिक बाहरी रूप-रंग को महत्व देती है।
बुढ़ापा अपने आप में ही कठिन होता है, परन्तु हमारी संस्कृति हमें वृद्ध होने के विषय में जो कहानियाँ सुनाती है, वे इसे और भी कठिन बना देती हैं। चाहे आपको इसका एहसास हो या न हो, परन्तु आप इन बातों को दूसरों से सुनते आए हैं और स्वयं भी दोहराते रहे हैं। इनमें से कुछ बातें सच हैं, परन्तु वे बहुत कम देखने को मिलती हैं। अधिकाँश सामान्यतः झूठ ही होती हैं और खुलेआम सुनाई जाती हैं। आइए, हम इनमें से कुछ पर एक साथ विचार करें।
झूठ #1: जीवन 25 वर्ष की आयु में अपने चरम पर होता है।
टेलीविजन चलाइए, इंस्टाग्राम देखते जाइए, या किसी पत्रिका के विज्ञापनों पर एक दृष्टि डालिए, और आप एक समान संदेश पाएँगे: युवावस्था ही सबसे अच्छी होती है, सबसे अधिक मूल्यवान चीज़ है। चिकनी त्वचा, असीम ऊर्जा, और ऐसा सुदृढ़ शरीर जो मानो कभी ढीला नहीं पड़ेगा, यही आदर्श माना जाता है। अनेक उद्योग इसी प्रतिज्ञा पर टिके हुए हैं कि वे समय के प्रभाव को रोक सकते हैं, या यहाँ तक कि उसे उलट भी सकते हैं। परन्तु सच्चाई यह है: कि आप झुर्रियों के विरुद्ध लड़ाई नहीं जीत सकते, और यदि किसी तरह जीत भी जाएँ, तो भी कब्र पर विजय नहीं पा सकते है। हमारी संस्कृति हमें बताती है कि सही भोजन, व्यायाम और त्वचा की देखभाल के द्वारा हम अपनी युवावस्था को सदा बनाए रख सकते हैं, परन्तु पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है: “सब प्राणी घास हैं, और उनकी शोभा मैदान के फूल के समान है। घास सूख जाती है और फूल मुर्झा जाता है…” (यशा. 40:6–7)।
झूठ #2: बुढ़ापे का अर्थ महत्वहीन होना है
हमारी संस्कृति नई चीज़ों की पूजा करती है, जैसे नए विचारों, नई तकनीक और नई आवाज़ों की। इसलिए ऐसा महसूस हो सकता है कि वृद्ध लोगों को धीरे-धीरे किनारे कर दिया जाएगा। संदेश छोटा है, परन्तु निरन्तर सुनाई देता है: एक बार जब आपका सबसे उत्तम समय बीत जाता है, तो आपकी उपयोगिता भी समाप्त हो जाती है। परन्तु परमेश्वर की दृष्टि ऐसी नहीं है। नीतिवचन सफेद बालों को शाप नहीं, वरन् महिमा का मुकुट कहता है (नीत. 16:31)। कलीसिया को यह शिक्षा दी गई है कि वह वृद्ध विश्वासियों के ज्ञान को मूल्यवान समझे, न कि उन्हें बीते युग की वस्तु समझकर एक ओर कर दे (तीत. 2:2–4)। महत्वहीन हो जाना संस्कृति का फैलाया हुआ झूठ है, यह बाइबल की सच्चाई नहीं है। अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ पृष्ठभूमि में खो जाना नहीं है, वरन् उस बुद्धि को अपनाना है जो समय और अनुभव के साथ प्राप्त होती है।
झूठ #3: मृत्यु मेरे पास नहीं आएगी
हमारी संस्कृति हमें जो सबसे बड़ा झूठ सिखाती है, वह यह है कि मृत्यु के विषय में तब तक सोचने की आवश्यकता नहीं है, जब तक वह लगभग हमारे सामने न आ जाए। “मर गया” कहने के स्थान पर हम “स्वर्गवास हो गया” या “इस संसार से चला गया” जैसे नरम शब्दों का प्रयोग करते हैं। हम मृत्यु को बन्द दरवाज़ों और अस्पतालों के कमरों के पीछे छिपा देते हैं, और अपने निकट आती मृत्यु की वास्तविकता से ध्यान हटाने के लिए अन्तहीन मनोरंजन में स्वयं को व्यस्त रखते हैं। परन्तु बाइबल मृत्यु की वास्तविकता से मुँह नहीं मोड़ती है। वह स्पष्ट रूप से कहती है: “और जैसे मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है।” (इब्र. 9:27)।
मृत्यु की ओर सीधी दृष्टि से देखना कोई साधारण बात नहीं है, फिर भी हमें उसका सामना करना ही होगा। केवल तब, जब हम ईमानदारी से मृत्यु की वास्तविकता का सामना करते हैं, हम उसकी शरण में दौड़ सकते हैं जिसने पहले ही मृत्यु पर विजय प्राप्त की है। अनुग्रहपूर्ण रीति से वृद्ध होने का आरम्भ मृत्यु के इस अटल सत्य को स्वीकार करने से होता है। जब हम विश्वास के साथ इस सत्य को अपनाते हैं, तब हम अपने जीवन में शान्ति और उद्देश्य पाते हैं।
बढ़ती हुई आयु के साथ जो चिन्ता, कड़वाहट और अस्वीकार करने की भावना आती है, उसका बड़ा कारण मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने को अस्वीकार करना है। इसी कारण मूसा ने प्रार्थना की, “हमको अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।” (भज. 90:12)। अपने दिनों की गिनती करना यह स्वीकार करना है कि वे सीमित हैं, यह मान लेना है कि हम सदा जीवित नहीं रहेंगे, और प्रत्येक दिन को प्रभु के भय में जीना है। यह निराशाजनक या भयपूर्ण सोच का बुलाहट नहीं, परन्तु बुद्धिमानी से जीवन जीने की बुलाहट है। अनुग्रहपूर्ण रीति से वृद्ध होने का अर्थ परमेश्वर की अनन्त प्रतिज्ञाओं पर विश्वास रखते हुए अपनी नश्वरता को स्वीकार करना है।
जब हम अपनी नश्वरता को गंभीरता से लेते हैं, तब हम परमेश्वर की दया को आनन्द के साथ ग्रहण करते हैं। यदि आप अनुग्रहपूर्ण रीति से वृद्ध होना चाहते हैं, तो आपको अन्त से आरम्भ करना होगा। अपनी मृत्यु पर विचार कीजिए, और फिर अनुग्रह पर मनन कीजिए, क्योंकि केवल वही लोग जो अपनी मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार करते हैं, सुसमाचार के अनुग्रह के साथ वृद्ध हो सकते हैं। अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ जीवन की क्षणभंगुरता की वास्तविकता का सामना करना है, और साथ ही उस दया को अपनाना जो यीशु हम सबको प्रदान करता है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- परमेश्वर के अटल प्रेम और विश्वासयोग्यता की सच्चाई आपको बढ़ती हुई आयु के साथ कैसे स्थिरता प्रदान करती है?
- किन तरीकों से बढ़ती हुई आयु आपको कड़वाहट या भय की ओर ले जाने के लिए प्रलोभित करती है, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ उस भटकाव का विरोध करने में आपकी किस प्रकार सहायता कर सकती हैं?
- जीवन के इस पड़ाव में परमेश्वर की उपस्थिति और देखभाल को प्रतिदिन स्मरण रखने के लिए आप इस सप्ताह कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं?
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भाग II: बढ़ती हुई आयु के साथ परमेश्वर के द्वारा दिए जाने वाले अनुग्रह
बढ़ती हुई आयु का हर पहलू बुरा नहीं होता है। निस्संदेह, आपको अधिक शक्तिशाली चश्मे की आवश्यकता हो सकती है, चिकित्सक के पास अधिकाँश जाना पड़ सकता है, और दर्द निवारक दवाओं का उपयोग भी पहले से अधिक करना पड़ सकता है; परन्तु बढ़ती हुई आयु अपने साथ अनेक आशीषें भी लेकर आती है। बाइबल में वृद्धावस्था की कहानी केवल उस बात की नहीं है जो मुर्झा जाती है, परन्तु उसकी भी है जिसे परमेश्वर बढ़ाता है। विचार कीजिए…
बुद्धिमानी और आत्मिक परिपक्वता
अय्यूब 12:12 कहता है, “बूढ़ों में बुद्धि पाई जाती है, और लम्बी आयु वालों में समझ होती है”। बुद्धि को तुरन्त प्राप्त नहीं किया जा सकता है; उसे जीवन की लम्बी यात्रा में धीरे-धीरे विकसित होना पड़ता है। बुद्धि अनुभवों की भट्ठी और असंख्य परीक्षाओं के बीच से होकर आती है। युवाओं में ऊर्जा और उत्साह तो हो सकता है, परन्तु वृद्ध पवित्र जन उन छिपे हुए संकटों को पहचान लेते हैं जिन्हें दूसरे नहीं देख पाते हैं, वे परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को स्मरण रखते हैं, और उनके भीतर उस व्यक्ति का दृढ़ भरोसा होता है जिसने कभी परमेश्वर को असफल होते नहीं देखा।
आत्मिक परिपक्वता क्या है? आत्मिक परिपक्वता केवल ज्ञान या आयु का विषय नहीं है, परन्तु यह मसीह के साथ गहरा होता हुआ सम्बन्ध है, जो हमारे चरित्र को परिवर्तित करता है। यह यीशु के समान बनने की प्रक्रिया है, जिसमें हमारे हृदय उसके हृदय के अनुरूप होते चले जाते हैं, और हम अपने दैनिक जीवन में उसके प्रेम और बुद्धि को प्रकट करते हैं। जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती चली जाती है, तो हमें आत्मिक परिपक्वता में बढ़ने का विशेष अवसर मिलता है। हम परमेश्वर के हृदय को और अधिक जानने लगते हैं तथा उसकी इच्छा के अनुरूप होते जाते हैं। यही मसीही परिपक्वता की सुन्दरता है: यह हमें बुद्धिमानी और अनुग्रह के साथ जीवन जीने में योग्य बनाती है, ताकि हम वृद्धावस्था की प्रक्रिया को मसीह केंद्रित दृष्टिकोण के साथ स्वीकार कर सकें।
आत्मिक रूप से वृद्ध होने की प्रक्रिया में, जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे हमें आत्मिक रूप से परिपक्व होने का अवसर भी मिलता है। प्रत्येक वर्ष के साथ परमेश्वर के अनुग्रह पर हमारा भरोसा और अधिक गहरा होता चला जाता है, और यह उन्नति मसीही परिपक्वता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। आत्मिक परिपक्वता से सम्बन्धित बाइबल की आयतें हमें यह समझने में सहायता करती हैं कि जीवन का वास्तविक सार हमारे बाहरी रूप में नहीं, परन्तु मसीह की निकटता में अधिक बढ़ने में है। यह एक नए आत्मिक चरण का आरम्भ है, जिसमें हम अस्थायी बातों की अपेक्षा अनन्त मूल्यों को प्राथमिकता देना सीखते हैं।
वृद्ध लोगों की बुद्धिमानी को चक्रवृद्धि ब्याज के समान समझिए। परमेश्वर के साथ चलते हुए हर वर्ष आप अपने प्राण के भण्डार में भरोसे और आज्ञाकारिता को जमा करते हैं। समय के साथ यह निवेश केवल बढ़ता ही नहीं, वरन् कई गुना फल देता है। जब आपके बाल श्वेत हो जाते हैं, तब आपके पास केवल ज्ञान ही नहीं होता, परन्तु बुद्धिमानी की भरपूरी भी होती है। (इसी कारण कलीसिया को मण्डली में उपस्थित वृद्ध और विश्वासयोग्य पवित्र लोगों की वाणी की अत्यन्त आवश्यकता होती है।)
मार्गदर्शन
बढ़ती आयु अपने साथ दूसरों में निवेश करने का अवसर भी लेकर आती है। पौलुस ने तीतुस से कहा, “अर्थात् वृद्ध पुरुष सचेत और गम्भीर और संयमी हों, और उनका विश्वास और प्रेम और धीरज पक्का हो। इसी प्रकार बूढ़ी स्त्रियों का चाल चलन भक्तियुक्त लोगों के समान हो, वे दोष लगानेवाली और पियक्कड़ नहीं; पर अच्छी बातें सिखाने वाली हों। ताकि वे जवान स्त्रियों को चेतावनी देती रहें, कि अपने पतियों और बच्चों से प्रेम रखें” (तीत. 2:2–4)। विश्वासयोग्य जीवन के वर्षों के साथ सुसमाचार के कारण प्राप्त होने वाली विश्वसयोग्यता भी आती है। और सुसमाचार की यह विश्वसनीयता आत्मिक उत्तरदायित्व तथा प्रभाव को जन्म देती है। पवित्र वृद्ध लोगों को अपनी बुद्धिमानी को अपने तक सीमित रखने के लिए नहीं, वरन् अपने बीच के युवाओं के साथ उदारतापूर्वक बाँटने के लिए बुलाया गया है। उन्हें आत्मिक माता-पिता बनने के लिए बुलाया गया है। कलीसिया के युवाओं को वृद्ध विश्वासी लोगों के घावों से मिले अनुभवों, उनकी जीवन-कथाओं और उनके दृढ़ तथा विश्वासयोग्य उदाहरणों की आवश्यकता है।
यह आत्मिक परिपक्वता को दर्शाता है, क्योंकि मसीही परिपक्वता हमें दूसरों के जीवन में अपना योगदान देने के लिए कहती है। आत्मिक रूप से परिपक्व होने का अर्थ केवल परमेश्वर के साथ अपने आचरण में बढ़ना ही नहीं है, परन्तु उन लोगों के विश्वास को भी पोषित करना है जो हमारे पीछे आ रहे हैं। हमारा जीवन इस बात की गवाही होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन पर आधारित और उसकी बुलाहट पर केंद्रित एक सरल मसीही जीवन कैसे जिया जाता है।
परख
यदि युवावस्था का उत्साह कभी-कभी सावधानी को किनारे कर देता है, तो अनुभवी विश्वास आत्माओं की परख करता है, विभिन्न विकल्पों को तौलता है, और अच्छे, उत्तम तथा सर्वोत्तम के बीच; तथा जो सही है और जो लगभग सही प्रतीत होता है, उनके बीच भेद कर सकता है। इब्रानियों 5:14 कहता है, “पर अन्न सयानों के लिये है, जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अभ्यास करते-करते, भले-बुरे में भेद करने में निपुण हो गई हैं।” यीशु के साथ चलते हुए बिताए गए अधिक वर्ष हमारी आत्मिक दृष्टि को और अधिक पैनी बना देते हैं, भले ही हमारी शारीरिक दृष्टि समय के साथ क्षीण और धुँधली होती चली जाती है।
जैसे-जैसे हम मसीह में बढ़ते और परिपक्व होते चले जाते हैं, आत्मिक परिपक्वता इस बात में दिखाई देती है कि हम वास्तव में महत्वपूर्ण बातों की परख कर सकें और जीवन की उलझनों के बीच भी ऐसे चुनाव करें जो परमेश्वर को महिमा दे सकें।
दृष्टिकोण
बढ़ती आयु के बड़े वरदानों में से एक जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण है। वृद्ध लोग भली प्रकार से जानते हैं कि संसार न तो आज की सुर्खियों से बनता है, न बीते हुए कल की गलतियों से बिगड़ता है, और न ही आने वाली विपत्तियों से समाप्त होता है। उन्होंने जीवन में इतने उतार-चढ़ाव देखे होते हैं कि वे जानते हैं कि तूफान गुजर जाते हैं, घाव भर जाते हैं, और परमेश्वर सदा विश्वासयोग्य बना रहता है। ऐसा दृष्टिकोण उन्हें यह गवाही देने के लिए योग्य बनाता है: “मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूँ; परन्तु न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ, और न उसके वंश को टुकड़े माँगते देखा है।” (भज. 37:25)।
ऐसा दृष्टिकोण आत्मिक परिपक्वता को दर्शाता है, क्योंकि जैसे-जैसे हम आत्मिक रूप से परिपक्व होते जाते हैं, हम परमेश्वर की प्रभुता पर और अधिक भरोसा करना सीखते हैं। हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर यह जानते हुए सरलता से विश्वास कर सकते हैं, कि हमारे लिए उसकी योजना कभी नहीं बदलती है।
धीरज
कालेब ने पचासी वर्ष की आयु में कहा, “जैसा बल मुझ में उस दिन था जिस दिन मूसा ने मुझे भेजा था, वैसा ही बल आज भी मुझ में है” (यहो. 14:11)। हममें से अधिकाँश लोग अस्सी वर्ष की आयु में शारीरिक रूप से इतनी फुर्ती का अनुभव नहीं करेंगे, परन्तु आत्मिक रूप से ऐसा अवश्य अनुभव कर सकते हैं। धीरज बढ़ती आयु के बड़े अनुग्रहों में से एक है। यह वह सामर्थ्य है जिसके द्वारा हम दशकों की परीक्षाओं, असफलताओं और दुःखों पर पीछे मुड़कर देखते हुए कह सकते हैं, कि “परमेश्वर ने अब तक मुझे सँभाला और उठाए रखा है; मुझे विश्वास है कि वह मुझे मेरे घर पहुँचने तक सँभाले रहेगा।” युवा विश्वास प्रायः उत्साह से भरपूर होता है, परन्तु कभी-कभी बहुत अधिक दृढ़ नहीं होता है। परिपक्व विश्वास जीवन के तूफ़ानों का सामना कर चुका होता है और अपनी दृढ़ता को सिद्ध कर चुका होता है। इसी कारण पौलुस अपने जीवन के अन्त के निकट पहुँचकर यह लिख सका, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है।” (2 तीम. 4:7)।
दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका
शायद बढ़ती हुई आयु के सबसे मधुर अनुग्रहों में से एक दादा-दादी या नाना-नानी बनना है, चाहे विश्वास के क्षेत्र में हो या पारिवारिक सम्बन्धों में हो। पौलुस ने तीमुथियुस को स्मरण दिलाया कि उसका विश्वास सबसे पहले उसकी “नानी लोइस” में वास करता था (2 तीम. 1:5)। परमेश्वर अक्सर दादा-दादी और नाना-नानी को इस प्रकार उपयोग में लाता है कि वे अपने पोते-पोतियों के हृदयों पर विश्वास की अमिट छाप छोड़ जाएँ। जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती चली जाती है, तो हो सकता है कि आपकी भूमिका पहले जैसी बड़ी या व्यस्त न लगे, परन्तु यदि आप अपने बच्चों की संतानों के विश्वास में निवेश करने के लिए तैयार हैं, तो आपका प्रभाव आपकी कल्पना से कहीं अधिक गहरा और दीर्घकालिक हो सकता है।
विरासत
पौलुस के जीवन के अन्त में कहे गए शब्द आशा की एक गूँज के समान हैं: “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है।” (2 तीम. 4:7)। वृद्ध पवित्र जनों के पास अगली पीढ़ी को मशाल सौंपने का अवसर होता है। वे अपने विश्वास की विरासत को अपने बच्चों, पोते-पोतियों और अपनी कलीसियाओं के युवा विश्वासियों तक पहुँचा सकते हैं। विरासत का अर्थ केवल धन-संपत्ति या स्मारक छोड़ जाना नहीं है, परन्तु अपने जीवन के द्वारा मसीह की ओर इतनी स्पष्टता से संकेत करना है कि आपके बाद आने वाले लोग विश्वास की दौड़ को और अधिक भरोसे तथा दृढ़ता के साथ दौड़ सकें।
बढ़ती हुई आयु के साथ हम भले ही बहुत कुछ खो दें, लेकिन मसीह में हमें बहुत कुछ वापस भी मिलता है। वृद्धावस्था में युवावस्था की शक्ति भले ही कम हो जाए, पर उसके स्थान पर परिपक्व बुद्धिमानी आ जाती है। बेचैन महत्वाकांक्षा के स्थान पर शान्त और संतुलित दृष्टिकोण बन जाता है। अनुभवहीन उत्साह परखे हुए धीरज में बदल जाता है, और निरन्तर कुछ पाने की दौड़ विश्वासयोग्य जीवन की एक स्थायी विरासत छोड़ जाती है। जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती है, आपके सामने यह विकल्प होता है: कि या तो अपने श्वेत बालों को रंग से ढक दें, या उन्हें महिमा के मुकुट के समान धारण करें (नीत. 16:31)। यदि आप यह बात किसी और में देखें, तो आपको इनमें से कौन-सा विकल्प अनुग्रह के साथ वृद्धहोने का अधिक सच्चा चित्र प्रतीत होगा?
मनन के लिए प्रश्न:
- आपके लिए व्यक्तिगत रूप से इसका क्या अर्थ है कि व्यवस्था के द्वारा धार्मिकता प्राप्त करना असम्भव है, परन्तु विश्वास के द्वारा धार्मिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध है?
- सुसमाचार को स्मरण रखना आपको अपने कार्यों, उपलब्धियों या प्रदर्शन के द्वारा स्वयं को सिद्ध करने के प्रयास से कैसे स्वतंत्र करता है, यहाँ तक कि बढ़ती हुई आयु में भी?
- आपके जीवन में कौन सा ऐसा व्यक्ति है जिसे यह जानने की आवश्यकता है कि मनुष्य केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाता है, और इस सप्ताह आप उसे कैसे प्रोत्साहित कर सकते हैं?
भाग IV: अनुग्रह के साथ वृद्ध होने के लिए व्यावहारिक सलाह
सुसमाचार केवल यह नहीं बताता कि हम अनुग्रह के साथ वृद्ध क्यों हो सकते हैं; परन्तु यह भी दिखाता है कि हम अनुग्रह के साथ कैसे वृद्ध हों। यदि पिछले अध्यायों ने हमें वृद्धावस्था के विषय में सही दृष्टिकोण प्रदान किया है, तो यह अध्याय उसके व्यवहारिक पक्ष पर केन्द्रित है, अर्थात् जानबूझकर किए गए उन चुनावों और दैनिक आदतों पर, जो हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के प्रकाश में उत्तम जीवन जीने में सहायता करती हैं। अनुग्रह के साथ वृद्ध होना कोई ऐसी बात नहीं है जो अपने आप घटित हो जाए; यह तब होता है जब हम प्रतिदिन छोटे-छोटे परन्तु विश्वासयोग्य कदम उठाते हुए सक्रिय रूप से मसीह पर भरोसा करते हैं। अच्छी तरह वृद्ध होना वर्षों के बीतने के साथ मिलने वाली बुद्धिमानी और अवसरों को अपनाने का नाम है, न कि जीवन से पीछे हट जाने का या केवल जैसे-तैसे समय बिताते रहने का।
हो सकता है कि आपके हृदय में एक छोटी-सी झूठी आवाज़ कहे, “क्योंकि परमेश्वर ने पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा की है, इसलिए मैं मृत्यु तक बस समय बिताता रह सकता हूँ।” लेकिन पौलुस कहता है, “परन्तु केवल यह एक काम करता हूँ, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूलकर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ, जिसके लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है।” (फिलि. 3:13–14)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का अनुग्रह हमें बढ़ती हुई आयु में भी भिन्न रीति से जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है, और जीवन की दौड़ के अन्त तक आगे बढ़ते रहने की सामर्थ्य देता है। अनुग्रह के साथ वृद्ध होना सीखना केवल उस अनिवार्य घटना की प्रतीक्षा करना नहीं है जो एक दिन घटित होगी, वरन् उद्देश्य और विश्वास के साथ सक्रिय रूप से जीवन जीना है, और अन्त तक आगे बढ़ते रहना है।
तो फिर हम जीवन की दौड़ के अन्त तक पूरे मन से कैसे आगे बढ़ते रहें? हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि हम केवल आयु में ही नहीं बढ़ रहे हैं, परन्तु अनुग्रह में भी बढ़ रहे हैं, और अनुग्रह के साथ वृद्ध हो रहे हैं? आगे के पृष्ठों में मैं सात व्यावहारिक कदम प्रस्तुत करना चाहता हूँ। वे जटिल नहीं हैं, परन्तु अत्यन्त आवश्यक हैं।
अभ्यास 1: परमेश्वर के वचन में जड़ पकडे रहें
भजन संहिता 1 आशीषित जीवन का चित्र एक ऐसे वृक्ष के रूप में प्रस्तुत करता है, वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती पानी की धाराओं के किनारे लगाया गया है और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। परमेश्वर के वचन में जड़ पकड़ने का स्वरूप यही है। जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, यह चित्र और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वृद्ध होने का अर्थ अधिक चुनौतियों का सामना करना है, परन्तु परमेश्वर के वचन में जड़ पकड़े रहने से हम अपने मार्ग में आने वाले तूफानों का सामना कर सकते हैं। जो वृक्ष दशकों तक तूफानों के बीच खड़ा रहता है, वह केवल इसलिए टिक पाता है क्योंकि उसकी जड़ें गहराई तक पहुँची होती हैं। यही बात हमारे लिए भी सत्य है।
जैसे-जैसे हम वृद्ध होते जाते हैं, नई चुनौतियाँ हमारे विश्वास की परीक्षा लेती हैं, जैसे शारीरिक दुर्बलता, उन मित्रों के लिए शोक जो अब इस संसार में नहीं रहे, स्वयं को पहले की अपेक्षा कम “उपयोगी” समझे जाने की पीड़ा, और बीते हुए जीवन के ऐसे पछतावे जो हमें सताते रहते हैं। यदि हमारी बाइबल बन्द पड़ी रहे और किसी अलमारी में धूल खा रही हो, तो हम ऐसे तूफानों का सामना नहीं कर पाएँगे। हमें पवित्रशास्त्र के वचनों पर अपनी दृष्टि लगाए रखनी चाहिए और हमारे हृदयों को परमेश्वर के वचन में गहराई से जड़ पकड़ना चाहिए, क्योंकि वही जीवन और स्थिरता का स्रोत है, जिसे जीवन का कोई भी समय हमसे छीन नहीं सकता है।
“इसलिए हे परमेश्वर जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ और मेरे बाल पक जाएँ, तब भी तू मुझे न छोड़, जब तक मैं आनेवाली पीढ़ी के लोगों को तेरा बाहुबल और सब उत्पन्न होनेवालों को तेरा पराक्रम सुनाऊँ” (भज. 71:18)। यह वृद्धावस्था के सम्बन्ध में पवित्रशास्त्र का एक सुन्दर और प्रेरणादायक उदाहरण है, जो हमें बढ़ती हुई आयु में भी विश्वासयोग्य बने रहने के लिए प्रोत्साहित करता है।
व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ प्रतिदिन एक आदत के रूप में पवित्रशास्त्र से पोषण लेना है, अर्थात् हमारी आत्मा की भूख के समय के लिए प्रतिदिन की रोटी, जिसे हम अनुग्रह के साथ वृद्ध होने की यात्रा में लेते हैं। कुछ लोग बाइबल पढ़ना इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि उनकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। कुछ लोग इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि वे पहले के समान पवित्रशास्त्र को स्मरण नहीं रख पाते हैं। परन्तु इन बाधाओं के कारण परमेश्वर के वचन का आनन्द और सामर्थ्य को अपने से छीनने न दें। बाइबल को ऑडियो में सुनें। छोटे-छोटे भाग पढ़ें और उन पर गहराई से मनन करें। आयतों को कार्ड पर लिखें। किसी से कहें कि वह आपके साथ या आपके लिए पढ़ दे। हर परिस्थिति में, कोई ऐसा तरीका खोजें जिससे आपकी आत्मा की जड़ें उस स्वर्गीय जलधारा में बनी रहें।
यह एक प्रोत्साहन की बात है: वृद्ध पवित्र लोग विश्वासी युवाओं के लिए एक ऐसा वरदान रखते हैं जो युवा विश्वासियों के पास अभी नहीं होता है: जैसे वर्षों से हृदय में पहले से रखे हुए पवित्रशास्त्र के वचन। उन सभी रविवारों के बारे में सोचिए जब आपने परमेश्वर का वचन सुना था, उन सभी बाइबल अध्ययन सभाओं के विषय में सोचिए जिनमें आप वर्षों से सम्मिलित रहे है, और उन आयतों के विषय में भी सोचिए जिन्हें आपने स्मरण किया और दोहराया है। इनमें से कुछ भी व्यर्थ नहीं गया है। भले ही अब आपको वे बातें पहले जितनी जल्दी या स्पष्ट रूप से स्मरण न हों, फिर भी वे आपके भीतर बनी रहती हैं, जैसे एक शान्त परन्तु निरन्तर बहती हुई धारा।
और भी व्यावहारिक रूप से कहें, तो परमेश्वर के वचन में जड़ पकड़ना केवल अपने लिए पढ़ने तक सीमित नहीं है; इसका अर्थ है कि उस वचन को दूसरों तक भी पहुँचाना है। जब कोई युवा मसीही व्यक्ति आपसे पूछे कि आपने इतने वर्षों की कठिनाइयों को कैसे सहा, तो उसे आयु से सम्बन्धित बाइबल की आयतों के साथ उत्तर दें, जैसे भजन संहिता 71:18: “हे परमेश्वर जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ और मेरे बाल पक जाएँ, तब भी तू मुझे न छोड़,” या नीतिवचन 16:31: “पक्के बाल शोभायमान मुकुट ठहरते हैं; वे धर्म के मार्ग पर चलने से प्राप्त होते हैं।” जब आप अपने पोते-पोतियों के साथ प्रार्थना करें, तो उनके लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पवित्रशास्त्र के अनुसार प्रार्थना में रखें। उदाहरण के लिए, उन्हें यशायाह 46:4 का स्मरण कराएँ: “तुम्हारे बुढ़ापे में भी मैं वैसा ही बना रहूँगा और तुम्हारे बाल पकने के समय तक तुम्हें उठाए रहूँगा।” जब आप अपने जीवनसाथी के साथ भोजन के समय बातचीत करें या रात को सोने से पहले प्रार्थना करें, तो परमेश्वर की वचन में प्रकट उसकी विश्वासयोग्यता को स्मरण करें, जैसे भजन संहिता 92:14: “वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे” यहीं से बुढ़ापा और विश्वास की यात्रा गहरी होती चली जाती है। चेहरे पर झुर्रियाँ भले ही उभर जाती हैं, परन्तु पवित्रशास्त्र हमारे हृदय में और गहराई से उतर जाता है। सफेद बाल सिर पर मुकुट बन सकते हैं, और परमेश्वर का वचन हमारे जीवन का मुकुट बन जाता है।
अभ्यास 2: प्रार्थना करते रहें
यदि परमेश्वर के वचन में बने रहना उस जीवन देने वाली जल की धाराओं में अपनी जड़ों को गहराई तक फैलाने जैसा है, तो प्रार्थना उन जड़ों के माध्यम से उस जल को ऊपर खींचकर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को पोषित करने जैसा है। प्रार्थना आत्मा को जीवित और परमेश्वर से जोड़कर रखती है, भले ही शरीर क्षीण होता जाए। प्रार्थना हर समय प्रत्येक पवित्र जन का वरदान है, विशेषकर तब जब आयु अधिक बढ़ती जाती है।
बाइबल वृद्ध पवित्र लोगों की प्रार्थना करने वालों के उदाहरणों से भरी हुई है। भविष्यद्वक्तिन हन्नाह, जो कम उम्र में विधवा हो गई थीं, उसने वर्षों तक मंदिर में आराधना और प्रार्थना में समय बिताया, जब तक कि उसने शिशु यीशु को देख न लिया (लूक. 2:36–38)। दानिय्येल ने अपने बुढ़ापे में भी यरूशलेम की ओर खुली खिड़की के पास जाकर दिन में तीन बार प्रार्थना की, यहाँ तक कि मृत्यु के खतरे के बावजूद भी (दान. 6:10)। पौलुस, जो जेल में बेड़ियों से जकड़ा हुआ और वृद्धावस्था में था, उसने अपने पत्रों को कलीसियाओं के लिए प्रार्थनाओं से भर दिया। प्रार्थना बढ़ती हुई आयु के साथ समाप्त नहीं होती, वरन् और अधिक परिपक्व होती चली जाती है।
लेकिन सच्चाई से कहें तो आयु बढ़ने के साथ प्रार्थना करना कठिन भी हो सकता है। घुटने टेकने पर घुटनों में दर्द होता है, मनन करते समय ध्यान भटकने लगता है, और स्मरण-शक्ति भी कमजोर पड़ती हुई महसूस हो सकती है। फिर भी साहस रखें: परमेश्वर अपनी संतानों की आहों और कराहने को भी सुनता है, यहाँ तक कि जब हम शब्दों को ठीक से नहीं कह पाते या जो कहना चाहते हैं वह भूल जाते हैं, “इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है।” (रो. 8:26)। जब आपके पास शब्द नहीं होते, तब भी वे शब्द परमेश्वर के पास होते हैं।
व्यावहारिक रूप से, इसका अर्थ अपनी प्रार्थना को अपने जीवन के अनुसार ढालना है। यदि लम्बी सूचियाँ आपको भारी लगती हैं, तो दिन भर में छोटी-छोटी और बार-बार प्रार्थनाएँ करें। यदि आप भूल जाते हैं कि किन लोगों के लिए प्रार्थना करनी है, तो उनके नामों को कागज़ पर या किसी नोटबुक में लिख लें। परमेश्वर से वचन के अनुसार प्रार्थना करें: प्रभु की प्रार्थना, भजन संहिता, और वे अन्य प्रतिज्ञाएँ जिन्हें आपने वर्षों में स्मरण किया है। यदि आप लम्बे समय तक ऊँची आवाज़ में प्रार्थना नहीं कर सकते, तो जब भी लोग आपके मन में आएँ, जैसे परिवार, मित्र और आपकी कलीसिया के लोग तो उनके लिए छोटे-छोटे शब्दों में धीमे स्वर में प्रार्थना करें। क्योंकि जीवन भर की छोटी-छोटी प्रार्थनाएँ मिलकर फलदायी मध्यस्थता की एक विरासत बन जाती हैं!
एक बात और यह है कि, आयु बढ़ने के साथ आपकी प्रार्थनाएँ और भी अधिक प्रभावशाली हो सकती हैं। क्यों? क्योंकि आपने इतना जीवन जी लिया है कि आपने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता देखी है, और उसके धीरज को जाना है, और उसकी दया की गहराई को समझा है। आपका विश्वास बढ़ा है, और इसलिए उसका फल भी बड़ा होगा। इसलिए प्रार्थना करते रहें।
यद्यपि आप पहले के समान कार्य नहीं कर सकते हैं, परन्तु आप तब भी प्रार्थना कर सकते हैं। जब आप पहले के समान शिक्षा नहीं दे सकते, तब भी आप प्रार्थना कर सकते हैं। जब आप घर से बाहर नहीं जा सकते, तब भी आप प्रार्थना कर सकते हैं। और परमेश्वर की दृष्टि में यह कोई छोटा-मोटी सेवकाई नहीं, वरन् बहुत बड़ी सेवकाई है।
अभ्यास 3: आभारी होने का अभ्यास
आयु बढ़ने के साथ धीरे-धीरे शिकायत करने की प्रवृत्ति आ सकती है। चिड़चिड़े वृद्ध व्यक्ति की सामान्य छवि यूँ ही नहीं बनी है। शरीर में पीड़ा होने लगती है, ऊर्जा कम हो जाती है, और कभी-कभी ऐसा लगता है कि संसार हमारे बिना ही आगे बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी अधिक तेज, अधिक सक्षम और अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। बड़ी आयु के लोग अक्सर स्वयं को भुला हुआ महसूस कर सकते हैं। यदि हम सावधान न रहें, तो कड़वाहट मन में घर कर सकती है, और कड़वाहट कृतज्ञ होने की योग्यता को सीमित कर देती है। इसके विपरीत, सुसमाचार पर आधारित आभार उस योग्यता को बढ़ा देता है, इसीलिए अनुग्रह के साथ आयु बढ़ने का सबसे पक्का चिन्ह आभारी होना है।
बाइबल कृतज्ञता को आज्ञा देती है क्योंकि यह आपके जीवन के लिए परमेश्वर की इच्छा है: “हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यहीं इच्छा है।” (1 थिस. 5:18)। ध्यान दीजिए, यह ऐसा नहीं कहता कि “जब सब कुछ आसान हो तब धन्यवाद करो” या “जब आप जवान और बलवान हों तब धन्यवाद करो।” परन्तु यह कहता है, कि हर परिस्थिति में धन्यवाद करो। कृतज्ञता केवल स्वाभाविक रूप से प्रसन्न रहने वाले लोगों का स्वभाव नहीं है, परन्तु हर विश्वासी के लिए एक आत्मिक अनुशासन है, चाहे उनकी आयु कुछ भी हो। विशेष रूप से जब आयु बढ़ती रहती है।
अतः हम कृतज्ञता का अभ्यास कैसे करें? ठीक है, कृतज्ञता का अभ्यास करने के उतने ही अलग-अलग तरीके हैं जितनी अलग-अलग जीवन की परिस्थितियाँ होती हैं, लेकिन अभी के लिए, मैं आपको तीन बहुत ठोस तरीके बताना चाहता हूँ:
– आभारी होने के लिए एक डायरी रखें। हर दिन एक ऐसी बात लिखें जिसके लिए आप आभारी हैं। कुछ दिनों में आपके पास लिखने के लिए दर्जनों बातें होंगी। और कुछ दिनों में आपको एक भी बात ढूँढ़ने में कठिनाई होगी। लेकिन उन कठिन दिनों में भी आप परमेश्वर का धन्यवाद कर सकते हैं, जैसे क्षमा के लिए, जीवन के लिए, श्वास के लिए, भोजन के लिए, पुनरुत्थान की आशा के लिए, और उन अनेक वरदानों के लिए जो स्वर्ग से निरन्तर एक दिव्य प्रवाह के समान आप तक पहुँचते रहते हैं। और कुछ वर्षों के साथ, यही डायरी आपके जीवन में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की एक गवाही बन जाएगी।
– धन्यवाद के साथ प्रार्थना करें। फिलिप्पियों 4:6 कहता है: “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” किसी भी प्रार्थना को व्यर्थ मत जाने दो। जब भी आप परमेश्वर से बात करें, कुछ न कुछ ऐसा अवश्य खोजें जिसके लिए आप उसका धन्यवाद कर सकें। कृतज्ञता को अपने हृदय की पहली प्रवृत्ति बना लें। किसी भी बात के लिए प्रार्थना करना धन्यवाद से आरम्भ करें। आने वाले आशीषों की माँग करने से पहले, बीते हुए दिन की दया के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें।
– लोगों के प्रति आभार व्यक्त करें। अपने जीवनसाथी को बताइए कि आप उनके धीरज रखने के लिए आभारी हैं। अपने बच्चों या नाती-पोतों को उनकी छोटी-छोटी भलाई के लिए धन्यवाद दीजिए। जब भी अवसर मिले, अपने पासवान, पड़ोसी, मित्र या सहकर्मी का धन्यवाद कीजिए। आभार दूसरों में भी फैल जाता है, और जब वृद्ध पवित्र लोग इसे अच्छे से जीकर दिखाते हैं, तो पूरा समुदाय उससे प्रभावित हो जाता है।
आभार की विशेषता यह है कि यह उन बातों को बदल देता है जिनके प्रति हम शिकायत करने के लिए प्रलोभित होते हैं।
– झुर्रियाँ? धन्यवाद हो उन वर्षों की हँसी, बातचीत और अनुभवों के लिए, जो आपके चेहरे पर झलकते हैं।
– दाग और खिंचाव के निशान? अपने शरीर को कष्टों के बीच में सुरक्षित रखने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें।
– सफेद बाल? बुद्धि पाने के लिए पर्याप्त लम्बा जीवन जीने के सौभाग्य के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें (नीत. 16:31)। आभार वृद्धावस्था के चिन्हों को अनुग्रह की स्मृतियों में बदल देता है।
आभारी होने का भाव यह भी तय करता है कि दूसरे आपको कैसे देखते हैं। कोई भी व्यक्ति कडवाहट से भरे किसी वृद्ध पुरुष या स्त्री के साथ रहना पसंद नहीं करता है, लेकिन हर कोई उस आनन्द की ओर आकर्षित होता है जो एक आभारी पवित्र जन के जीवन में दिखाई देता है। आभारी मन एक आकर्षक प्रभाव डालता है, और जब लोग आपसे पूछें कि आप इतने आभारी क्यों हैं, तो आपको यह कहने का अवसर मिलेगा: “क्योंकि मसीह ने मुझे वह सब दिया है जिसे आयु कभी छीन नहीं सकती है।”
और यही इसका मूल है: आभारी होना इसलिए सम्भव है क्योंकि सुसमाचार सच्चा है। मसीह ने हमसे पहले ही क्षमा, लेपालक, अनन्त जीवन और पुनरुत्थान की प्रतिज्ञा की है। ये वरदान हर उस हानि, हर उस पीड़ा और हर उस दुर्बलता से बड़े हैं जो आयु बढ़ने के साथ आती है। इसीलिए, बंदीगृह में रहते हुए भी पौलुस लिख सका: “प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो” (फिलि. 4:4)। यदि पौलुस रोम में निश्चित मृत्यु की ओर बढ़ते हुए, बेड़ियों में जकड़े हुए भी आनन्दित हो सकता है, तो आप भी अपनी बढ़ती आयु में आनन्दित हो सकते हैं।
अभ्यास 4: समुदाय में बने रहें
बुढ़ापे का एक सबसे बड़ा खतरा अकेलापन है। जैसे-जैसे मित्र इस संसार से विदा होते चले जाते हैं, शारीरिक सीमाएँ हमें पहले के समान घर से बाहर निकलने से रोकने लगती हैं, और ऊर्जा भी कम होती चली जाती है, वैसे-वैसे मन में यह प्रलोभन भी आता है कि हम पीछे हट जाएँ और अकेलेपन को ही जीवन की नई सामान्य स्थिति मान लें। और जब हम ऐसा करते हैं, तो जीवन धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकने लगता है। हम पहले के समान कलीसिया में जाना कम कर देते हैं। हम मित्रों के साथ भोजन के निमंत्रण को ठुकराने लगते हैं। हम अपने आप से कहने लगते हैं कि हम दूसरों पर बोझ नहीं बनना चाहते हैं। और धीरे-धीरे अकेलापन हमारी नई आदत बन जाता है। लेकिन सच्चाई यह है: परमेश्वर कहता है कि मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं है (उत. 2:18)।
यह एक ऐसी सच्चाई है जो आयु बढ़ने के साथ समाप्त नहीं होती। भजन संहिता 92 में धर्मी जनों के विषय में कहा गया है: “वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे, जिससे यह प्रगट हो, कि यहोवा सच्चा है; वह मेरी चट्टान है, और उसमें कुटिलता कुछ भी नहीं।” (भज. 92:14–15)। इस संसार की वृद्धावस्था की सोच, जिसे आपने शायद बिना समझे ही अपने भीतर ग्रहण कर लिया हो, यह है कि हम अकेलेपन को अनिवार्य रूप से मान लेते हैं। लेकिन बाइबल की दृष्टि में वृद्धावस्था समुदाय से भरी हुई है, अर्थात् जैसे कलीसिया में सेवकाई, और फलदायी संगति से परिपूर्ण जीवन।
इसका अर्थ शीघ्र ही यह निकलता है कि परमेश्वर आपको आपकी स्थानीय कलीसिया के जीवन में यथासंभव गहराई से जुड़े रहने के लिए बुला रहा है। कलीसिया में जाना किसी वैकल्पिक बात के समान मानना आरम्भ न करें। हो सकता है कि आप पहले के समान सेवा न कर सकें, लेकिन आपकी उपस्थिति ही स्वयं एक सेवा है। जब युवा विश्वासी आपको अपने दुःख के बीच भी गाते हुए देखते हैं, साथ ही विश्वास के साथ प्रार्थना करते हुए देखते हैं, और परमेश्वर के वचन को ध्यान से सुनने के लिए आपको उत्सुक पाते हैं, तो यह उन्हें सिखाता है कि जीवन के हर पड़ाव में यीशु का अनुसरण करना कैसा दिखता है। आपका धैर्य उनका उत्साह बन जाता है।
समुदाय आपको सुरक्षित भी रखता है। नीतिवचन 18:1 चेतावनी देता है, “जो दूसरों से अलग हो जाता है, वह अपनी ही इच्छा पूरी करने के लिये ऐसा करता है, और सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है।” इस झूठ पर विश्वास मत कीजिए कि आप आयु बढ़ने के साथ-साथ स्वयं तथा अनिवार्य रूप से अधिक पवित्र बनते जाते हैं। पाप हर मानव-हृदय के द्वार पर घात लगाए बैठा रहता है, यहाँ तक कि वृद्ध लोगों के हृदयों में भी। एकांत केवल जोखिमों को बढ़ावा देता है, जबकि समुदाय सम्बन्ध, उत्तरदायित्व और आशा प्रदान करता है।
अतः जैसे-जैसे आपकी आयु बढ़ती जाती है, तो यह कैसा दिखता है?
आराधना से जुड़े रहें। भले ही आपको वहाँ पहुँचने में सहायता की आवश्यकता हो, फिर भी परमेश्वर के लोगों के साथ एकत्र होना अपनी प्राथमिकता बनाए रखें। इसे और भी व्यावहारिक रूप से कहें तो: कलीसिया जाने के लिए किसी से सवारी माँगने में संकोच न करें! यदि स्वास्थ्य आपको रोकता है, तो फोन पर बातचीत के द्वारा, मुलाकातों या छोटे समूहों के माध्यम से जुड़े रहें। यदि आपकी कलीसिया वीडियो या ऑडियो सेवाएँ उपलब्ध कराती है, तो उन्हें अवश्य सुनें! लेकिन डिजिटल (ऑनलाइन) जुड़ाव को शारीरिक संगति का स्थान न लेने दें।
पीढ़ियों के बीच सम्बन्धों में निवेश कीजिए। केवल अपने ही आयु-वर्ग के लोगों के साथ समय बिताकर संतुष्ट न रहिए। कलीसिया में युवा परिवारों, अविवाहित लोगों और बच्चों के साथ सम्बन्ध रखने तथा उनके जीवन में योगदान देने का प्रयास कीजिए। उन्हें आपके अनुभव और दृष्टिकोण की आवश्यकता है, और आपको उनके उत्साह और ऊर्जा से लाभ मिलेगा। यही तीतुस 2 की शिक्षा का व्यावहारिक रूप है: जहाँ वृद्ध पवित्र लोग युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं।
देखभाल स्वीकार करने के लिए तैयार रहिए। घमण्ड सहायता लेने से रोकता है, परन्तु दीनता उसे ग्रहण करती है। जब आपको सहायता की आवश्यकता हो, तो यह मत कहिए कि, “मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता हूँ।” परमेश्वर ने स्थानीय कलीसिया में हमें एक-दूसरे के बोझ उठाने के लिए कहा है (गल. 6:2)। अपनी आवश्यकता के समय कलीसिया के अन्य विश्वासियों को आपकी सेवा करने के द्वारा आशीषित होने से वंचित मत कीजिए। जब युवा विश्वासी आपका आँगन साफ करते हैं, आपको आवश्यक कामों या चिकित्सकीय जाँच के लिए ले जाते हैं, या आपके लिए भोजन लेकर आते हैं, तो यह आपका बोझ बनना नहीं है; यह उनका मसीह की व्यवस्था को पूरा करना है। उन्हें अपनी सेवा करने दीजिए, और वे भी इसके द्वारा आशीष पाएँगे।
अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ अलग-थलग पड़ जाने की प्रवृत्ति का विरोध करना है, परन्तु संगति में बने रहने का प्रयास करना है। हो सकता है कि आपको ऐसा लगे कि अब आपके पास देने के लिए बहुत कुछ नहीं बचा है, पर आपकी उपस्थिति, आपकी प्रार्थनाएँ और आपका विश्वास जितने मूल्यवान हैं, उतना शायद आप स्वयं भी नहीं जानते हैं। कलीसिया को यह नहीं चाहिए कि उसके वृद्ध पवित्र जन चुपचाप पीछे हट जाएँ। उसे उनकी आवश्यकता है कि वे बने रहें और प्रभावशाली रूप से उपस्थित रहें: गाएँ, बोलें, प्रोत्साहित करें, और उस विश्वास का आदर्श प्रस्तुत करें जो एक बार सदा के लिए पवित्र लोगों को सौंपा गया था।
अभ्यास 5: अपने स्वास्थ्य का बुद्धिमानी से प्रबन्ध कीजिए।
इस सच्चाई से बचा नहीं जा सकता कि बढ़ती आयु के साथ शारीरिक शक्ति घटती रहती है। शरीर पहले जैसा नहीं रहता, जोड़ों में दर्द होने लगता है, और किसी बीमारी या थकावट से उबरने में अधिक समय लगता है। कुछ लोग इस गिरावट का हर सम्भव तरीके से विरोध करते हैं। वे अत्यधिक आहार-नियमों, कठिन व्यायाम-पद्धतियों और अपने शरीर के हार्मोन तंत्र पर भिन्न-भिन्न प्रयोगों का सहारा लेते हैं, इस आशा में कि समय के प्रभाव को रोक सकें। दूसरी ओर, कुछ लोग इसे स्वीकार करके निष्क्रिय हो जाते हैं और आरामदायक कुर्सी तक ही सीमित रह जाते हैं, जिससे आलस्य और सुस्ती उनकी बची हुई शक्ति को भी कम कर देते हैं। परन्तु सुसमाचार हमें एक उत्तम तरीका बताता है: कि अपने वृद्ध होते हुए शरीर की बुद्धिमानी से देखभाल और उसका अच्छा प्रबन्ध करना है।
पौलुस लिखता है, “क्योंकि देह के प्रशिक्षण से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है।” (1 तीम. 4:8)। ध्यान दीजिए कि, पौलुस शारीरिक अभ्यास को महत्वहीन नहीं ठहराता। उसका कुछ लाभ अवश्य है, पर वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात नहीं है। बुद्धिमानी से प्रबन्ध करने का अर्थ उस शरीर की उचित देखभाल करना जो परमेश्वर ने आपको दिया है, इसलिए नहीं कि आप अपनी जवानी को हमेशा बनाए रख सकें, परन्तु इसलिए कि जब तक आप इस संसार में हैं, तब तक परमेश्वर के राज्य के लिए अधिक से अधिक उपयोगी बने रहें।
व्यावहारिक रूप से यह कैसा दिखाई देता है?
– नियमित रूप से सक्रिय रहिए। इसके लिए आपको किसी मजबूत माँशपेशियों वाले व्यक्ति के समान अत्यधिक भार उठाने या किसी लम्बी दूरी के खिलाड़ी के समान इंग्लिश चैनल तैरकर पार करने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु प्रतिदिन की शारीरिक गतिविधियाँ जैसे टहलना, शक्ति बढ़ाने वाले व्यायाम करना और शरीर को लचीला बनाए रखने वाले अभ्यास, लम्बे समय तक के लिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होते हैं। इसलिए तैयार हो जाएँ और सक्रिय बनें रहें। ऐसा व्यायाम चुनिए जो आपके लिए उपयुक्त हो, और फिर उसे नियमित रूप से करते रहें।
– बुद्धिमानी से भोजन कीजिए। चालीस वर्ष की आयु पार कर चुके अधिकाँश लोग जानते हैं कि बढ़ती हुई आयु के साथ शरीर की भोजन को ऊर्जा में बदलने की क्षमता धीमी पड़ने लगती है। आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर को भारी और सुस्त बना सकता है, परन्तु पोषण की उपेक्षा के कारण पर्याप्त भोजन न लेना भी हानिकारक हो सकता है। ऐसे भोजन का चुनाव कीजिए जो आपकी ऊर्जा बढ़ाए, न कि उसे कम करे, और इतना अवश्य खाइए कि आप अपने उत्तरदायित्वों और सेवकाई को विश्वासयोग्यता के साथ पूरा कर सकें। भोजन के विषय में संतुलित और संयमी दृष्टिकोण अपनाइए, और किसी बात की धुन में पड़ने या अति करने से बचें।
– अच्छा विश्राम कीजिए। कुछ लोगों के लिए बढ़ती आयु के साथ अच्छी नींद लेना कठिन हो जाता है। दूसरों के लिए यह आसान हो जाता है, और कुछ के लिए बहुत अधिक सरल हो जाता है। बात सीधी सी है कि: विश्राम शरीर को पुनः शक्ति प्राप्त करने, मन को स्पष्ट रखने और उपयोगी बने रहने के लिए आवश्यक है। इसे परमेश्वर के एक वरदान के रूप में सुरक्षित रखिए, परन्तु इसमें भी अति न करें। एक कारण है कि हम छह दिन काम करते हैं और एक दिन विश्राम करते हैं, बहुत अधिक विश्राम वास्तव में आराम नहीं देता है। वह हमें अपने उद्देश्य से दूर कर देता है। इसलिए परमेश्वर की महिमा के लिए अपने कार्य में लगे रहें, और जब आवश्यकता हो, तब थोड़ी देर विश्राम भी करें।
– चिकित्सक से परामर्श लेते रहें। बुद्धिमानी से प्रबन्ध करने का एक हिस्सा यह भी है कि हम चिकित्सा-विज्ञान से प्राप्त बुद्धि का लाभ उठाएँ। यीशु आपके प्राण का वैद्य है, परन्तु आपके शरीर को भी ऐसे ही चिकित्सक की आवश्यकता है जो आपके निकट उपलब्ध हो और आपकी शारीरिक देखभाल कर सके। नियमित स्वास्थ्य-जाँच, आवश्यक परीक्षण और उपचार आपके शरीर की देखभाल करने में सहायता कर सकते हैं। ऐसा केवल मृत्यु के भय के कारण नहीं, वरन् इसलिए करें क्योंकि आप उस जीवन को मूल्यवान समझते हैं जो परमेश्वर ने आपको दिया है। तब तक प्रतीक्षा न करें जब तक कि बीमारी इतनी बढ़ जाए कि चिकित्सा से बहुत कम सहायता मिल सके। जब आवश्यकता हो, चिकित्सक के पास जाएँ और आधुनिक चिकित्सा में परमेश्वर के सामान्य अनुग्रह को पहचानते हुए उस पर भरोसा रखें।
और इस बात को न भूलें: यदि आपकी प्रेरणा प्रेम है, तो अपने शरीर की देखभाल करना व्यर्थ अहंकार नहीं है। स्वस्थ बने रहने से आप कलीसिया की सेवा कर सकते हैं, अपने परिवार के साथ आनन्दित रह सकते हैं, और उस सुसमाचार की सेवकाई कर सकते हैं जिसने आपके शरीर और आत्मा दोनों का उद्धार किया है। बुद्धिमान प्रबन्धन केवल स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास नहीं है; परन्तु यह आराधना का भी एक कार्य है।
साथ ही, अपनी सीमाओं को भी स्मरण रखें। आप अपने वृद्धावस्था के पूरे जीवन में प्रतिदिन केल (पत्ता गोभी के समान) सब्जी खाएँ, तब भी वह आपको बूढ़ा होने से नहीं रोक सकती है। आप हर दिन घंटों तक शरीर को लचीला बनाने वाले व्यायाम करें, फिर भी हर बीतते दशक के साथ आपका शरीर अधिक अकड़ता जाएगा। आप बड़ी नियमितता और अनुशासन के साथ व्यायामशाला जाएँ, परन्तु कितना भी हृदय सम्बन्धी व्यायाम कर लें, वह आपके हृदय को सदा के लिए धड़कते नहीं रहने देगा।
अच्छा प्रबन्धन करने का अर्थ अपने नश्वर शरीर से बच निकलना नहीं है; वरन् उसे स्वीकार करना है, और फिर उस शरीर के द्वारा, जो परमेश्वर ने आपको दिया है, जब तक वह आपके पास है, परमेश्वर का आदर करना है।
इसलिए टहलने के लिए जाएँ। कोई भारी वस्तु उठाएँ। किसी अकड़े हुए जोड़ को खींचकर लचीला बनाएँ। सलाद (और थोड़ी-सी आइसक्रीम भी, संयम के साथ) खाएँ। और यह सब करते समय धन्यवाद देते रहें। आपका शरीर भले ही क्षीण होता जा रहा हो, फिर भी वह आश्चर्यजनक और अद्भुत रीति से रचा गया है।
अभ्यास 6: सौन्दर्य-वर्धक प्रक्रियाओं के विषय में
यह संभवतः इस पूरे भाग का, और शायद इस सम्पूर्ण जीवन-कौशल मार्गदर्शिका का भी सबसे संवेदनशील विषय है! फिर भी, हम इस पर विचार किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते कि जब हमारी युवावस्था का रूप-रंग धीरे-धीरे ढल रहा होता है, तब उसे बनाए रखने के प्रयासों के विषय में सुसमाचार क्या कहता है। इसलिए आइए इस कठिन प्रश्न पर विचार करें: सौन्दर्य-वर्धक प्रक्रियाओं के बारे में मसीहियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए? बालों में रंग लगाने से लेकर झुर्रियों को कम करने वाले इंजेक्शनों तक, कसा चेहरा या युवा दिखाने वाली शल्य-प्रक्रियाओं से लेकर, और दाँतों को सफेद कराने से लेकर पिंडलियों के प्रत्यारोपण तक, क्या ये तरीके मसीहियों के लिए अनुचित हैं? या क्या इन्हें स्वीकार् किया जा सकता है?
सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि बाइबल में ऐसी कोई आयत नहीं है जो स्पष्ट रूप से कहती हो, कि “आप अपने बालों में रंग न लगाएँ,” यद्यपि वह इस विषय के बहुत निकट अवश्य पहुँचती है (1 पत. 3:3)। फिर भी, हम यह कह सकते हैं कि बाइबल हमें सौन्दर्य और वृद्धावस्था के विषय में ऐसे सिद्धांत प्रदान करती है, जो मिलकर बुद्धिमानी की एक सुन्दर पुष्पमाला बना देते हैं।
एक ओर, परमेश्वर सौन्दर्य का विरोधी नहीं है। उसने सृष्टि को वैभव से सुशोभित किया और मन्दिर को उत्कृष्ट कारीगरी से भर दिया। नीतिवचन 31 उस स्त्री की प्रशंसा करता है जो बल और प्रताप का पहरावा पहने रहती है। इसलिए अपने रूप-रंग की देखभाल करना अपने आप में पाप नहीं है; वरन् अनेक बार यह अपने पड़ोसी से प्रेम करने और उसकी सेवा करने का एक धर्मी तरीका हो सकता है।
दूसरी ओर, पवित्रशास्त्र हमें चेतावनी देता है कि हम बाहरी सौन्दर्य और उससे हमारे व्यर्थ अभिमानी हृदयों पर पड़ने वाले प्रभाव से धोखा न खाएँ। “शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थ है, परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसकी प्रशंसा की जाएगी” (नीत. 31:30)। पतरस स्त्रियों से कहता है कि “वे गूँथे हुए बालों और उत्तम वस्त्रों पर ध्यान न दें, वरन् तुम्हारा छिपा हुआ और गुप्त मनुष्यत्व, नम्रता और मन की दीनता की अविनाशी सजावट से सुसज्जित रहे” (1 पत. 3:3–4)। बाहरी रूप-रंग अस्थायी है, परन्तु भीतरी चरित्र स्थायी मूल्य रखता है। और सच्ची सुन्दरता तब प्रकट होती है, जब भीतर का चरित्र बाहरी जीवन में झलकने लगता है।
इसलिए सौन्दर्य-वर्धक प्रक्रियाओं के लिए इसका क्या अर्थ है? यह संक्षिप्त जीवन-कौशल मार्गदर्शिका हमें प्रत्येक नैतिक पक्ष पर विस्तार से विचार करने का अवसर नहीं देती है, इसलिए आइए विषय के मूल तक पहुँचने का प्रयास करें। कई मायनों में यह चर्चा हमारी प्रेरणाओं पर आकर ठहर जाती है। यदि उद्देश्य अच्छा प्रबन्धन करना है, अर्थात् स्वयं को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना है, या अपने शरीर की उचित देखभाल करना, और आत्मविश्वास के साथ दूसरों से प्रेम करने तथा उनकी सेवा करने का प्रयास करना है, तो कुछ सौन्दर्य सम्बन्धी उपाय स्वीकार् किए जा सकते हैं। परन्तु यदि उद्देश्य वास्तविकता का इन्कार करना है, या ऐसा दिखाने का प्रयास कि आप वृद्ध नहीं हो रहे हैं, या युवावस्था की सुन्दरता और शक्ति को निराशा के साथ पकड़े रखना है, जबकि वे धीरे-धीरे आपसे दूर होती जा रही हैं. तो समस्या है।
इसे इस प्रकार से सोचिए: कि आप अपने सफेद बालों को रंग से ढक सकते हैं, या उन्हें महिमा के मुकुट के समान धारण कर सकते हैं (नीत. 16:31)। यदि आप इसे किसी और में देखें, तो इनमें से कौन सी बात अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अधिक अच्छा उदाहरण प्रतीत होगी? बालों में रंग लगाना आवश्यक रूप से पाप नहीं है, परन्तु अपने बीते हुए वर्षों को गरिमा के साथ, बिना किसी लज्जा के स्वीकार करना सुसमाचार की एक सामर्थी गवाही है। यह परिपक्व मसीही व्यक्ति के चिन्हों में से एक है, वृद्ध होने की स्वाभाविक प्रक्रिया को बिना भय और बिना लज्जा के स्वीकार करना। साथ ही, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि कोई व्यक्ति पूरी रीति से सफेद बालों को बनाए रखकर भी स्वयं की धार्मिकता पर घमण्ड कर सकता है। क्या आप देख सकते कि मनुष्य का हृदय कितना चालबाज हो सकता है?
व्यावहारिक रूप से यह सलाह हमें ऐसे कठिन प्रश्न पूछने के लिए कहती है, जैसे:
– क्या मैं यह प्रक्रिया दूसरों की सेवा करने के उद्देश्य से कर रहा हूँ, या अपने घमण्ड को बढ़ाने के लिए कर रहा हूँ?
– क्या मैं परमेश्वर का आदर करने का प्रयास कर रहा हूँ, या वास्तविकता से भाग रहा हूँ?
– क्या इससे लोगों का ध्यान मुझमें वास करने वाले मसीह पर जाएगा, या उन प्रयासों की ओर जाएगा जिनके द्वारा मैं उन वर्षों को छिपा रहा हूँ, जो उसने मुझे दिए हैं?
इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि आप लोशन का भी उपयोग नहीं कर सकते हैं, अपने दाँतों का उपचार नहीं करा सकते हैं, या गंजेपन को ढकने के लिए बालों को व्यवस्थित नहीं कर सकते हैं। अपने शरीर की देखभाल करना मानो जैसे बगीचे की देखभाल करने के समान है: खरपतवार निकालने से मत डरिए, और फूलों की सुन्दरता को सँवारने में भी संकोच मत कीजिए! परन्तु यह स्मरण रखें: कि प्रबन्धन और व्यर्थ अभिमान बाहर से देखने पर अधिकतर एक जैसे ही दिखाई देते हैं। उनके बीच का अन्तर प्रायः केवल परमेश्वर ही हृदय में देखकर जानता है। एक व्यक्ति कहता है, कि “हे परमेश्वर, इस शरीर और जीवन के इन वर्षों के लिए तेरा धन्यवाद। मेरी सहायता कर कि मैं इनका अच्छा उपयोग करूँ।” वहीं दूसरा व्यक्ति कहता है, कि “मैं अपनी आयु के अनुसार दिखने से इन्कार करता हूँ, क्योंकि मेरा मूल्य मेरे रूप-रंग में ही है।”
हमारे समय की एक त्रासदी यह है कि कितने लोग सौन्दर्य को बनाए रखने के नाम पर वास्तव में सौन्दर्य-वर्धक प्रक्रियाओं के द्वारा स्वयं को विकृत कर लेते हैं। जो बात एक छोटे से सुधार से आरम्भ होती है, वह अक्सर युवावस्था की सुन्दरता को बनाए रखने की कभी न समाप्त होने वाली खोज में बदल जाती है। चेहरों की त्वचा अत्यधिक कस दी जाती है, बोटॉक्स (इंजेक्शन) चेहरे के भावों को भावहीन बना देता है, और शरीर वास्तविक न लग कर कृत्रिम लगने लगते हैं। विडम्बना यह है कि वृद्धावस्था के चिन्हों से लड़ने के प्रयास में बहुत से लोग (स्त्री और पुरुष दोनों) अपने धीरे-धीरे दुर्बल होते हुए शरीर को और भी अधिक नाटकीय तरीके से प्रदर्शित करने लगते हैं।
यह केवल सौंदर्य की ही समस्या नहीं, परन्तु एक आत्मिक समस्या भी है। हमारे शरीर को जीवन के विभिन्न पड़ाओं की सच्चाई प्रकट करनी चाहिए। आयु बढ़ने के चिन्हों को पूरी रीति से मिटा देने का प्रयास न केवल असंभव है, वरन् किसी अर्थ में यह उस कथा को चुप कराने का प्रयास है जिसे परमेश्वर आपके शरीर में लिख रहा है। और जब हम बहुत आगे तक इसे दबाने की कोशिश करते हैं, तो परिणाम अस्वाभाविक और कभी-कभी विकृत हो जाते हैं, क्योंकि हम एक ऐसे सत्य का विरोध कर रहे होते हैं जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता है।
मसीही होने के नाते हमें उन लोगों का उपहास नहीं करना चाहिए जो शल्य-चिकित्सा कराते हैं या इंजेक्शन लेते हैं। हर ऐसी प्रक्रिया के पीछे एक ऐसा मन होता है जो स्वाभाविक रूप से पतित शरीर में आयु बढ़ने के प्रभावों से डरता है। महिमामय शरीर की ऐसी लालसाएँ मूलतः गलत नहीं हैं, परन्तु उनका मार्ग भटका हुआ होता है। सुसमाचार हमें बताता है कि हमारी नश्वरता का उत्तर अपनी क्षीण होती हुई युवावस्था को अत्यधिक पकड़े रहना नहीं है, वरन् अपनी आशा उस अविनाशी सुन्दरता पर टिकाए रखना है जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की है: वह न मुरझाने वाला महिमा का मुकुट, वह पुनरुत्थित देह जो कभी झुर्रियों या ढीलापन से प्रभावित नहीं होगी, और मसीह की वही सुन्दरता जो हमारे भीतर से प्रकाशित होगी।
इसलिए, जब संसार युवावस्था की विकृत नकल की ओर अंधाधुंध दौड़ में लगा हुआ है, तो हमें इससे कहीं उत्तम बात के लिए बुलाया गया है: अर्थात् अपने शरीर के नष्ट होने के विषय में ईमानदार रहना, और शरीर के नए होने में आशा रखना है।
अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि आप अपने शरीर को अनदेखा करें, और न ही इसका अर्थ यह है कि आप युवावस्था को अपना आदर्श मान लें। इसका अर्थ यह है कि अपने वर्षों को सम्मान के साथ स्वीकार करना, अपने शरीर का सेवा में उपयोग करना, और अपने जीवन से यह गवाही देना कि मसीह आपका खजाना है, न कि दर्पण में दिखने वाला आपका प्रतिबिंब है।
मनन के लिए प्रश्न:
- जब आप इस बात के विषय में सोचते हैं कि लोग सौंदर्य प्रक्रियाओं के माध्यम से युवावस्था को बनाए रखने का प्रयास कैसे करते हैं, तो आपके मन में कौन सी भावनाएँ या विचार आते हैं: जैसे सहानुभूति, दुःख, आलोचना, प्रलोभन, या कुछ और?
- पवित्रशास्त्र में दिया गया गरिमा और आशा के साथ वृद्ध होने का दृष्टिकोण, सदा युवा दिखने के प्रति अत्यधिक सांस्कृतिक लगाव को किस प्रकार चुनौती देता है?
- आप किस प्रकार व्यावहारिक रूप से परमेश्वर की योजना के अनुसार वृद्ध होने की सुन्दरता को स्वीकार करना आरम्भ कर सकते हैं, और यह आपको मसीह में एक उत्तम आशा की गवाही देने में किस प्रकार सहायता कर सकता है?
भाग V: महिमा की ओर कराहते हुए
बुढ़ापा अपने साथ एक आवाज को लेकर आता है: अर्थात् करहाना। जैसे-जैसे आप आयु में आगे बढ़ते हैं, यह आपको अधिक तेज और अधिक बार सुनाई देती है। और ऐसा होता रहता है। कराहना शरीर को यह कहता है कि, “मैं अब वह नहीं रहा जो पहले था, लेकिन मैं चलता रहूँगा।”
और फिर भी, बाइबल हमें बताती है कि कराहना केवल आयु का एक लक्षण नहीं है, यह आत्मिक भी है। पौलुस रोमियों 8:22–23 में लिखता है: “क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। और केवल वही नहीं पर हम भी जिनके पास आत्मा का पहला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की प्रतीक्षा करते हैं।”
और फिर 2 कुरिन्थियों 5:2 में भी लिखता है: “इसमें तो हम कराहते, और बड़ी लालसा रखते हैं; कि अपने स्वर्गीय घर को पहन लें।” पौलुस का आशय स्पष्ट है: कि जीवन की पीड़ाएँ और करहाना हमारी पतित स्थिति का स्मरण दिलाते हैं, और उस आने वाले जीवन के लिए एक गहरी, भीतरी लालसा को जगाते हैं। प्रत्येक करहाने को हमें यह स्मरण कराना चाहिए: कि यह संसार मेरा घर नहीं है, और यह शरीर मेरा अन्तिम शरीर नहीं है।
बाइबल इस सत्य को मीठा बनाकर प्रस्तुत नहीं करती है। बाहरी रूप से हम क्षीण होते जा रहे हैं (2 कुर. 4:16)। वह शरीर जो कभी आसानी से दौड़ता, उठाता, नाचता और काम करता था, अब धीरे-धीरे धीमा पड़ने लगा है, जकड़ा हुआ लगता है और दुर्बल होता चला जाता है। लेकिन धीरे-धीरे शरीर का दुर्बल होना कहानी का अन्त नहीं है। पौलुस 1 कुरिन्थियों 15:42–44 में हमारी दृष्टि को महिमा की ओर उठाता है, और लिखता है: “मुर्दों का जी उठना भी ऐसा ही है। शरीर नाशवान दशा में बोया जाता है, और अविनाशी रूप में जी उठता है। वह अनादर के साथ बोया जाता है, और तेज के साथ जी उठता है; निर्बलता के साथ बोया जाता है; और सामर्थ्य के साथ जी उठता है।स्वाभाविक देह बोई जाती है, और आत्मिक देह जी उठती है: जब कि स्वाभाविक देह है, तो आत्मिक देह भी है।”
प्रत्येक साँस का करहाना हमें यह स्मरण दिलाता है कि मृत्यु का बीज बोया जा रहा है। लेकिन परमेश्वर का वचन हमें यह भी बताता है कि उसी बीज से कुछ अविनाशी, महिमामय, सामर्थी और आत्मिक उत्पन्न होगा। कुछ सिद्ध होगा। वह कम वास्तविक नहीं, परन्तु अधिक वास्तविक होगा। वह कम देहधारी नहीं, वरन् अधिक पूर्ण मनुष्यत्व में होगा। और पौलुस हमें बताता है कि यह परिवर्तन कहाँ से आता है: “प्रभु यीशु मसीह, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा। …” (फिलि. 3:21)
मसीही आशा किसी देह रहित आत्मा की नहीं है, जो बादलों में तैरती फिरती हो; वरन् यह पुनरुत्थित और महिमामयी देह की आशा है, जो छुटकारा पाई हुई और नयी की गई सृष्टि में वास करती है।
तो इस बीच हमें क्या करना चाहिए? हम कराहते हैं, परन्तु निराशा में नहीं, लेकिन आशा के साथ। हमारा कराहना प्रसव-पीड़ा के समान है (रो. 8:22): वह पीड़ा से भरी होती है, पर साथ ही आने वाले आनन्द की प्रतीक्षा से भी भरी हुई होती है। प्रत्येक दिन हमारी देह हमें स्मरण दिलाती है कि यह संसार नष्ट हो रहा है, और प्रत्येक दिन हमारे भीतर वास करने वाला पवित्र आत्मा हमें स्मरण दिलाता है कि महिमा आने वाली है। और वह समय अब अधिक दूर नहीं है!
इसलिए जब आप बिस्तर से उठते समय अपने शरीर में जकड़न और बढ़ती आयु का अनुभव करते हुए आह भरते हैं, तो उस कराहने को आप कड़वाहट की ओर ले जा सकते हैं (“मैं टूटता जा रहा हूँ, और अब आगे केवल गिरावट ही गिरावट है”) या फिर उसे आशा की ओर ले जा सकते हैं (“यह कराहना इस बात का संकेत है कि आज मैं महिमा के उतना ही अधिक निकट हूँ जितना कल नहीं था।”)
आइए इसे व्यवहारिक रूप से समझें: भविष्य में मिलने वाली महिमामय देह का यह ज्ञान आज हमारे जीवन जीने के तरीके को कैसे बदलता है?
– यह हमें धीरज प्रदान करता है। यह जानना कि एक नई देह आने वाली है, हमें वर्तमान देह की सीमाओं के बीच भी बने रहने में सहायता करता है।
– यह हमारी पहचान को स्थिर आधार प्रदान करता है। हमारा मूल्य युवावस्था की शक्ति और स्फूर्ति में नहीं, परन्तु परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा में पाया जाता है कि वह हमें एक नई और कहीं अधिक उत्तम देह देगा, जो मसीह के स्वरुप के अनुसार बनाई जाएगी।
यदि ये शरीर अस्थायी हैं, तो यह अत्यन्त आवश्यक है कि समय समाप्त होने से पहले हम उनका उपयोग दूसरों को मसीह में लाने के लिए करें। परन्तु आप तो कराह रहे हैं, इसलिए उठिए और कार्य में लग जाइए!
पौलुस ने 2 कुरिन्थियों 4:16–18 में इसे बहुत अच्छी रीति से संक्षेप में कहा है: “इसलिए हम साहस नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तो भी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।क्योंकि हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।”
एक दिन वह अन्तिम कराह भी होगी—अन्तिम श्वास, अन्तिम पीड़ा, और यह अन्तिम स्मरण भी होगा कि हमारी देह हमारा साथ छोड़ रही है। परन्तु मसीही के लिए वह कराहना अन्त नहीं, परन्तु आरम्भ है। उस अन्तिम कराहने के पार महिमा, नया जीवन, और हमारे प्रभु की उपस्थिति में अनन्त आनन्द है। हमारा कराहना गीत में बदल जाएगा, और उस स्थान में हमारी साँस कभी नहीं टूटेगी।
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मनन के लिए प्रश्न:
- आप किन-किन तरीकों से अपने मूल्य को बाहरी सामर्थ्य या रूप-रंग के आधार पर आँकने के लिए प्रलोभित होते हैं, और सुसमाचार उस दृष्टिकोण को किस प्रकार सुधारता है?
- अपनी दुर्बलता को परमेश्वर की योजना का एक भाग मानकर स्वीकार करने से किस प्रकार उस पर आपकी निर्भरता और दूसरों के लिए आपकी उपयोगिता और अधिक बढ़ सकती है?
- आपके जीवन में ऐसा कौन है जिसे इस प्रोत्साहन की आवश्यकता है कि बढ़ती आयु मूल्य में कमी नहीं लाती, वरन् दुर्बलता के बीच में परमेश्वर की सामर्थ्य को प्रकट करने का एक अवसर प्रदान करती है?
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निष्कर्ष: उद्देश्य के साथ आगे बढ़ते रहना
अनुग्रह के साथ वृद्धावस्था की ओर बढ़ना संयोग से नहीं होता है। इसके लिए ऐसे जानबूझकर अपनाए गए दैनिक अभ्यासों की आवश्यकता होती है जो मसीह में जड़ पकड़े हुए हों। प्रश्न केवल यह नहीं है कि बढ़ती आयु का सामना कैसे किया जाए, वरन् यह है कि जीवन के इस पडाव को उद्देश्य, विश्वास और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसे के साथ कैसे अपनाया जाए। वृद्धावस्था एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे हम छोटे-छोटे कदमों के द्वारा गुजरते हैं, परमेश्वर के वचन पर निर्भर रहते हुए, प्रार्थना में उससे बात करते हुए, कृतज्ञ बने रहते हुए, उसके लोगों के साथ जुड़े रहते हुए, और अपनी देह की बुद्धिमानी से देखभाल करते हुए। ये साधारण से कार्य हमें अपनी दौड़ अच्छी रीति से पूरी करने में सहायता करते हैं, ताकि हम बढ़ती हुई आयु के भय के साथ नहीं, परन्तु जीवन के प्रत्येक पड़ाव में मसीह की सेवा करने के आनन्द के साथ आगे बढ़ें।
फिलिप्पियों के नाम पौलुस के वचन यहाँ विशेष रूप से साकार प्रतीत होते हैं: “निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ, जिसके लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है” (फिलि. 3:14)। इसलिए बढ़ती आयु कोई ऐसी बात नहीं है जिससे हम भय खाएँ, वरन् यह अनुग्रह और उद्देश्य के साथ परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में आगे बढ़ने का एक अवसर है।
लेखक के बारे में
सीन अलाबामा के डेकेटर नगर में स्थित सिक्स्थ एवेन्यू कम्युनिटी चर्च के पास्टर हैं। “जब मै अठारह वर्ष का था, तब प्रभु ने मुझे मेरे पापों से बचाया, और तब से मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा (फिलि. 3:14)। सेना में पाँच वर्ष सेवा करने के बाद, प्रभु ने हमारे परिवार को सुसमाचार प्रचार-प्र-सारक के रूप में पेरू भेजा, और फिर 2015 में हमें वापस संयुक्त राज्य अमेरिका ले आया। मेरी पत्नी एम्बर और हमारे दो सुन्दर बच्चे हैं। पेशन्स और इसाबेला। जब मैं कलीसिया की सेवा में व्यस्त नहीं होता है, तो मुझे व्यायाम करना, आत्मरक्षा-कला का अभ्यास करना, अच्छी पुस्तके पढ़ना और पिताजी वाले मज़ाक सुनाना पसन्द है।”
विषयसूची
- भाग I: बढ़ती हुई आयु के विषय में बाइबल आधारित दृष्टिकोण
- अनुग्रह के साथ बुढ़ापे की ओर बढ़ना
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: वे झूठ जो हमारी संस्कृति हमें सिखाती है
- झूठ #1: जीवन 25 वर्ष की आयु में अपने चरम पर होता है।
- झूठ #2: बुढ़ापे का अर्थ महत्वहीन होना है
- झूठ #3: मृत्यु मेरे पास नहीं आएगी
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: बढ़ती हुई आयु के साथ परमेश्वर के द्वारा दिए जाने वाले अनुग्रह
- बुद्धिमानी और आत्मिक परिपक्वता
- मार्गदर्शन
- परख
- दृष्टिकोण
- धीरज
- दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका
- विरासत
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: अनुग्रह के साथ वृद्ध होने के लिए व्यावहारिक सलाह
- अभ्यास 1: परमेश्वर के वचन में जड़ पकडे रहें
- अभ्यास 2: प्रार्थना करते रहें
- अभ्यास 3: आभारी होने का अभ्यास
- अभ्यास 4: समुदाय में बने रहें
- अभ्यास 5: अपने स्वास्थ्य का बुद्धिमानी से प्रबन्ध कीजिए।
- अभ्यास 6: सौन्दर्य-वर्धक प्रक्रियाओं के विषय में
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग V: महिमा की ओर कराहते हुए
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष: उद्देश्य के साथ आगे बढ़ते रहना
- लेखक के बारे में