#97 अनुग्रहपूर्ण वृद्धावस्था: जीवन के अन्तिम वर्षों में मार्गदर्शन करना

By Sean Demars (सीन डीमार्स)

परिचय: एक प्राण जो वृद्ध होता जा रहा है

हाल ही मैं चालीस वर्ष का हुआ हूँ। यह लिखना भी कुछ अजीब सा लग रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे साथ भी ऐसा होगा। मेरे बाल सफ़ेद होने लगे हैं। मेरे जोड़ों में दर्द रहने लगा है। लोग अब मेरे साथ पहले जैसा व्यवहार नहीं करते हैं। अब मुझे पहले की तुलना में कहीं अधिक “श्रीमान” और “महाशय” कहकर संबोधित किया जाता है। यह शिष्टता तो है, पर साथ ही यह एक स्मरण भी दिलाता है कि अब मैं कमरे में उपस्थित सबसे युवा व्यक्ति नहीं रहा। न ही अब मैं पहले जैसा आकर्षक समझा जाता हूँ। और ऐसा लगता है कि चाहे मैं कितना भी संतुलित भोजन करूँ या कितने भी परिश्रम से व्यायाम करूँ, इस आयु में बाहर निकलते हुए पेट से बच पाना मेरे लिए संभव नहीं है।

जब मैं बीस वर्ष का था, तब मैं सोचता था कि बुढ़ापा दूसरों के लिए है। या यदि वह मेरे लिए भी है, तो वह इतना दूर है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन अब वह समय आ पहुँचा है, और मैं इस सच्चाई को समझने लगा हूँ कि मैं भी, हर दूसरे व्यक्ति के समान वृद्ध होता जा रहा हूँ। और जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ रही है, मैं यह भी समझ रहा हूँ कि वृद्ध होना केवल शारीरिक प्रक्रिया ही नहीं, वरन् आत्मिक प्रक्रिया भी है। अनुग्रह के साथ वृद्ध होने का अर्थ है कि उन अनिवार्य परिवर्तनों को स्वीकार करना जो आयु के साथ होते हैं, और साथ ही अपने जीवन के लिए परमेश्वर की योजना पर अपने विश्वास और भरोसे को और अधिक गहरा करना है।

मैं वृद्धावस्था का कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ। मैं यह मार्गदर्शिका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिख रहा हूँ जो अपने नष्ट होने की वास्तविकता से जूझ रहा है, जो सचमुच अपनी हड्डियों में कमी होने की प्रक्रिया को महसूस कर रहा है। आपके ही समान मेरे वृद्ध होते हुए प्राण को भी सेवा और सामर्थ्य देने के लिए सुसमाचार रूपी औषधि की आवश्यकता है।

बढ़ती हुई आयु ने मेरे हृदय में छिपे हुए पापों को उजागर कर दिया है: अहँकार, रूप-रंग पर व्यर्थ घमण्ड, और उन बातों को नियंत्रित करने की इच्छा जिन्हें मैं नियंत्रित नहीं कर सकता हूँ। वृद्धावस्था के विषय में बाइबल की आयतें इस प्रकार कहती हैं, जैसे कि भजन संहिता 71:9 (“बुढ़ापे के समय मेरा त्याग न कर; जब मेरा बल घटे तब मुझ को छोड़ न दे”) इस वचन ने मुझे उस बुद्धि पर मनन करने में सहायता की है जो आयु बढ़ने के साथ आती है। बढ़ती आयु मुझे दिखा रही है कि संसार कितनी शीघ्रता से मेरे बिना आगे बढ़ रहा है, और मेरा हृदय इस वास्तविकता का सामना करने में कितना संघर्ष कर रहा है। यह मुझे बताती है कि मेरा यौवन बीत चुका है और वह कभी लौटकर नहीं आएगा, चाहे दीर्घायु का दावा करने वाले विशेषज्ञ मुझे कुछ भी बेचने का प्रयास करें। और यदि मैं अपनी आयु की वास्तविकता का सामना सुसमाचार से मिलने वाली आशा के साथ नहीं करूँगा, तो मैं कड़वाहट से भर जाऊँगा, चिन्ता में डूब जाऊँगा, या फिर समय के साथ जो कुछ खो रहा हूँ उसे बचाए रखने की धुन में लग जाऊँगा।

सुसमाचार एक बेहतर मार्ग प्रस्तुत करता है। यह मुझे बताता है कि यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश होता जा रहा है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन-प्रतिदिन नया बनाया जा सकता है (2 कुरिन्थियों 4:16)। यह मुझे बताता है कि मृत्यु अन्तिम शब्द नहीं है, क्योंकि पुनरुत्थान आ रहा है। और यह मुझे यह भी बताता है कि मेरा मूल्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि मैं जवान, स्वस्थ या लोगों की दृष्टि में आकर्षक हूँ, परन्तु इस बात पर निर्भर करता है कि मैं मसीह में पाया जाता हूँ। विश्वासयोग्यता के साथ वृद्ध होने का अर्थ यह भरोसा रखना होता है कि हमारे लिए परमेश्वर के उद्देश्य बढ़ती हुई आयु के साथ कम नहीं होते हैं।

मैं यह जीवन-कौशल मार्गदर्शिका इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे इन सच्चाइयों की आवश्यकता है कि वे मेरे प्राण की सेवा करें, और शायद आपको भी उनकी आवश्यकता होगी। संभव है कि आपने बढ़ती हुई आयु की चुभन को महसूस किया होगा, ऐसी देह की निराशा का अनुभव किया होगा जो पहले के समान साथ नहीं देती है, या अपने आसपास के युवा चेहरों के प्रति मन में खीझ रखने के प्रलोभन का सामना किया होगा। यदि ऐसा है, तो आइए इस मार्ग पर साथ-साथ चलते हैं। हो सकता है कि हमारी आयु बढ़ रही हो, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से हम विश्वासयोग्यता के साथ वृद्ध होना भी सीख सकते हैं, और हाँ, ऐसा वृद्ध होना भी सीख सकते हैं जो वास्तव में सुन्दर है।

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