#57 बुद्धि की खोज करना
भूमिका बाँधना: बुद्धि क्या है?
आप दूसरे लोगों में सबसे अधिक किस बात को महत्व देते हैं? हम अक्सर लोगों की बुद्धिमानी, योग्यता और सफलता की सराहना करते हैं, परन्तु आखिरी बार आपने कब किसी की बुद्धि के लिए उसकी बड़ाई सुनी थी? कुछ लोगों के लिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति की छवि ऐसी होती है, कि शायद वह कोई दूर बैठा व्यक्ति हो, जो समाज से सेवानिवृत्त होकर शान्त ध्यान में लीन हो। इस दृश्य के विपरीत, मसीहियों के लिए, बुद्धि की खोज हमारे जीवनों का एक मुख्य विषय है।
नीतिवचन की पुस्तक, जिसे इसलिए लिखा गया था, ताकि हम “बुद्धि प्राप्त करें” (नीति. 1:2), जो बुद्धि को हमारी किसी भी दूसरी बात से ऊपर रखती है। नीतिवचन की पुस्तक हमें सिखाती है कि “जो अपने ऊपर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है” (नीति. 28:26)। इसका लेखक हमें समझाता है कि हम एक घनिष्ठ मित्र की तरह बुद्धि की खोज करें (नीति. 7:4)। हमें यह भी याद दिलाया गया है कि बुद्धि “मूँगे से अधिक अनमोल है” (नीति. 3:15), क्योंकि बुद्धि को पाना ही असल में जीवन को पाना है (नीति. 8:35)। नये नियम में, मसीहियों को यह भी समझाया गया है कि “इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो: निर्बुद्धियों के समान नहीं पर बुद्धिमानों के समान चलो” (इफि. 5:15)।
चूँकि बुद्धि ही मसीही विश्वास का केन्द्र-बिन्दु है, परन्तु आज के समाज में इसे अनदेखा किया जाता है, इसलिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि बुद्धि क्या है। यदि हम बुद्धि की खोज करना चाहते हैं, तो हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम किस बात की खोज में हैं।
बुद्धि को एक ऐसी क्षमता के तौर पर सोचें, जो किसी व्यक्ति को उस बात को लागू करने में सक्षम बनाती है, जिसे वह जानता है। एक कुशल कारीगर वह होता है, जिसे न केवल यह मालूम होता है कि हर औजार किस काम आता है और किस परियोजना के लिए कौन सा सामान उपयोग करना है, बल्कि वह उस जानकारी को समझदारी से काम में लाते हुए कुछ काम के और सुन्दर सामान भी बना सकता है। बुद्धि एक ऐसा कौशल है, जो लोगों को किसी विशेष उद्देश्य को पाने के लिए आवश्यक साधनों का उपयोग करने में सक्षम बनाती है। अत:, बुद्धि केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि उस जानकारी का सबसे अच्छे तरीके से उपयोग करने की क्षमता है। इसका अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति सैद्धांतिक तौर पर यह तो जान सकता है कि नाव कैसे बनाई जाती है (कौन सा सामान उपयोग करना है, कौन से औजार चाहिए, प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए), और वह स्वयं नाव बनाने में सक्षम न हो। कुछ पकाने की विधि का होना एक बात है। परन्तु उसे कैसे पकाना है, यह जानना बिलकुल अलग बात है। बाइबल में, हमारे पास यूसुफ जैसे उदाहरण हैं, जिसने कुशलता से मिस्र पर शासन किया और जिसके बारे में फ़िरौन ने कहा था कि “तेरे तुल्य कोई समझदार और बुद्धिमान नहीं” (उत्प. 41:39)। या इनके बारे में सोचिए—“बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमान जिनको यहोवा ने ऐसी बुद्धि और समझ दी हो कि वे यहोवा की सारी आज्ञाओं के अनुसार पवित्रस्थान की सेवा के लिये सब प्रकार का काम करना जानें, वे सब यह काम करें” (निर्ग. 36:1; 1 राजा. 7:14)।
Tयह जीवन कौशल मार्गदर्शिका बुद्धि की बुनियादी बातों को और उसे कैसे प्राप्त किया जाए, इसको सम्बोधित करती है। यह बुद्धिमान होने के अर्थ को समझने के साथ-साथ यह जानने का प्रयास करती है कि बुद्धिमान कैसे बना जाए। हम इस बात पर अधिक ध्यान नहीं देंगे कि हर तरह का निर्णय कैसे लिया जाए,[1]
बल्कि हम इस बात पर विचार करेंगे कि जीवन में हमें जो अनगिनत निर्णय लेने पड़ते हैं, उनके लिए बुद्धि को पाने का प्रयास करने का क्या अर्थ होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बुद्धि की खोज करना एक बुद्धिमान मनुष्य बनने का कार्य है। निर्णय लेना चुनाव करने का एक काम होता है—यह एक ऐसा विशेष काम है, जो उस बुद्धि को दर्शाता है, जिसे किसी ने विकसित किया है। बुद्धि की खोज केवल निर्णय लेने के दायरे में नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण के दायरे में आती है।
अत:, हम बुद्धि की खोज करने के अभ्यास पर ध्यान देंगे। हम ईश्वरीय बुद्धि की खोज करने के पाँच तरीकों को समझेंगे, जो आपस में जुड़े हुए हैं। कुछ तरीके अधिक बुनियादी हैं, परन्तु आप और मैं बुद्धिमान बन सकें, इसके लिए उन सभी तरीकों की आवश्यकता है।
- प्रभु का भय—सच्ची बुद्धि की नींव
- मसीह—बुद्धि देहधारी हुई और छुड़ाई गई
- प्रार्थना—पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बुद्धि की खोज करना
- पवित्रशास्त्र—बुद्धि का स्रोत और मार्गदर्शक
- स्थानीय कलीसिया—बुद्धि की खोज के लिए एक ढाँचा
आइए, बुद्धि की खोज के इनमें से सबसे बुनियादी तरीके से आरम्भ करें:
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#57 बुद्धि की खोज करना
भाग I: प्रभु का भय—सच्ची बुद्धि की नींव
बाइबल की पहली पुस्तक इन शब्दों से आरम्भ होती है: “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की” (उत्प. 1:1)। इस सरल, फिर भी गहन परिचय से हम सीखते हैं कि केवल एक ही परमेश्वर है, और उसने सब कुछ बनाया है। कुछ और आयतों के बाद, हम पढ़ते हैं कि “तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया” (उत्प. 1:27)। मनुष्यों को स्वयं परमेश्वर का प्रतिबिम्ब बनने के लिए रचा गया था। मनुष्य स्वयं दिव्य प्राणी नहीं हैं, बल्कि उन्हें परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया है। चूँकि परमेश्वर ही सृष्टिकर्ता है और हम उसके स्वरूप में रची गई सृष्टि हैं, इसलिए यदि हम स्वयं को जानना चाहते हैं, तो हमें यह जानना होगा कि परमेश्वर कौन है।
बाइबल यह भी सिखाती है कि “यहोवा ने पृथ्वी की नींव बुद्धि ही से डाली” (नीति. 3:19), “इन सब वस्तुओं को तू ने बुद्धि से बनाया है” (भज. 104:24), और यह कि “सब वस्तुएँ विशेष उद्देश्य के लिये बनाई हैं” (नीति. 16:4)। “तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है” (उत्प. 1:31)।
कला के किसी नमूने की कल्पना कीजिए, जो शायद कोई चित्रकारी या मूर्ति हो। कोई देखने वाला उसके रंगों, बनावट और रेखाओं का अध्ययन कर सकता है, और उसके अर्थ तथा उद्देश्य के बारे में अपने सिद्धान्त बता सकता है। हालाँकि, उनकी ये टिप्पणियाँ केवल अटकलें होती हैं, या अधिक से अधिक, जो कुछ वे देख पाते हैं, उसी पर आधारित निष्कर्ष होते हैं। केवल कलाकार ही बता सकता है कि वह क्या है, और उसने अपने काम के पीछे क्या उद्देश्य रखा था। यदि यह बात किसी ऐसे मानवीय स्वामी के लिए सच है, जिसकी क्षमताएँ सीमित हैं और जिसमें कमियाँ भी हैं, तो फिर उस सिद्ध परमेश्वर के बारे में हम और भी कितना कुछ कह सकते हैं, जो अस्तित्व में पाई जाने वाली सभी वस्तुओं का स्वामी है?
संक्षेप में कहें तो, एक ही परमेश्वर है, जिसने सब वस्तुओं की रचना बड़ी बुद्धिमानी और भलाई के साथ एक ऐसे उद्देश्य के लिए की, जिसे उसने स्वयं निर्धारित किया है। मनुष्य परमेश्वर की इसी बुद्धिमानी और भलाई की सृष्टि का एक भाग हैं, जिन्हें उसी के स्वरूप में बनाया गया है। इस कारण, स्वयं को तथा जीवन में अपने उद्देश्य को जानने के लिए, और इसी के परिणामस्वरूप, ज्ञान की खोज करने के लिए, परमेश्वर को जानना अत्यन्त आवश्यक है।
परमेश्वर के गुणों पर तो पूरी-पूरी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, और इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका में हमारे पास बहुत ही सीमित जगह है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप थोड़ा समय लेकर इस बात पर विचार करें कि बाइबल उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर के बारे में क्या सिखाती है। परमेश्वर तो आत्मा है, वह सर्वोत्त्कृष्ट और अत्यन्त महिमामय है। वह असीम है, किसी पर निर्भर नहीं है, और कभी न बदलने वाला है। यद्यपि परमेश्वर को जाना जा सकता है, फिर भी वह हमारी समझ से परे है (अर्थात् जिन बातों को हमारा मन पूरी तरह से समझ सकता है, वह उनसे ऊपर है)। परमेश्वर सर्वसामर्थी है (सब कुछ कर सकता है), सर्वज्ञानी है (सब कुछ जानता है), और सर्वव्यापी है (किसी एक जगह या समय तक सीमित नहीं है)। उसने ही सब वस्तुओं की सृष्टि की है, और उन्हें सम्भालता है, और उन पर शासन करता है। परमेश्वर पवित्र और न्यायी भी है। वह पूर्णरूप से पवित्र है, और वह हर बुराई को न्यायसंगत रूप से दण्ड देता है।
वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर हमारी कल्पना से भी कहीं अधिक महिमामय है! उसे हमने नहीं बनाया, या वह हमारे स्वरूप में नहीं रचा गया है। उसे नियंत्रित या वश में नहीं किया जा सकता, और न ही उसे अस्तित्व के लिए अपने प्राणियों की कोई आवश्यकता है—केवल उसी में जीवन है! हमारी सीमित समझ के बावजूद, परमेश्वर के इन परिपूर्ण गुणों के प्रति हम केवल यही एकमात्र उचित प्रतिक्रिया दे सकते हैं कि हम “विस्मय” की गहरी भावना से भर जाएँ। अर्थात्, उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर का भय माना जाना चाहिए (अर्थात् उसका आदर किया जाना चाहिए)।
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि बाइबल इस बात की पुष्टि करती है कि “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है” (नीति. 1:7), और “बुद्धि का आरम्भ है” (नीति. 9:10)। परमेश्वर और उसके कार्यों के सामने उसका भय मानना ही मनुष्यों की सबसे उचित प्रतिक्रिया है। परन्तु परमेश्वर का भय मानने का क्या अर्थ है? क्या भय मानना कोई बुरी बात नहीं है?
हम उस तरह का भय मानने की बात नहीं कर रहे हैं, जैसा आपको तब महसूस होता है, जब आपको लगता है कि बिस्तर के नीचे कोई राक्षस है। परमेश्वर का यह भय, उसके सामने श्रद्धापूर्वक विस्मित होने में निहित है। “सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें!” (भज. 33:8)। परमेश्वर का भय आज्ञाकारिता, प्रेम और आराधना की ओर ले जाता है। जैसा कि हम व्यव. 10:12 में पढ़ते हैं: “अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्वर यहोवाका भय माने, और उसके सारे मार्गों पर चले, उससे प्रेम रखे, और अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से उसकी सेवा करे”? जब से परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में बनाया तब से उसकी यही योजना थी—कि हम उसका भय मानें और उसकी महिमा के लिए जीएँ।
यद्यपि, एक बुरा समाचार भी है। आदम और हव्वा के उस फल को खाने के बाद, जिसे खाने से परमेश्वर ने उन्हें मना किया था, हम उत्पत्ति की पुस्तक में पढ़ते हैं कि उन्होंने अपने आपको परमेश्वर से छिपा लिया था (उत्प. 3:8)। जब आदम से पूछा गया कि उसने अपने आपको क्यों छिपा लिया, तो उसने कहा: “मैं डर गया था” (उत्प. 3:10)। परमेश्वर ने आदम को एक आज्ञा दी थी, और उसने अनाज्ञाकारिता की। परमेश्वर तो पवित्र एवं न्यायी है, और उसने आदम से कहा था कि उसकी अनाज्ञाकारिता का परिणाम मृत्यु है (उत्प. 2:17)। एक पवित्र परमेश्वर का पाप के साथ कोई मेल नहीं हो सकता। और एक न्यायी परमेश्वर को हर पाप को दण्डित करना ही होगा। एक बार जब आदम ने पाप किया, तो परमेश्वर के प्रति केवल डरना ही एकमात्र उचित प्रतिक्रिया रह गई। परन्तु अब, एक पापी के रूप में, आदम का डर केवल श्रद्धा और विस्मय तक नहीं रहा। अब, आदम (और उसके बाद आने वाले हर मनुष्य) को परमेश्वर के न्याय और दण्ड से डरना होगा।
यशायाह भविष्यद्वक्ता ने भी डर का कुछ अनुभव किया था, जब उसने “प्रभु को बहुत ही ऊँचे सिंहासन पर विराजमान देखा” (यशा. 6:1)। परमेश्वर की महिमा के अपने दर्शन में, यशायाह ने उन स्वर्गदूतों को देखा, जो परमेश्वर के सामने विनम्रता से खड़े रहते हैं और उसकी आराधना करते हैं। इसके विपरीत, यशायाह ने परमेश्वर की महिमा को देखकर भय के साथ प्रतिक्रिया दी: “हाय! हाय! मैं नष्ट हुआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ; और अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूँ, क्योंकि मैं ने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आँखों से देखा है” (यशा. 6:5)। परमेश्वर की दया से, यशायाह को वह नहीं मिला, जिसके वह योग्य था। परमेश्वर के अनुग्रह से, हम पढ़ते हैं: “तेरा अधर्म दूर हो गया और तेरे पाप क्षमा हो गए” (यशा. 6:7)।
बाइबल सिखाती है कि “सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं” (रोमि. 3:23), “कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं” (रोमि. 3:10), और “सब भटक गए हैं” (रोमि. 3:12)। आदम के पाप करने के बाद, सभी मनुष्य उसी दशा में उत्पन्न हुए। हम सब परमेश्वर के स्वरूप के प्रति उचित प्रतिक्रिया देने में असफल रहे। अपनी मूर्खता में, हम सब उससे डरने, उसकी आज्ञा मानने, उससे प्रेम करने और उसकी आराधना करने में असफल रहे हैं। और क्योंकि वह पवित्र एवं न्यायी है, इसलिए सभी लोग परमेश्वर के सामने दोषी ठहरते हैं और न्यायसंगत रूप से दण्ड पाते हैं। ठीक यशायाह की तरह, हम सबको भी परमेश्वर की दया और अनुग्रह की आवश्यकता है।
इसके निष्कर्ष के रूप में, हम सभी बुद्धिमान बनने में असफल रहे, जबकि हमें परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण भय में होकर और उसकी महिमा के लिए बनाया गया था। हम उस पवित्र, न्यायी और महिमामय परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से विस्मय और आज्ञाकारिता के साथ प्रतिक्रिया नहीं दे सकते, जिसने हमें अपने ही स्वरूप में बनाया है। पापी होने के नाते, प्रभु का भय न्याय और दण्ड पाने के भय के रूप में आरम्भ में होता है, क्योंकि सभी उसकी महिमा से रहित हो गए हैं। फिर भी, यह भय बुद्धि का आरम्भ बना रहता है, क्योंकि एक बार जब हम इस वास्तविकता का सामना करते हैं कि परमेश्वर कौन है (वह तो पवित्र और न्यायी है) और हम कौन हैं (हम तो पापी हैं), तो यह हमें मसीही विश्वास के मूल तक ले जाता है कि: हमें एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता है। हमें यीशु मसीह की आवश्यकता है, जो बुद्धि का पूर्ण देहधारी रूप है, परन्तु उसी में परमेश्वर के साथ हमारा टूटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ जाता है। वही है, जिसने हमारा दण्ड अपने ऊपर ले लिया, कि हम परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कर सकें और, उसी के द्वारा, सचमुच प्रभु के भय में जीना आरम्भ कर सकें और बुद्धिमान बन सकें।
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मनन के लिए प्रश्न:
- केवल ज्ञान रखना, बुद्धिमान होने से अलग कैसे है?
- स्वयं को जानने से पहले, यह जानना आवश्यक क्यों है कि परमेश्वर कौन है?
- जब हमें पता चलता है कि परमेश्वर पवित्र है और हम पापी हैं, तो वह कौन सी समस्या है, जिसका हमें सामना करना पड़ता है? उसका समाधान क्या है?
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भाग II: मसीह—बुद्धि देहधारी हुई और छुड़ाई गई
जो बात किसी अन्य मनुष्य के बारे में नहीं कही जा सकती, वही बात बाइबल यीशु के बारे में कहती है: “जिसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं” (कुलु. 2:3)। इसका अनिवार्य निहितार्थ यह है कि बुद्धि की खोज में, हमें अपना ध्यान यीशु के व्यक्तित्व पर केन्द्रित करना चाहिए। इसी मनुष्य में बुद्धि पाई जाती है। परन्तु यीशु केवल बुद्धि प्राप्त करने का एक साधन मात्र नहीं है, कि मानो हम उसके पास केवल कुछ पाने के लिए ही आते हों। उसी में बुद्धि मिलती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वही बुद्धि है। और चूँकि यीशु ही बुद्धि है, इसलिए बुद्धि की खोज करना अंतिम लक्ष्य के तौर पर मूल रूप से उसी की खोज है। अतः, यीशु की खोज किए बिना और उसके जैसा बने बिना, बुद्धि की खोज करना सम्भव नहीं है।
परन्तु वह कौन सी बात है, जो यीशु को ऐसी भक्ति का पात्र बनाती है? आगे बढ़ने से पहले, हमें रुककर एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए कि यीशु कौन है? यही वह प्रश्न था, जिसे स्वयं यीशु ने अपने चेलों से पूछा था: “तुम मुझे क्या कहते हो?” (मत्ती 16:15)। और पतरस ने लोकप्रिय रूप से और सही तौर पर इसकी पुष्टि की: “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (मत्ती 16:16)। यह पुष्टि यीशु को इस पृथ्वी पर रहने वाले किसी भी दूसरे मनुष्य से अलग करती है।
यीशु परमेश्वर का पुत्र है। आसान शब्दों में कहें तो, परमेश्वर का पुत्र होने का अर्थ परमेश्वर होना है, अर्थात् परमेश्वर, जो पुत्र है। यह पवित्रशास्त्र में स्पष्ट होता है। यहूदी अगुवे यीशु को मार डालना चाहते थे, क्योंकि वह “परमेश्वर को अपना पिता कह कर अपने आप को परमेश्वर के तुल्य भी ठहराता था” (यूह. 5:18)। रोचक बात यह है कि यूहन्ना रचित सुसमाचार का आरम्भ इस तरह होता है: “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था” (यूह. 1:1)। मनुष्य बनने से पहले, वह पिता और पवित्र आत्मा के साथ अनन्तकाल से परमेश्वर था।
परन्तु पतरस ने यह भी माना कि वही मसीह था। मसीह का अर्थ मसीहा है, अर्थात् वह जिसका अभिषेक किया गया हो। यीशु परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं की पूर्ति था, जो बहुत पहले अदन की वाटिका में की गई थीं, जब आदम ने पाप किया था। जब परमेश्वर ने साँप को श्राप दिया, तो उसने कहा: “मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्प. 3:15)। परमेश्वर ने कहा कि एक दिन स्त्री के वंश के द्वारा साँप को पराजित कर दिया जाएगा। परमेश्वर के द्वारा आदम और हव्वा के पाप के समाधान की प्रतिज्ञा अदन की वाटिका में ही की गई थी। यही कारण है कि पुराना नियम वंशावलियों से भरा हुआ है। जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे इनमें से अधिकांश वंशावलियाँ उस प्रतिज्ञा किए गए वंश से आकर जुड़ जाती हैं, और मानवता को बचाने की परमेश्वर की योजना पूरी होती है। हमें धीरे-धीरे बताया जाता है कि यह वंश अब्राहम, इसहाक, याकूब और यहूदा का वंशज होगा। समय में आगे बढ़ते हुए, परमेश्वर यह प्रकट करता है कि वह प्रतिज्ञा किया गया वंश राजा दाऊद और सुलैमान का वंशज होगा। बाद में, यशायाह ने उस वंश के बारे में इन शब्दों में भविष्यद्वाणी की: “यहोवा का आत्मा, बुद्धि और समझ का आत्मा, युक्ति और पराक्रम का आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय का आत्मा उस पर ठहरा रहेगा। और उसको यहोवा का भय सुगन्ध-सा भाएगा” (यशा. 11:2-3अ)।
वह प्रतिज्ञा किया गया वंश एक मनुष्य होगा, और वैसा ही मनुष्य होगा, जैसा परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि करते समय चाहा था—एक ऐसा मनुष्य, जो यहोवा का भय मानकर प्रसन्न होगा—एक ऐसा मनुष्य जिसमें बुद्धि और समझ की आत्मा होगी। हम यूहन्ना रचित सुसमाचार में पढ़ते हैं: “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूह. 1:14)। केवल नये नियम में ही परमेश्वर की उद्धार की अनन्त और बुद्धिमानी की योजना पूरी तरह से प्रकट होती है।
क्योंकि यीशु परमेश्वर का देहधारी रूप है, इसलिए “वह उसकी महिमा का प्रकाश और उसके तत्व की छाप है” (इब्रा. 1:3अ)। “वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है… क्योंकि पिता की प्रसन्नता इसी में है कि उसमें सारी परिपूर्णता वास करे” (कुलु. 1:15अ, 19)। वह पूरी तरह से मनुष्य था, “तौभी, निष्पाप निकला” (इब्रा. 4:15)। इसका अर्थ है कि उसने समझदारी से, परमेश्वर के भय में रहते हुए, पिता की आज्ञा मानने का एक सिद्ध जीवन जिया। उसके विचार पवित्र थे, उसके शब्द सच्चे और हमेशा उचित थे, और उसके कार्य सिद्ध थे। उसके बपतिस्मा और रूपांतरण के समय, परमेश्वर पिता ने यीशु के बारे में कहा: “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ” (मत्ती 3:17; 17:5)। परमेश्वर के पुत्र के अलावा कोई और परमेश्वर की सिद्ध छवि नहीं हो सकता था और न ही पिता को पूरी तरह से प्रसन्न कर सकता था।
परन्तु हमारे पापों के कारण हम जिस दण्ड के योग्य हैं, उसे हटाने के लिए यीशु का सिद्ध जीवन पर्याप्त नहीं है। पाप का दण्ड मृत्यु है। परमेश्वर के अनुग्रह से, यीशु ने न केवल एक सिद्ध जीवन जिया, बल्कि वह मरकर जी उठा। अपनी मृत्यु में, उस पापों का जुर्माना चुका दिया। नया नियम इस बात की पुष्टि करता है कि “जब हम भी पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा” (रोमि. 5:8), “मसीह हमारे पापों के लिए मर गया” (1 कुरि. 15:3)। वह न केवल पापियों के लिए मरा, बल्कि एक प्रतिनिधि के रूप में, उनकी जगह पर भी मरा। “इसलिये कि मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दु:ख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए” (1 पत. 3:18)। वहाँ एक अदला-बदली हुई। जिन पापियों को दण्ड मिलना चाहिए था, उन्हें धर्मी ठहराया गया, जबकि यीशु को, जो अब तक के जीवतों में एकमात्र धर्मी मनुष्य था, उनकी जगह पर दण्डित किया गया। “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरि. 5:21)। अपने पुनरुत्थान के द्वारा, वह उन सभी को जीवन देने में सक्षम है, जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है, और जो विश्वास के द्वारा उससे जुड़े हुए हैं। हम आत्मिक मृत्यु की स्थिति से आरम्भ करते हैं—हम “अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे” (इफि. 2:1)। लोग स्वभाव से मूर्ख होते हैं, और उनके हृदय भ्रष्ट होते हैं। यीशु बुद्धिमानी का एक उदाहरण है, यह तथ्य उस व्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है, जो आत्मिक रूप से मरा हुआ है। सभी लोगों को एक नये आत्मिक जीवन की आवश्यकता है। यीशु ने कहा कि “यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता” (यूह. 3:3)। यीशु इसलिए जी उठा, कि पापियों को, जो आत्मिक रूप से मरे हुए हैं, एक नया जीवन, एक नया हृदय, नयी इच्छाओं का एक समूह और बुद्धि की खोज करने की क्षमता दे।
अब, आप बेहतर ढंग से समझ सकते हैं कि यीशु हमारी पूर्ण भक्ति के योग्य क्यों है और बुद्धि की हमारी खोज में वही हमारे ध्यान का केन्द्र और लक्ष्य क्यों हैं। वह “जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा, अर्थात् धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा” (1 कुरि. 1:30)। एक बार जब परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा कर देता है और हमें एक नया जीवन देता है, तो परमेश्वर का उचित और भला भय बहाल हो जाता है, क्योंकि अब हम दण्ड पाने के भय में नहीं जीते। मसीह के साथ एकता में, अब हम उस कारण से जीने के लिए स्वतंत्र हैं, जिसके लिए हम सृजे गए थे—कि परमेश्वर का भय मानें और उसकी महिमा के लिए जीएँ।
मैं आपसे पूछता हूँ कि क्या आपका नया जन्म हुआ है? क्या आपने अपने पापों का पश्चाताप किया है और अपने उद्धार के लिए मसीह पर विश्वास किया है? यीशु ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जो पापियों को उद्धार कर सकता है। केवल वही आपको बुद्धिमान बना सकता है।
थोड़े शब्दों में कहें तो, बुद्धि की खोज करने का अर्थ स्वयं यीशु मसीह की खोज करना है, क्योंकि वह बुद्धि का पूर्ण रीति से देहधारी रूप है और उसी के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारा टूटा हुआ रिश्ता बहाल होता है। अपने जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा, मसीह ने हमें दण्डित होने के भय से छुड़ाया, और हमें सक्षम किया कि हम परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण भय में जीएँ और परमेश्वर के स्वरूप को दर्शाना आरम्भ करें, जिसका अर्थ परमेश्वर की महिमा के लिए मसीह के समान बनना है (रोमि. 8:29; 1 कुरि. 15:49)।
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मनन के लिए प्रश्न:
- बुद्धिमान बनने के लिए यह जानना आवश्यक क्यों है कि यीशु कौन है?
- हम विद्रोही और मूर्ख होने से लेकर छुड़ाए हुए और बुद्धिमान कैसे बनते हैं?
- क्या आपने यीशु पर भरोसा किया है? यदि नहीं, तो कौन सी बात आपको
रोक रही है?
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भाग III: प्रार्थना—पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बुद्धि की खोज करना
हम प्रार्थना से आरम्भ इसलिए करते हैं, क्योंकि यह हमें विनम्र बनाए रखती है और हमें याद दिलाती है कि, यद्यपि बुद्धि की खोज करना एक ऐसी आज्ञा है, जिसके लिए हमारी ओर से निरन्तर और जान-बूझकर किए गए प्रयास की आवश्यकता होती है (नीति. 4:7; इफि. 5:15), तौभी बुद्धि एक ऐसा वरदान है, जिसे हम अपने बल पर प्राप्त नहीं कर सकते। “बुद्धि यहोवा ही देता है” (नीति. 2:6)। इसलिए, याकूब सिखाता है कि “यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी” (याकू. 1:5)। यह प्रतिज्ञा उन लोगों को बुद्धि देने की परमेश्वर की भली इच्छा को दर्शाती है, जो विनम्रतापूर्वक इसकी खोज करते हैं।
शायद किसी ऐसे व्यक्ति का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण, जिसने विनम्रता से परमेश्वर से बुद्धि माँगी, राजा सुलैमान है, जिसने यह माना कि “मैं छोटा लड़का-सा हूँ” (1 राजा. 3:7) और परमेश्वर से प्रार्थना की कि “अपनी प्रजा का न्याय करने के लिये समझने की शक्ति दे”
(1 राजा. 3:9) और परमेश्वर ने सुलैमान को उत्तर दिया: “मैं… तुझे बुद्धि और विवेक से भरा मन देता हूँ” (1 राजा. 3:12)। बाद में, हम पढ़ते हैं कि जैसे-जैसे सुलैमान बुद्धिमानी से न्याय करता गया, तो लोगों ने “यह देखा, कि उसके मन में न्याय करने के लिये परमेश्वर की बुद्धि है” (1 राजा. 3:28)। “परमेश्वर ने सुलैमान को बुद्धि दी, और उसकी समझ बहुत ही बढ़ाई” (1 राजा. 4:29)। राजा सुलैमान इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण हैं कि बुद्धि एक ऐसा वरदान है, जिसे परमेश्वर उन्हें देता है, जो विनम्रता से इसे माँगते हैं। अत:, हमें प्रार्थना करनी चाहिए और लगातार परमेश्वर से बुद्धि माँगनी चाहिए।
इसके साथ ही, इफिसियों 3 अध्याय में पौलुस की प्रार्थना हमारी अपनी प्रार्थनाओं के लिए एक अच्छा नमूना स्थापित करती है। प्रेरित पौलुस हमें पिता से प्रार्थना करना सिखाता है: “मैं… उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ” (इफि. 3:14)। इसका उद्देश्य यह है कि “विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे” (इफि. 3:17)। परन्तु ध्यान दें कि पौलुस पिता से क्या प्रार्थना करता है “कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होते जाओ” (इफि. 3:16)। वह सामर्थ्य, जो विश्वास के द्वारा मसीह को हममें वास करने में सक्षम बनाती है, वह हममें मौजूद पवित्र आत्मा की सामर्थ्य है। परमेश्वर “ऐसा सामर्थी है कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है” (इफि. 3:20)।
जिस संस्कृति में हम रहते हैं, उसमें हमें लगातार स्वयं पर विश्वास करने के लिए कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यदि हम अपने भीतर झाँकें, तो हमारे पास सफल होने के लिए आवश्यक सभी संसाधन मौजूद हैं। परन्तु यदि बुद्धि की खोज करना कोई ऐसी बात होती, जिसे हम अपने बल पर हासिल कर सकते, तो हमें क्या आवश्यकता होती कि परमेश्वर से इसे हमें देने के लिए प्रार्थना करें? बुद्धि परमेश्वर की ओर से एक वरदान है, जो हमें पवित्र आत्मा के द्वारा दिया जाता है, और यह प्रार्थना के माध्यम से प्राप्त होता है। हम पिता से प्रार्थना करते हैं कि पवित्र आत्मा हमें बुद्धि प्रदान करे। बुद्धिमान बनने के लिए, हमें उस आत्मा से परिपूर्ण होना चाहिए, जो हमें बुद्धिमान बना सकती है।
पवित्र आत्मा से भरे एक बुद्धिमान व्यक्ति का सबसे उत्तम उदाहरण हमारा प्रभु यीशु मसीह है। सुसमाचार हमें यीशु की सेवकाई में पवित्र आत्मा की केन्द्रीय भूमिका को दिखाते हैं। आइए, हम लूका रचित सुसमाचार का उदाहरण लें। इसका आरम्भ गर्भधारण से होता है। स्वर्गदूत मरियम से कहता है, “पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा” (लूका 1:35अ)। पवित्र आत्मा की भूमिका केवल यह नहीं थी कि मरियम बिना किसी शारीरिक सम्बन्ध के गर्भवती हो जाए, बल्कि यह थी कि “वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है” (लूका 1:35ब)। यीशु को जिस बात ने (अर्थात् उसकी पवित्रता ने) किसी भी अन्य मनुष्य से अलग किया, वह पवित्र आत्मा का ही कार्य था। यह पवित्र “बालक बढ़ता, और बलवन्त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया” (लूका 2:40)। जब उसका बपतिस्मा हुआ, तब “पवित्र आत्मा शारीरिक रूप में कबूतर के समान उस पर उतरा” (लूका 3:22)। पवित्र आत्मा के ऐसे उतरने का अर्थ यह था कि यीशु न केवल परमेश्वर का अभिषिक्त जन था, बल्कि यह उसकी सेवकाई के लिए उसे सशक्त करने का भी एक माध्यम था। अपने बपतिस्मा के बाद, “यीशु पवित्र आत्मा से भरा हुआ… आत्मा के सिखाने से जंगल में फिरता रहा” (लूका 4:1), जहाँ शैतान ने उसकी परीक्षा ली। यीशु ने जंगल में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से शैतान की परीक्षाओं का सामना किया। परीक्षा के बाद, हम पढ़ते हैं कि “यीशु आत्मा की सामर्थ्य से भरा हुआ गलील को लौटा” (लूका 4:14)। आराधनालय में ही उसने यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक से यह वचन सार्वजनिक रूप से पढ़ा, जिसमें कहा गया था: “प्रभु का आत्मा मुझ पर है” (लूका 4:18; और यशा. 61 अध्याय से इसकी तुलना करें), और यीशु ने इस बात की पुष्टि की कि यह भविष्यद्वाणी उसी के विषय में थी (लूका 4:21)। यीशु बुद्धि की आत्मा से परिपूर्ण था, जिसकी यशायाह ने मसीहा के सम्बन्ध में पहले ही भविष्यद्वाणी कर दी थी (यशा. 11:2)।
यीशु के समान अधिकाधिक बनने के लिए, हमें भी पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होना चाहिए। यदि हम बुद्धि को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें यीशु के समान बनना होगा, जो बुद्धि की पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था। अत:, जब पौलुस इफिसुस की कलीसिया के लिए प्रार्थना करता है, तो वह यह माँगता है कि “हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर जो महिमा का पिता है, तुम्हें अपनी पहचान में ज्ञान और प्रकाश की आत्मा दे” (इफि. 1:17); और कुलुस्से की कलीसिया के लिए वह यह माँगता है कि “तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहिचान में परिपूर्ण हो जाओ” (कुलु. 1:9)।
इसी तरह, हमें यह समझाया गया है कि “हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसी लिये जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार विनती किया करो” (इफि. 6:18)। और हमारी प्रार्थनाओं में भी हमसे यह प्रतिज्ञा की गई है कि “इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है: क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए, परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये विनती करता है” (रोमि. 8:26)। जिस आत्मा के लिए हम पिता से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें दृढ़ बनाने के लिए उसे हमें दे, वही आत्मा वास्तव में हमारे लिए प्रार्थना करता है। ऐसा लगता है कि यही सिद्धान्त पौलुस के मन में भी था, जब वह फिलिप्पियों को यह आज्ञा देता है कि “डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलि. 2:12ब–13)। हम इस निश्चितता के साथ बुद्धि की खोज करते हैं कि जिस परमेश्वर ने हमें बचाया और हमें एक नया जीवन दिया, वह न केवल हमें आज्ञा देगा, बल्कि इस बात का आश्वासन भी देगा कि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हों।
आइए हम हर समय प्रार्थना करके बुद्धि की खोज करें, कि परमेश्वर हमें पवित्र आत्मा से भर दे। हम प्रार्थना करके बुद्धि की खोज इस निश्चितता के साथ करते हैं कि परमेश्वर हमें वह देगा, जिसकी हम इच्छा करते हैं, क्योंकि हम उसकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना करते हैं।
अब, हमें यह समझना होगा कि जब हम बुद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हम परमेश्वर से यह नहीं कह रहे होते कि वह हमें सीधे तौर पर कोई विशेष प्रकाशन दे। बुद्धि ही हमें वह समझने और लागू करने में सक्षम करती है, जिसे हम परमेश्वर और अपने बारे में जानते हैं।2 बुद्धिमान व्यक्ति सर्वज्ञानी नहीं होता, और न ही बुद्धि के लिए किसी सीधे और विशेष प्रकाशन की आवश्यकता होती है। असल में, क्योंकि हम सब कुछ नहीं जानते, और न ही परमेश्वर ने हम पर सब कुछ प्रकट किया है, इसलिए हमें उस बात को जो हम जानते हैं, समझदारी के साथ लागू करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि “गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रकट की गई हैं वे सदा के लिये हमारे और हमारे वंश के वश में रहेंगी, इसलिये कि इस व्यवस्था की सब बातें पूरी की जाएँ” (व्यव. 29:29)। बुद्धि का अर्थ यह नहीं है कि आपके पास दूसरों से छिपी हुई कोई विशेष गुप्त जानकारी हो, बल्कि यह उन बातों को अपने जीवन में लागू करने की क्षमता है, जो परमेश्वर ने हम पर प्रकट की हैं, जो हमें अगले मुद्दे की ओर ले जाती है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या आपके लिए यह एक सामान्य या स्वाभाविक बात है कि आप यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको बुद्धि दे? यदि ऐसा है, तो आप किस प्रकार की बातों के लिए परमेश्वर से बुद्धि माँगते हैं? यदि नहीं, तो ऐसा क्यों नहीं है?
- जब हमें बुद्धि की खोज करने के लिए कहा गया है, तब भी हमें परमेश्वर से बुद्धि माँगने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
- हमें बुद्धि कौन देता है? और कैसे देता है?
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भाग IV: पवित्रशास्त्र—बुद्धि का स्रोत और मार्गदर्शक
हम बुद्धि को एक ऐसी क्षमता के रूप में परिभाषित करते चले आ रहे हैं, जो किसी भी व्यक्ति को उस बात को लागू करने में सक्षम बनाती है जिसे वे जानते हैं। बुद्धि जानकारी से बढ़कर है, परन्तु यह कम नहीं हो सकती। असल में, सच्ची बुद्धि की पहली शर्त यह है कि जो हम जानते हैं, वह सच है। बुद्धिमान बनने के लिए, हमें ज्ञानवान होना पड़ेगा। एक अच्छे वकील को उसके देश के कानून के साथ-साथ यह पता होना चाहिए कि न्यायिक प्रणाली कैसे काम करती है। इसी रीति से, यदि परमेश्वर का भय मानना इस बात का सही उत्तर है कि परमेश्वर कौन है, तो हमें उचित रीति से उत्तर देने के लिए परमेश्वर को जानना होगा। “यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है” (नीति. 9:10)। केवल मूर्ख ही ज्ञान को तुच्छ जानते हैं।
तो फिर, प्रश्न यह नहीं है कि बुद्धि पाने के लिए हमें ज्ञान की आवश्यकता है या नहीं, बल्कि यह है कि हम सत्य को कैसे जान सकते हैं (अर्थात्, हम ज्ञान के एक अचूक स्रोत तक कैसे पहुँच सकते हैं)। बुद्धिमान बनने के लिए, हमें परमेश्वर का भय मानना होगा। और परमेश्वर का भय मानने के लिए, हमें उसे जानना होगा। हम पहले से ही जानते हैं कि परमेश्वर ने अपने आप को अपने पुत्र, देहधारी परमेश्वर, हमारे प्रभु यीशु मसीह में होकर सिद्धता के साथ प्रकट किया है। परन्तु हम मसीह के बारे में कैसे जान सकते हैं?
शायद आप इस प्रश्न का उत्तर पहले से ही जानते हैं। ज्ञान का एकमात्र विश्वसनीय और अचूक स्रोत परमेश्वर का वचन है। यद्यपि हमें पहले अधिक बुनियादी पहलुओं पर बात करनी पड़ी, तौभी इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका के आरम्भ से ही मैं यह मानकर चल रहा हूँ और कह रहा हूँ कि बुद्धि की खोज में पवित्रशास्त्र ही हमारा स्रोत और मार्गदर्शक है। जब मैं इन शब्दों को लिखने के लिए बुद्धि की खोज कर रहा था, तो मेरी यह चिन्ता थी कि मैं पवित्रशास्त्र को स्पष्ट रूप से उद्धृत करूँ, जिससे कि आप उस बात से आश्वस्त हो सकें, जो परमेश्वर ने प्रकट की है। जैसा कि प्रेरित पौलुस ने अपने आत्मिक पुत्र, तीमुथियुस को याद दिलाया: “बचपन से पवित्रशास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है” (2 तीमु. 3:15; और इसकी तुलना भज. 119:98-100 से करें)।
बाइबल ज्ञान का एकमात्र अचूक स्रोत इसलिए है, क्योंकि बाइबल परमेश्वर का वचन है। “क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई, पर भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे” (2 पत. 1:21)। बाइबल मनुष्यों के द्वारा लिखी गई थी, परन्तु उन्होंने जो लिखा वह परमेश्वर की ओर से प्रकाशन था। जब वे लिख रहे थे, तब वे “पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे” गए थे। इसलिए, “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है, ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए” (2 तीमु. 3:16-17)। सबसे पहले इस बात पर ध्यान दें कि, यद्यपि इसे मनुष्यों के द्वारा लिखा गया है, परन्तु पवित्र आत्मा ने इस बात का आश्वासन दिया कि जो कुछ लिखा गया है, वह स्वयं परमेश्वर के मुख से निकले हुए शब्द हैं। जिसे आमतौर पर प्रेरणा कहा जाता है, उसके लिए बाइबल में जिस शब्द और छवि उपयोग किया गया है, वह श्वास का बाहर निकलना है। बाइबल के शब्द, असल में परमेश्वर के ही शब्द हैं। और दूसरी बात, क्योंकि पवित्रशास्त्र परमेश्वर का वचन है, इस कारण यह हमारे लिए लाभदायक है, ताकि हम “सिद्ध बनें, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाएँ।” जो बात सम्पूर्ण है, उसमें कुछ भी और जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती। इस कारण, बाइबल हमें हर एक भले काम के लिए तत्पर करने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि बाइबल हमें मोटरसाइकिल चलाना या अपनी कार का तेल बदलना नहीं सिखाती। बाइबल हमें “मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान” बनाने में पर्याप्त है (2 तीमु. 3:15)। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के विशेष प्रकाशन का एक बहुत ही विशिष्ट उद्देश्य यह दिया गया है कि हमें बुद्धिमान बनाए। “यहोवा के नियम विश्वासयोग्य हैं, साधारण लोगों को बुद्धिमान बना देते हैं” (भज. 19:7ब)। जैसे इस वचन से परमेश्वर और हमारे बारे में सच्चाई प्रकट होती है, इसलिए बाइबल उद्धार की ओर अगुवाई करने के लिए, जो केवल मसीह पर भरोसा करने से ही मिल सकता है, हमें सच्चाई का ज्ञान देने के लिए आवश्यक और पर्याप्त दोनों है। यह सच्चाई न केवल हमारे हृदय परिवर्तन के लिए, बल्कि मसीह जैसा बनने में हमारी उन्नति के लिए भी वैध है। जैसे-जैसे पवित्रशास्त्र के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान बढ़ता है, वैसे-वैसे हम परमेश्वर और अपने बारे में और अधिक सीखते चल जाते हैं; तथा हम मसीह पर और अधिक भरोसा करना भी सीखते हैं।
संक्षेप में कहें तो, बुद्धि की खोज का अर्थ कोई विशेष प्रकाशन, या रहस्यमयी अनुभव, या व्यक्तिपरक भावनाएँ नहीं है। यह कोई गुप्त ज्ञान नहीं है, जो केवल कुछ विशेष लोगों के लिए रखा गया हो। इसके बजाय, यह एक प्रकट सच्चाई है, जिसे परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के द्वारा खुले तौर पर बताया है, और जिसने परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह में पूरी तरह से देहधारी होना पाया है, और जिसे पवित्रशास्त्र में लिखा गया है। परमेश्वर का वचन “मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है” (भज. 119:105)। यह एक ऐसी सच्चाई है, जो उन सभी के लिए उपलब्ध है, जो सच में इसे समझना चाहते हैं। जिस पवित्र आत्मा ने इस वचन को प्रेरित किया, वह वही आत्मा है, जो न केवल हमें इसे समझने में, बल्कि हमें बुद्धिमान बनने में भी सक्षम बनाता है।
अत:, बुद्धि की खोज में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि “तू अपनी समझ का सहारा न लेना” (नीति. 3:5) और “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना” (नीति. 3:7)। एक मसीही होने के नाते, अब जब आप मसीह को जान गए हैं, तो आपके पास एक विशेष जिम्मेदारी है कि आप “ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो: निर्बुद्धियों के समान नहीं पर बुद्धिमानों के समान चलो… इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो कि प्रभु की इच्छा क्या है” (इफि. 5:15, 17)। परमेश्वर की वह इच्छा, जिसे पौलुस इफिसियों के लोगों को समझाना चाहता है, परमेश्वर की प्रकट इच्छा है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि भजन संहिता का अध्याय 1 एक धन्य व्यक्ति का वर्णन ऐसे करता है, जो “यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है। वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है, और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है” (भज. 1:2–3)।
यदि आप यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका पढ़ रहे हैं, तो बहुत अधिक सम्भावना है कि आपके पास एक (या कई) बाइबल हों, या कम से कम आप की पहुँच एक बाइबल तक तो है। हममें से बहुत से लोग अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि हम परमेश्वर के वचन की एक प्रति अपने पास रख सकते हैं। आइए हम इस वरदान का पूरा-पूरा उपयोग करें और परमेश्वर के वचन को पढ़ें, उसका अध्ययन करें, उस पर मनन् करें, उसे कंठस्थ करें, और मंशा के साथ उसे अपने जीवनों में लागू करें। आखिरकार, वह वचन ही है, जो हमें बुद्धिमान बना सकता है।
पवित्रशास्त्र और प्रार्थना एक-दूसरे के साथ पूरी तरह से उपयुक्त बैठते हैं। सच्ची बुद्धि परमेश्वर की ओर से एक वरदान है—जिसे हम अपने बल से नहीं कमा सकते। पवित्रशास्त्र हमें बुद्धिमान बनाने का स्रोत और मार्गदर्शक है। प्रार्थना हमारा निरन्तर अंगीकार है कि बुद्धि केवल परमेश्वर की है और हम पूरी तरह से उसके अनुग्रह पर निर्भर हैं। यह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में, पिता से उस बुद्धि के लिए विनम्रतापूर्वक माँग करने का कार्य है, जिसकी हमें अत्यन्त आवश्यकता है। यह हमारे हृदयों को सही दिशा में रखता है, और हमें याद दिलाता है कि हर एक अच्छा और उत्तम वरदान, जिसमें बुद्धि का वरदान भी शामिल है, ऊपर से आता है।
आइए हम ऐसे लोग बनें, जो वचन में इतने भीगे हुए हों और प्रार्थना पर इतने अधिक निर्भर हों कि हमारा जीवन उस बुद्धि का एक जीवंत प्रमाण बन जाए, जो केवल परमेश्वर की ओर से मिलती है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- बुद्धि के स्रोत के रूप में पवित्रशास्त्र कैसे कार्य करता है?
- हाल के दिनों में परमेश्वर के वचन के साथ बिताया गया आपका समय कैसा रहा है?
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भाग V: स्थानीय कलीसिया—बुद्धि की खोज के लिए एक ढाँचा
हर पौधे को अपने विकास के लिए एक निश्चित मात्रा में धूप, अपनी नींव के रूप में काम करने और आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करने के लिए सही प्रकार की मिट्टी, और उसे पोषित करने एवं जीवित रखने के लिए पानी की उचित मात्रा की आवश्यकता होती है। इन आवश्यक तत्वों के बिना, पौधा मुरझाकर मर जाएगा। जिस प्रकार एक पौधे को बढ़ने के लिए एक विशिष्ट वातावरण की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक मसीही को स्थानीय कलीसिया की आवश्यकता होती है। स्थानीय कलीसिया वह उचित ढाँचा है, जिसमें एक मसीही ज्ञान और बुद्धि में (अर्थात्, मसीह के स्वरूप में) बढ़ता है।
मसीही पहचान सामुदायिक होती है। एक बार जब हम मसीह से जुड़ जाते हैं, तो हम उन सभी लोगों से भी जुड़ जाते हैं, जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है। इसे समझने में हमारी सहायता करने के लिए, नया नियम कई रूपकों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए:
— एक प्रजा—“पर तुम… पवित्र लोग, और (परमेश्वर की) निज प्रजा हो… तुम पहले तो कुछ भी नहीं थे पर अब परमेश्वर की प्रजा हो” (1 पत. 2:9-10; और इसकी तुलना इफि. 2:19; तीतु. 2:14 से करें)।
— एक मन्दिर—“जिसमें तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास–स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हो” (इफि. 2:22; और इसकी तुलना 1 पत. 2:5 से करें)।
— एक परिवार—“परमेश्वर के घराने में जो जीवते परमेश्वर की कलीसिया है” (1 तीमु. 3:15; और इसकी तुलना गला. 6:10; इफि. 2:19 से करें)।
— एक देह—“क्योकि जिस प्रकार देह तो एक है और उसके अंग बहुत से हैं, और उस एक देह के सब अंग बहुत होने पर भी सब मिलकर एक ही देह हैं, उसी प्रकार मसीह भी है। क्योंकि हम सब ने… एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बपतिस्मा लिया” (1 कुरि. 12:12-13अ; और इसकी तुलना रोमि. 12:4-5; कुलु. 1:18 से करें)।
— एक झुण्ड—“अपनी और पूरे झुण्ड की चौकसी करो जिसमें पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है” (प्रेरि. 20:28)।
बुद्धि की खोज में एक स्थानीय कलीसिया की सदस्यता आवश्यक है।3 जब पौलुस ने इफिसियों के लिए प्रार्थना की, तो उसकी इच्छा होती है कि “विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे” (इफि. 3:17) जिससे कि वे “सब पवित्र लोगों के साथ” (इफि. 3:18) मसीह के प्रेम को समझने में सक्षम हो सकें। मसीही लोग मसीह के प्रेम को केवल अन्य मसीहियों के साथ मिलकर ही ठीक से समझ सकते हैं। कुछ ही आयतों के बाद, पौलुस उन्हें बताता है कि परमेश्वर ने कलीसिया को वरदान दिए, जिससे कि हम मसीह के समान बन सकें। परमेश्वर ने कलीसिया को पास्टर अर्थात् रखवाले दिए हैं, “जिस से पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए, जब तक कि हम सब के सब विश्वास और परमेश्वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएँ, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएँ और मसीह के पूरे डील–डौल तक न बढ़ जाएँ” (इफि. 4:12–13)। यदि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो आपको मसीह के जैसा और अधिक बनना होगा। आप मसीह जैसे तब बनते हैं, जब आप उसकी देह, अर्थात् कलीसिया के संदर्भ में होते हैं, जहाँ हम सब मिलकर एक-दूसरे का निर्माण करते हैं। जो मसीही किसी स्थानीय कलीसिया से अलग हो जाता है, वह आत्मिक जीवन के लिए वैसे ही तड़पेगा, जैसे सूखी भूमि पर पड़ी मछली तड़पती है।
स्थानीय कलीसिया के सदस्यों के तौर पर, हम सब मिलकर परमेश्वर की आराधना करते हैं। सामूहिक आराधना एक ऐसा तरीका है, जिससे हम सब मिलकर मसीह के स्वरूप में ढलते चले जाते हैं। जैसा कि पौलुस इफिसियों से कहता है: “इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो: निर्बुद्धियों के समान नहीं पर बुद्धिमानों के समान चलो… पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो” (इफि. 5:15-21)। इस पाठ में, पौलुस बुद्धिमानी (बुद्धिमानों की तरह चलना), पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होना, और सामूहिक आराधना (जो मण्डली के गायन में दिखाई देती है) को आपस में जोड़ता है। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए। परमेश्वर के प्रति सही प्रतिक्रिया यही है कि हम उसकी आराधना करें।
सामूहिक आराधना के संदर्भ में ही परमेश्वर के वचन का प्रचार किया जाता है। जैसा कि हमने ऊपर बताया, पवित्रशास्त्र ही सच्चे ज्ञान का एकमात्र अचूक स्रोत है। सामूहिक आराधना ही परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया वह माध्यम है, जिसके द्वारा उसका वचन सुनाया जाता है और हमारे जीवनों में लागू किया जाता है। पवित्रशास्त्र की विश्वासयोग्य व्याख्या को सुनने के लिए बैठने से, हमें वह ज्ञान प्राप्त होता है, जो बुद्धि के लिए आवश्यक है। वचन के प्रचार के द्वारा ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखाता है, हमारी गलत धारणाओं को सुधारता है, और हमें मसीह के जैसा बनाता है। जैसे यीशु ने पिता से प्रार्थना की थी: “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है” (यूह. 17:17)।
सामूहिक आराधना में ही हम उन विधियों का पालन भी करते हैं। प्रभु यीशु ने दो विधान स्थापित किए थे, जो कि बपतिस्मा और प्रभु-भोज हैं, और जिनका पालन स्थानीय कलीसिया के द्वारा किया जाना था। ये ऐसे माध्यम हैं, जिनके द्वारा सुसमाचार दृश्यमान हो जाता है—अर्थात् हम सुसमाचार को देख पाते हैं, उसका स्वाद लेते हैं, और उसे महसूस करते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि बपतिस्मा के जल, रोटी और प्याले में कोई जादुई शक्तियाँ नहीं होतीं, परन्तु ये हमें विश्वास में दृढ़ करने के लिए दिए गए थे। बपतिस्मा में, हम पश्चाताप करने वाले पापी के जल में डूबने के रूप में सुसमाचार को दर्शाया हुआ देखते हैं। बपतिस्मा इस बात की पुष्टि और घोषणा करता है कि पापी व्यक्ति, मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में उसके साथ एक हो गया है (कुलु. 2:11–12; और इसकी तुलना रोमि. 6:3–4 से करें)। प्रभु-भोज में, हम सुसमाचार को तब चित्रित होता हुआ देखते हैं, जब एक स्थानीय कलीसिया, एक देह के रूप में, रोटी और प्याले में सहभागी होती है (1 कुरि. 10:16-17)। प्रभु-भोज एक यादगारी वाला भोज है, जिसमें मसीह की देह, मसीह की उस देह को याद करती है, जिसे उसने अपने लोगों के स्थान पर दे दिया था, और मसीह के उस लहू को याद करती है, जिसे उसने हमारे पापों की क्षमा के लिए बहाया था।
हर स्थानीय कलीसिया में पास्टर अर्थात् रखवाले या प्राचीन भी होते हैं। वे कलीसिया के लिए मसीह का दिया हुआ वरदान हैं, जिनका उद्देश्य यह है कि हम मसीह के जैसे बन सकें। “उसने कुछ को… रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया, जिस से पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए” (इफि. 4:11-12)। उन्हें ऐसे लोग होना चाहिए, जिनका चरित्र उदाहरण वाला और मसीह जैसा हो, और जो परमेश्वर के वचन के द्वारा उसके लोगों की अगुवाई करने में सक्षम हों। “अध्यक्ष निर्दोष… और सिखाने में निपुण हो” (1 तीमु. 3:2)। उसे निर्दोष इसलिए होना है, क्योंकि उसे कलीसिया के सामने एक उदाहरण रखना होता है और उसे पौलुस की तरह यह कहने में सक्षम होना है कि: “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ” (1 कुरि. 11:1; 1 कुरि. 4:16; फिलि. 3:17)। पौलुस की तरह ही, तीमुथियुस को भी यह सलाह दी गई है कि “वचन, और चाल-चलन, और प्रेम, और विश्वास, और पवित्रता में विश्वासियों के लिये आदर्श बन जा” (1 तीमु. 4:12ब)। धार्मिकता से भरे पास्टर कलीसिया की भलाई के लिए अपने अधिकार का उपयोग करते हैं। कलीसिया के सदस्यों को यह आज्ञा दी गई है कि “अपने अगुवों की आज्ञा मानो और उनके अधीन रहो, क्योंकि वे उनके समान तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते हैं जिन्हें लेखा देना पड़ेगा” (इब्रा. 13:17अ)।
परन्तु, कलीसिया के जीवन में पास्टर जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही नये नियम में यह भी स्पष्ट है कि सभी सदस्य स्थानीय कलीसिया की सेवा के काम में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। सबसे पहले, यह समझें कि पास्टरों को इसलिए रखा गया था कि “पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए” (इफि. 4:12)। मसीह की देह का निर्माण तब होता है, जब सेवा का काम उन पवित्र लोगों के द्वारा पूरा किया जाता है, जिन्हें उनके पास्टरों ने तैयार किया होता है।
एक स्थानीय कलीसिया के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के प्रति समर्पित होना चाहिए, तथा बुद्धि की खोज में और मसीह जैसा बनने में एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए। परमेश्वर का वचन मसीहियों को समझाता है कि “एक दूसरे से प्रेम रखो” (यूह. 13:34), “एक दूसरे के दास बनो” (गला. 5:13), “एक दूसरे का भार उठाओ” (गला, 6:2), “एक दूसरे की सह लो” (इफि. 4:2), “एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो… एक दूसरे के अपराध क्षमा करो” (इफि. 4:32), “एक दूसरे को शान्ति दिया करो” (1 थिस्स. 4:18), “एक दूसरे को शान्ति दो और एक दूसरे की उन्नति का कारण बनो” (1 थिस्स. 5:11), “एक दूसरे के सामने अपने–अपने पापों को मान लो, और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो” (याकू. 5:16)। इसलिए, “प्रेम, और भले कामों में उस्काने के लिये हम एक दूसरे की चिन्ता किया करें, और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें” (इब्रा. 10:24-25)।
इन सभी आज्ञाओं का अर्थ यह है कि हम न केवल दूसरों को मसीह जैसा बनने में सहायता करने की खोज में रहें, बल्कि हम दूसरों को भी मसीह जैसे बनने में हमारी सहायता करने दें। “मूढ़ को अपनी ही चाल सीधी जान पड़ती है, परन्तु जो सम्मति मानता, वह बुद्धिमान है” (नीति. 12:15)। “सम्मति को सुन ले, और शिक्षा को ग्रहण कर, कि तू अन्तकाल में बुद्धिमान ठहरे” (नीति. 19:20)।
संक्षेप में कहें तो स्थानीय कलीसिया वह जगह है जहाँ हम बुद्धि की खोज करते हैं। स्थानीय कलीसिया के संदर्भ में ही, समर्पित सदस्यों के रूप में, हम परमेश्वर का भय मानना, उसकी आज्ञा मानना, उससे प्रेम करना और उसकी आराधना करना सीखते हैं और इसमें बढ़ते हैं।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या आप किसी स्थानीय कलीसिया के सदस्य हैं? यदि नहीं, तो ऐसा क्यों नहीं है?
- जिस रीति से हम बुद्धिमानी में बढ़ते हैं, उसके लिए स्थानीय कलीसिया सबसे अच्छा संदर्भ क्यों है?
- आप अपनी कलीसिया के सदस्यों की सेवा करने के लिए किन तरीकों का उपयोग करते हैं?
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निष्कर्ष: एक जीवित गवाही—बुद्धि की खोज
इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में, हमने ईश्वरीय बुद्धि के स्वभाव को समझने का, और इसे केवल लोकप्रिय धारणाओं तक सीमित न रखकर, परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में मजबूती से स्थापित करने का प्रयास किया है। हमने बुद्धि की परिभाषा को केवल कोरी जानकारी के रूप में नहीं, बल्कि इसे उस बात को लागू करने की क्षमता के रूप में आरम्भ किया, जिसे हम जानते हैं। हमने देखा कि बुद्धि की खोज का सम्बन्ध केवल निर्णयों से नहीं, बल्कि हमारे चरित्र से है। इसका अर्थ केवल बुद्धिमानी से काम करना नहीं, बल्कि एक बुद्धिमान व्यक्ति बनना है। फिर, हमने बुद्धि की उस खोज पर विचार किया, जो इन बातों से आरम्भ होती है: (1) परमेश्वर का भय मानना, (2) मसीह में देहधारी होना और छुड़ाया जाना, (3) पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से आगे बढ़ना, (4) पवित्रशास्त्र को इसका स्रोत और मार्गदर्शक मानना, और (5) जिसका विकास स्थानीय कलीसिया के संदर्भ में होता है।
हमने एक बुनियादी सिद्धान्त से आरम्भ किया, जो कि प्रभु का भय मानना है। हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर के प्रति एक श्रद्धापूर्ण विस्मय से सच्ची बुद्धि का आरम्भ होता है। यह श्रद्धा परमेश्वर और उसके कार्यों के प्रति हमारी उचित प्रतिक्रिया है, और यह हमें आज्ञाकारिता, प्रेम और आराधना की ओर ले जाती है। हालाँकि, हमारे पापी स्वभाव ने इस अच्छे भय को दण्ड पाने के भय में बदल दिया है, जिसके कारण हमें मसीह की आवश्यकता महसूस हुई। यीशु केवल एक बुद्धिमान शिक्षक या एक अच्छा उदाहरण ही नहीं है। वह तो ऐसी बुद्धि है, जो देहधारी है और छुड़ाई हुई है। वह परमेश्वर की सिद्ध प्रतिरूप है, जिसने सिद्ध आज्ञाकारिता का जीवन जिया और हमें हमारे पापों से छुड़ाने के लिए मर गया, जिससे हमारा मेल-मिलाप परमेश्वर से हो गया। मसीह के साथ एक हो जाने पर, हमारा दण्ड पाने का भय प्रभु के प्रति एक नये और प्रेमपूर्ण भय में बदल जाता है, जो हमें उसकी महिमा के लिए जीने हेतु स्वतंत्र कर देता है।
पवित्र आत्मा के हमारे भीतर काम करने से, परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता मसीह में फिर से जुड़ गया है, और हम प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह पर पूरी तरह निर्भर रहते हुए बुद्धि की खोज करने में सक्षम हुए हैं। हमने सीखा कि बुद्धि परमेश्वर की ओर से एक वरदान है, जिसे हमें विनम्रता से माँगना चाहिए। जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम बुद्धि की उस आत्मा से भर जाते हैं, जो स्वयं यीशु पर ठहरी थी, और जो हमें मसीह की समानता में बढ़ने में सक्षम करती है। यह अलौकिक वरदान किसी गुप्त प्रकाशन के रूप में नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रकट वचन के माध्यम से आता है। बाइबल सत्य का हमारा अचूक स्रोत है, जिसकी प्रेरणा स्वयं परमेश्वर ने दी है और जो हमें हर भले काम के लिए तत्पर करने के लिए पर्याप्त है। यह हमारे “पाँवों के लिए दीपक” है, जो हमारा मार्गदर्शन करता है, हमें सुधारता है, और हमें उद्धार के लिए बुद्धिमान बनाता है। इस कारण, बुद्धि की खोज परमेश्वर के वचन के ज्ञान में बढ़ने और पवित्र आत्मा पर निर्भर रहने का एक निरन्तर चलने वाला कार्य है, कि वह हमारे जीवन में उस वचन को प्रकाशित करे और उसे लागू करे।
अंत में, हमने देखा कि बुद्धि की खोज अपने सही संदर्भ में अर्थात् स्थानीय कलीसिया में होनी चाहिए। जिस तरह एक पौधे को फलने-फूलने के लिए सही वातावरण की आवश्यकता होती है, उसी तरह मसीहियों को बुद्धि में बढ़ने के लिए स्थानीय कलीसिया की आवश्यकता होती है। कलीसिया का अर्थ एक प्रजा, एक मन्दिर, एक देह, एक परिवार और एक झुण्ड से होता है, जहाँ हमें एक साथ तैयार किया जाता है और बनाया जाता है। यह वही स्थान है, जहाँ हम सामूहिक रूप से आराधना करते हैं, विश्वासयोग्य पास्टरों के अधिकार के अधीन रहते हैं, और आपस में प्रेम एवं प्रोत्साहन का अभ्यास करते हैं। कलीसिया परमेश्वर के द्वारा दिया गया वह स्थान है, जहाँ हम अन्य मसीहियों की बुद्धिमान सलाह से निर्देशित होकर, एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
अन्त में, बुद्धि की खोज एक ऐसी प्रक्रिया है, जो तभी पूरी होगी, जब हम स्वर्ग पहुँचेंगे और यीशु के साथ होंगे। यह यीशु के समान, जो बुद्धि का पूर्ण सिद्ध प्रतिरूप है, अधिकाधिक बनने की जीवनभर चलने वाली यात्रा है। यही वह मूल उद्देश्य है, जिसके लिए हमें रचा गया था कि परमेश्वर की महिमा के लिए, उसके स्वरूप को दर्शाएँ। हमें ऐसी प्रजा बनने के लिए बुलाया गया है, जो वचन से इतने परिपूर्ण हों, प्रार्थना पर इतने निर्भर हों, मसीह के प्रति इतने समर्पित हों, और अपनी स्थानीय कलीसिया के प्रति इतने प्रतिबद्ध हों कि हमारा जीवन उस बुद्धि की एक जीवित गवाही बन जाए, जो केवल परमेश्वर की ओर से मिलती है।
“अब जो तुम को मेरे सुसमाचार अर्थात् यीशु मसीह के संदेश के प्रचार के अनुसार स्थिर कर सकता है, उस भेद के प्रकाश के अनुसार जो सनातन से छिपा रहा, परन्तु अब प्रकट होकर सनातन परमेश्वर की आज्ञा से भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों के द्वारा सब जातियों को बताया गया है कि वे विश्वास से आज्ञा माननेवाले हो जाएँ, उसी एकमात्र बुद्धिमान परमेश्वर की यीशु मसीह के द्वारा युगानुयुग महिमा होती रहे। आमीन।” (रोमि. 16:25–27)
अन्तिम टिप्पणियाँ
- मैं आपको एण्ड्रयू डेविड नासेली की जीवन कौशल मार्गदर्शिका “God’s Will and Making Decisions” (परमेश्वर की इच्छा और निर्णय लेना) को पढ़ने की सलाह देता हूँ। एण्डी की जीवन कौशल मार्गदर्शिका निर्णय लेने की प्रक्रिया में विशेष रूप से सहायक है, और यह न केवल इस बात की खोज करती है कि बाइबल में परमेश्वर की इच्छा का क्या अर्थ है, बल्कि यह मसीहियों को समझदारी भरे निर्णय लेने में भी सहायता करती है।
- मैं आपको फिर से नासेली की जीवन कौशल मार्गदर्शिका पढ़ने की सलाह दूँगा, जिसमें उन्होंने बुद्धिमानी को “समझदारी और होशियारी से जीवन जीने के कौशल” के रूप में परिभाषित किया है। क्योंकि नासेली निर्णय लेने पर ध्यान देते हैं, इसलिए उनकी जीवन कौशल मार्गदर्शिका पूरक का काम करती है और हमारे प्रतिदिन के जीवन में निर्णय लेने की प्रक्रिया में बुद्धि का उपयोग करने के बारे में बहुत ही अधिक व्यावहारिक सलाह देती है।
- यदि आपको किसी स्थानीय कलीसिया का सदस्य होने की आवश्यकता वाली बात पर विश्वास नहीं है, तो मैं जोर देकर सलाह दूँगा कि आप जोनाथन लीमैन की जीवन-कौशल मार्गदर्शिका, “कलीसिया की सदस्यता का विषय” (The Case For Church Membership) पढ़ें।
लेखक के बारे में
टियागो ओलिवेरा, पुर्तगाल के लिस्बन में स्थित फर्स्ट बैपटिस्ट चर्च ऑफ लिस्बन में वरिष्ठ पास्टर के रूप में सेवा करते हैं। उनकी पत्नी, मार्टा से उनका विवाह हुआ है, और उनके तीन बच्चे हैं।
विषयसूची
- भाग I: प्रभु का भय—सच्ची बुद्धि की नींव
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: मसीह—बुद्धि देहधारी हुई और छुड़ाई गई
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: प्रार्थना—पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बुद्धि की खोज करना
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: पवित्रशास्त्र—बुद्धि का स्रोत और मार्गदर्शक
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग V: स्थानीय कलीसिया—बुद्धि की खोज के लिए एक ढाँचा
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष: एक जीवित गवाही—बुद्धि की खोज
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में