
#87 परमेश्वर में आशा: दुर्बल होते शरीर के साथ बीमारी का सामना करना
परिचय
चाहे बीमारी अल्पकालिक हो या दीर्घकालिक, घातक हो या उपचार के योग्य हो, बीमारी का निदान मिलना और दीर्घकालिक बीमारी के साथ जीवन बिताना थका देने वाला और प्रायः अकेलापन उत्पन्न करने वाला होता है। कुछ दिन ऐसे लगते हैं मानो जीवन की ऑक्सीजन ही बन्द कर दी गई हो; जिसके कारण प्रतिदिन का जीवन असहनीय रूप से भारी लगने लगता है। आशाएँ और सपने टूट जाते हैं। जहाँ कभी भविष्य उज्ज्वल रंगों से चित्रित दिखाई देता था, अब वहीं अन्धकार होने लगता है और धीरे-धीरे जीवन-पटल के प्रत्येक भाग को ढक लेता है।
सारा 28 वर्ष की थी। मैं उस समय सेमिनरी में अध्ययन कर रहा था। हमारे पहले पुत्र का जन्म अभी-अभी हुआ था। फिर, 2002 के अन्त में, वह समाचार मिला जिसने हमारे जीवन को बदल कर रख दिया: जाँच से पता चला कि सारा को मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एम.एस.) है। यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक बीमारी है। इक्कीस वर्ष बाद, 22 दिसम्बर 2023 को, सारा ने पीड़ा से भरी अपनी अन्तिम साँस ली और अपने स्वर्गीय घर चली गई।
आरम्भिक वर्षों में तो हम धन्यवादी थे। चिकित्सकों ने उसके विभिन्न लक्षणों का कारण समझ लिया था; केवल अनुमान लगाने की अपेक्षा उत्तर मिल जाना हमें बेहतर लगा। यह हमारी तर्कसंगत सोच थी। परन्तु भावनात्मक रूप से हमारा मन अधिक अन्धकारमय, कम तर्कसंगत और प्रायः स्वयं पर केन्द्रित प्रश्नों से घिरा रहता था: जैसे परमेश्वर बीमारी क्यों आने देता है? यह तंत्रिका रोग कितनी शीघ्रता से बढ़ेगा? क्या हम यात्रा कर पाएँगे? क्या हमारे और भी बच्चे हो सकेंगे? इसका हमारे वैवाहिक जीवन की घनिष्ठता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
यदि आप स्वयं किसी बीमारी का सामना करते हुए यह पुस्तक पढ़ रहे हैं, या किसी बीमार मित्र अथवा परिवार के सदस्य के साथ दृढ़ता से खड़े हैं, या केवल भविष्य में किसी पीड़ित व्यक्ति की और भी अच्छी रीति से सेवा करने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहते हैं—तो आपका धन्यवाद। आप ऐसे लोगों में से हैं जो बहुत कम मिलते हैं। दीर्घकालिक बीमारी से पीड़ित लोगों में तलाक की बढ़ती हुई घटनाओं और उन्हें घेर लेने वाले गहरे अकेलेपन पर ही दृष्टि डालिए। ऐसे समय में विश्वासयोग्य उपस्थिति अत्यन्त बहुमूल्य होती है, परन्तु बहुत कम देखने को मिलती है।
बीमारी का सामना करना
सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी का सामना करना है। इसका सामना करने का अर्थ है कि उसे स्वीकार करना और उसे नकारने से इन्कार करना। इसका अर्थ है कि अन्धे आशावाद या सतही मसीही कथनों के पीछे छिपने के बजाय पीड़ादायक वास्तविकता में कदम रखना। हाँ, हम भरोसा रखते हैं कि परमेश्वर भला है और प्रभुता करता है—यह महिमामय सत्य है। परन्तु इन सत्यों को आपके सामने उपस्थित वास्तविकता के प्रति आपको संवेदनहीन न बना दें। अपनी बीमारी का ईमानदारी से सामना करें और यह पहचानें कि आप ऐसा करते समय भी… बीमारी के दौरान परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं।
दुर्बल होते हुए शरीर में
एक समय था जब दर्पण में देखना किसी डरावने सपने जैसा अनुभव नहीं होता था। परन्तु वास्तविकता यह है कि हर दिन हमारे शरीर धीरे-धीरे दुर्बल होते जा रहे हैं। हमारी ताजगी और आकर्षण घटने लगते हैं; जीवन के संघर्षों में तराशे हुए चेहरे की बनावट भी धीरे-धीरे मुरझा जाती है। यदि हम विवाहित हैं, तो यही बात हमारे जीवनसाथी के विषय में भी सत्य है।
हमारे विवाह के दिन, हमने वाचा की प्रतिज्ञाएँ बोली थीं: “बीमारी में और तंदुरुस्ती में,” “अच्छे समय में और बुरे समय में।” उस आनन्दमय दिन पर, बिना गहराई से विचार किए गए ये शब्द सरलता से हमारी जीभ पर आ जाते हैं—और यह ठीक भी है। दम्पतियों को निराशा में उतरने के बजाय प्रेम और आनन्द के मधुर वातावरण का आनन्द लेना चाहिए। परन्तु अन्ततः हममें से प्रत्येक जन जीवन के उन क्षणों तक पहुँचता है जिन्हें “बीमारी में” और “बुरे समय में” रहना कहा जाता है। चाहे हमारा विवाह हुआ हो या नहीं, हम इसे नकारने का प्रयास करते हैं। हम बाहरी आवरण को चमकाने का प्रयास करते हैं। फिर भी, शारीरिक प्राणी होने के नाते, हम सभी ऐसे शरीरों से बंधे हुए हैं जो धीरे-धीरे दुर्बल होते चले जाते हैं।
संघर्ष
बीमारी हमारे शरीर के दुर्बल होने की गति को बढ़ा देती है—परन्तु यह एक ऐसा संघर्ष है जिससे हममें से कोई भी बच नहीं सकता है, और इसके लिए शारीरिक दुर्बलता में भी सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। इसलिए बीमारी का सामना और संघर्ष करें।
दुर्बल होते हुए शरीर में बीमारी और पीड़ा भीतर तक झकझोर देने वाली भयानक होती है। दुःख हमें पूरी तरह से घेर सकता है। इसमें हानि, निराशा और उन अवसरों के छूट जाने की पीड़ा होती है जिन्हें हम प्राप्त नहीं कर सके। यह अन्याय पूर्ण लगता है, विशेषकर ऐसी संस्कृति में जो शारीरिक सामर्थ्य और सौन्दर्य को बहुत अधिक महत्व देती है। इसलिए संघर्ष करें।
जो कुछ आपके पास है, उसके लिए कृतज्ञ रहने का संघर्ष करें, जैसे अपने परिवार, मित्रों, कार्य और सुरक्षा के लिए। चाहे आशीष कितनी ही छोटी क्यों न लगे, उसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए अनुशासित बनें रहें। मैं स्वयं प्रायः ताजा सेके हुए स्कोन पर लगी गाढ़ी मलाई और उत्तम स्ट्रॉबेरी जैम के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। हाँ, मैं ब्रिटिश हूँ, और यह वास्तव में मेरे प्रार्थना-जीवन का एक अनमोल रत्न है।
शारीरिक मनुष्य के रूप में सृजे जाने की गरिमा और सुन्दरता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करें। जब शरीर दुर्बल होने लगता है, तो यह बात सरलता से भुला दी जाती है कि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं। हार मान लेना सहज लगता है—परन्तु ऐसा न करें। हमें अपने शरीरों को मूर्ति बनाकर उनकी उपासना नहीं करनी है, परन्तु परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए लोगों के रूप में (उत्पत्ति 1:27–28), हमें उनकी देखभाल करते हुए उनका प्रबन्ध करने के लिए बुलाया गया है। जब पीड़ाएँ निरन्तर बनी रहती हैं और बाहरी रूप निराश करने लगता है, तब यह कठिन होता है, परन्तु प्रेम के साथ जो कुछ भी आप कर सकते हैं, वह करते रहें।
एक बार यीशु मसीह के जन्म दिवस के दिन, मेरे एक धनी मित्र ने मेरी पत्नी को क्रिश्चियन डायर ब्राण्ड की हाथों पर नमी बनाए रखने वाली क्रीम दी। उसकी सुगंध मनमोहक थी और वह अत्यधिक सुख-विलास देने वाली थी। जब मैंने उसे उसके हाथों पर लगाया, तो उसे लगा कि उसकी देखभाल की जा रही है। उसके शरीर का शेष भाग दुर्बल हो रहा था, परन्तु उस छोटे से कार्य में हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए व्यक्ति के रूप में उसकी गरिमा को बनाए रखा। और शायद वह स्वर्ग में ऐसे सबसे कोमल, गुलाब की सुगंध वाले हाथों के साथ पहुँची होगी, जिसकी कल्पना की जा सकती है।
सबसे बढ़कर, मसीह पर भरोसा बनाए रखने के लिए संघर्ष करें, तब भी जब आपको लगे कि आपकी सामर्थ्य समाप्त हो रही है और आपके प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले हैं। जब यीशु ने क्रूस पर से पुकारा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” तो यह एकमात्र अवसर था जब उसने अपने पिता को “पिता” कहकर संबोधित नहीं किया। उस क्षण उसने परमेश्वर को धर्मी न्यायी के रूप में अनुभव किया। उसने त्यागे जाने की पीड़ा को सहा और पाप के कारण होने वाले परमेश्वर के न्याय का पूरा भार अपने ऊपर उठा लिया। यह ऐसा दुःख था जिसकी हम किसी भी प्रकार से कल्पना नहीं कर सकते हैं। जैसा कि यह प्रिय भजन स्मरण कराता है:
लज्जा और कठोर उपहास सहते हुए,
मेरे स्थान पर वह दोषी ठहराया गया;
अपने लहू से उसने मेरी क्षमा पर मुहर लगा दी;
हल्लिलूय्याह, कैसा उद्धारकर्ता है! (पी. पी. ब्लिस, “दुखी पुरुष”)
जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में, हम कभी भी वह सब सहन नहीं करेंगे जो मसीह ने सहन किया। यह सत्य हमारे दुःखों को महत्वहीन नहीं बनाता, परन्तु उन्हें उचित परिप्रेक्ष्य में देखने में सहायता करता है। साथ ही, यह हमें ऐसे व्यक्ति की ओर मुड़ने का आश्वासन देता है, जिसके पास हम जा सकते हैं:
क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी न हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तो भी निष्पाप निकला। (इब्रानियों 4:15)
जब कोई और नहीं समझता, तब यीशु समझता है। इसलिए अपने ही विचारों में लगातार उलझे रहने से बचें और उसकी ओर मुड़ें। वह जानता है कि आप किस परिस्थिति से होकर गुजर रहे हैं—अर्थात् आपसे भी अधिक अच्छी रीति से जानता है।
आगे छह छोटे बाइबल आधारित मनन दिए गए हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि ये आपको बीमारी का सामना करने और क्षीण होते हुए शरीर में आशा पाने में सहायता करें।
“हे यहोवा पर आशा रखने वालों, हियाव बाँधो और तुम्हारे हृदय दृढ़ रहें!” (भजन संहिता 31:24)
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#87 परमेश्वर में आशा: दुर्बल होते शरीर के साथ बीमारी का सामना करना
भाग I: बीमारी आपकी पहचान नहीं है।
बीमारी का सामना करना
बीमारी को झेलते हुए, मसीह में अपनी पहचान को भूल जाना आसान होता है। जीवन की व्यस्तता में, प्रत्येक मसीही व्यक्ति इस बात को स्मरण रखने के लिए संघर्ष करता है कि वह कौन है। हम कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ और उत्तरदायित्व निभाते हैं—जैसे माता-पिता होना, पति या पत्नी होना, अपने कार्य-क्षेत्र में आगे बढ़ना। ये बातें महत्वपूर्ण हैं, फिर भी धीरे-धीरे ये हमारे मूल्य का मापदंड बन सकती हैं, क्योंकि हमारे जीवन में प्रधान स्थान पाने के लिए अलग-अलग दबाव एक-दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं। इसके साथ ही जीवन की प्रतिदिन की भागदौड़, सामाजिक माध्यमों का वह प्रभाव जो हमारी असुरक्षा को उजागर करता है, और कार्य-क्षेत्र में आगे बढ़ने के विषय में निरन्तर तुलना भी जुड़ जाती है; तब भले चंगे स्वास्थ्य में भी अपनी पहचान को लेकर हमारी स्थिरता डगमगा सकती है।
फिर बीमारी आ जाती है। दवाइयों का समय, अस्पताल में चिकित्सकों से मिलने का निर्धारित समय, जाँचों के परिणाम और शारीरिक सीमाएँ हमारे विचारों पर प्रभावी होने लगती हैं। हमारा शरीर, जो कभी भरोसे मन्द था, धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगता है। जीवन के उतार-चढ़ाव हम पर भारी पड़ने लगते हैं। ऐसे समय में अपने आप को अपनी बीमारी, पीड़ा की तीव्रता या भविष्य के चिकित्सकीय अनुमान के आधार पर पहचानना बहुत आसान हो जाता है। हम यह स्मरण करने से पहले कि “मैं मसीह का हूँ,” सोचने लगते हैं, कि “मैं बीमार हूँ।” इसलिए हमें बार-बार अपने आपको स्मरण कराना चाहिए कि बीमारी के विषय में बाइबल क्या कहती है और ऐसी परिस्थिति में हमारी वास्तविक पहचान क्या है। जब हम अपनी पहचान अपने लक्षणों में नहीं, वरन् मसीह में स्थिर रखते हैं, तब अस्पताल के बिस्तर पर या चिकित्सक के परामर्श कक्ष में भी मसीह की उपस्थिति और संगति का अनुभव कर सकते हैं।
परन्तु परमेश्वर का वचन हमें स्थिर रखता है और हमें स्मरण कराता है, जैसा पौलुस लिखता है, कि हम “मसीह में” आशीषित हैं (इफिसियों 1:3)। विश्वास के द्वारा हम उसके साथ एक हो गए हैं। यह ऐसी पहचान नहीं है जो नाजुक हो या परिस्थितियों के साथ बदलती रहे; परन्तु यह सुरक्षित और अनन्त है। स्वयं यीशु ने कहा, “सच्ची दाखलता हूँ मैं हूँ… तुम डालियाँ हो” (यूहन्ना 15:5)। हमारा जीवन उसी से प्रवाहित होता है, क्योंकि उसके साथ हमारी एकता ही हमारी सर्वोच्च पहचान है।
यह सत्य हर एक के लिए है—चाहे वह स्वस्थ हो या बीमार। व्यस्तता इसे धुंधला कर सकती है; दुःख इसे अस्पष्ट कर सकता है। परन्तु बीमारी हमें मसीह के साथ हमारी एकता से अलग नहीं कर सकती है। “मसीह में” हमारी पहचान पहली प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए, तब भी जब हमारा शरीर असफल होने लगे। मसीह में क्षीण होते हुए शरीर में भी आशा है—ऐसी आशा जिसे बीमारी मिटा नहीं सकती है और निर्बलता कम नहीं कर सकती है।
विजेता से भी बढ़कर
बीमारी हमारे अपने आपको देखने के ढँग को बदल देती है। किसी रोग का निदान ऐसा लग सकता है मानो हमें एक नया नाम, एक नई श्रेणी, एक नया पहचान-चिह्न दे दिया गया हो।
जब मैं सेमिनरी में अध्ययन कर रहा था, उसी समय सारा को मल्टीपल स्क्लेरोसिस अर्थात् नामक बीमारी होने का पता चला। उस समय मैं रोमियों अध्याय 8 का गहन अध्ययन कर रहा था। चिकित्सकीय अनिश्चितता होने के बीच भी मैं इन वचनों का अध्ययन कर रहा था:
परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, विजेता से भी बढ़कर हैं।
(रोमियों 8:37)
पौलुस जिस यूनानी शब्द का प्रयोग करता है वह हाइपर-नीकोमेन है—जिसका अनुवाद प्रायः “विजेता से भी बढ़कर” “अत्यन्त विजय प्राप्त करने वाला” या “पूर्ण रूप से विजयी” किया जाता है।
वह यूनानी शब्द मेरे हृदय में घर कर गया और बीस वर्षों से भी अधिक समय तक हमारे परिवार के लिए प्रतिदिन हमारी पहचान की जाँच का आधार बना रहा। प्रत्येक वर्ष हमारे विवाह की वर्षगाँठ पर, मैं सारा को एक कार्ड भेजता था, जिसके भीतर एक ही शब्द लिखा होता था—“हाइपर-नीकोमेन।” क्यों? क्योंकि हमें उस स्मरण की आवश्यकता थी। यह स्मरण इसलिए नहीं था कि जीवन सरल था। न ही यह पीड़ा को नकारना था। वरन् यह सुसमाचार का स्मरण था—अर्थात् मसीह में हमारी पहचान का स्मरण था।
पौलुस यह नहीं कहता कि हम किसी दिन विजेता होंगे। वह कहता है, कि “हम विजेता से भी बढ़कर हैं।” वर्तमान काल। अभी हैं। और सदैव। मसीह में विजेता हैं।
यदि आपने यीशु में अपना विश्वास रखा है, तो यह आपके लिए सत्य है। आपकी पीड़ा चाहे जैसी भी हो, आपकी परीक्षा चाहे जैसी भी हो, आपका निदान चाहे जो भी हो—आप उस के द्वारा जिसने आपसे प्रेम किया है, विजेता से भी बढ़कर हैं।
यह पीड़ा को दूर नहीं करता। रोमियों 8 दुःखों को अनदेखा नहीं करता—इसके पहले की कुछ आयतों को देखें। वास्तव में, पौलुस इसे स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध करता है: “क्लेश या संकट या उपद्रव या अकाल या नंगापन या जोखिम या तलवार” (रोमियों 8:35)। फिर भी, इन्हीं वास्तविकताओं के बीच पौलुस विजय की घोषणा करता है—मनुष्य की सामर्थ्य के कारण नहीं, वरन् मसीह के साथ एकता के कारण वह ऐसी घोषणा करता है।
आपका शरीर दुर्बल हो सकता है, आपका भविष्य अनिश्चित प्रतीत हो सकता है, परन्तु आपकी पहचान एम.आर.आई. के परिणामों, रक्त जाँचों या चिकित्सकीय अभिलेखों से निर्धारित नहीं होती है। परन्तु आपकी पहचान क्रूस और खाली कब्र से निर्धारित होती है।
“इसलिए अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” (रोमियों 8:1)
“पवित्र आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।” (रोमियों 8:16)
यही आप हैं।
इसी सत्य में ही आप अपनी परीक्षाओं में किसी भी प्रकार की सुन्दरता को देखना आरम्भ करेंगे। इसलिए नहीं कि दुःख भला है, परन्तु इसलिए कि मसीह उस दुःख में आपके साथ उपस्थित है। क्योंकि कुछ भी—“न मृत्यु, न जीवन… न कोई और सृष्टि ”—“हमें हमारे प्रभु मसीह यीशु में परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकेगी” (रोमियों 8:38–39)।
व्यावहारिक रूप में यह कैसे दिखाई देता है?
कुछ समय के लिए, सारा पढ़ नहीं सकती थी, क्योंकि उसकी दृष्टि सीमित हो गई थी। इसलिए हम बाइबल सुनते थे, प्रचार और विश्वासयोग्य शिक्षा सुनते थे। हम साथ मिलकर प्रार्थना करते थे। जब भावनाएँ अविश्वसनीय हो जाती थीं, तब हम अपने आप को सत्य में स्थिर करते थे और वचन के द्वारा बीमार लोगों के लिए आत्मिक प्रोत्साहन की खोज करते थे।
दुर्बल होते हुए शरीर के लिए बाइबल आधारित आशा तब आरम्भ होती है, जब हम स्वयं को स्मरण कराते हैं कि बीमारी हमारा परिचय नहीं है। वह हमें परिभाषित नहीं करती है। हम “मसीह में” हैं। और उसमें हम हाइपर-नीकोमेन— अर्थात् पूर्ण रूप से जयवन्त हैं। यह केवल सकारात्मक सोच नहीं है; वरन् यह सुसमाचार की वास्तविकता में पाई जाने वाली बाइबल आधारित आशा है।
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मनन के लिए प्रश्न:
बीमारी या दुर्बलता के समय में सामान्यतः कौन सी बात आपको सबसे अधिक परिभाषित करती है?
रोमियों 8 आपके दुःख को देखने के दृष्टिकोण को किस प्रकार बदलता है?
मसीह में अपनी पहचान को स्मरण रखने में सहायता पाने के लिए आप कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं?
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भाग II: परमेश्वर की महिमा के लिए बीमारी
जब बीमारी घेर लेती है
जब बीमारी घेर लेती है, तो जीवन पहले जैसा कभी नहीं रहता। नियंत्रण हमारे हाथों से फिसलने लगता है। यह ऐसा चुनाव नहीं है जिसे हमने किया है। जिस भविष्य की हमने कल्पना की थी, वह अपरिचित दिशाओं में मुड़ने लगता है और उन क्षणों में प्रश्न उमड़ने लगते हैं: “यह क्यों? अभी क्यों? मेरे साथ ही क्यों?”—ये ऐसे प्रश्न हैं जो आशा को खोजने से जुड़े हुए होते हैं।
परन्तु परमेश्वर चुपचाप नहीं है। हमें अन्धकार में नहीं छोड़ा गया है कि हम अपने दुःख का अर्थ स्वयं गढ़ने के लिए विवश हों। यूहन्ना 9:5 में यीशु घोषणा करता है कि, “जब तक मैं जगत में हूँ, तब तक जगत की ज्योति हूँ।” ज्योति आ चुकी है और वह हमें निराशा या भ्रम में नहीं छोड़ती। वरन् वह उसी परिस्थिति में बोलती है और उसी परिस्थिति में प्रवेश करती है, तथा परमेश्वर के प्रेम की सामर्थ्य को प्रकट करती है।
यूहन्ना 9 का यह अंश वर्षों से मेरे लिए बहुत सहायक रहा है। आयत 1 सरल शब्दों से आरम्भ होती है: “जब [यीशु] वहाँ से जा रहा था, तो उसने एक मनुष्य को देखा जो जन्म से अन्धा था।” यीशु ने उसे देखा, और यह बात महत्वपूर्ण है। वह मनुष्य कोई बाधा नहीं था, कोई असुविधा नहीं था, और न ही कोई ऐसा ईश्वर विज्ञान सम्बन्धी प्रश्न था जिसे हल किया जाना था। वह केवल देखा गया व्यक्ति था। और यदि आपने कुछ समय पहियेदार कुर्सी पर या अस्पताल के बिस्तर पर बिताया है, तो आप जानेंगे कि कितनी आसानी से ऐसा हो सकता है कि लोग आपको अनदेखा कर दें। फिर भी परमेश्वर में सदैव आशा है।
लूका 10 में दयालु सामरी के दृष्टान्त में यरीहो के मार्ग पर से होकर निकलने वाले याजक और लेवी के समान यीशु दूसरी ओर से होकर नहीं निकलता है। वह केवल दयालु सामरी के समान नहीं है—वरन् वही सच्चा और उत्तम दयालु सामरी है, जो हमारे दुःख की ओर बढ़ता हुआ चला आता है।
यीशु हमें देखता है
बीमारी जब हमारे जीवन में प्रवेश करती है, तो ऐसा महसूस हो सकता है मानो हम अदृश्य हो गए हैं—मानो हमारी पहचान केवल लक्षणों, जाँचों और आँकड़ों तक ही सीमित हो गई है। परन्तु यूहन्ना 9 में हम देखते हैं: कि यीशु देखता है। और जब वह देखता है, तो वह हमारी ओर बढ़ता है। यूहन्ना 9 आगे कहता है:
फिर जाते हुए उसने एक मनुष्य को देखा, जो जन्म से अन्धा था। और उसके शिष्यों ने उससे पूछा, “हे रब्बी, किस ने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने, या उसके माता पिता ने?
शिष्य ऐसा प्रश्न पूछते हैं जो स्वाभाविक से लगते हैं, परन्तु वह गलत प्रश्न है। यह मनुष्य के हृदय की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। हम स्पष्टीकरण चाहते हैं। हम “क्यों?” को जानना चाहते हैं, और इसके लिए दुःख के कारण को पीछे की ओर से खोजते हैं। अय्यूब के मित्रों में भी हम यही प्रवृत्ति देखते हैं (उदाहरण के लिए, अय्यूब 4:6-7 में तेमानी एलीपज)। आज भी हम इसी प्रकार के प्रश्न अलग-अलग, परन्तु शान्त तरीके से पूछते हैं: क्या यह दण्ड है? क्या मैं इसे स्वयं अपने ऊपर लाया हूँ? जब दूसरे लोग दुःख नहीं उठा रहे हैं, तो मैं क्यों दुःख उठा रहा हूँ?
शिष्य एक स्पष्टीकरण चाहते हैं, और उन्हें स्पष्टीकरण मिलता भी है—परन्तु वह नहीं जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे। वे अन्धेपन के कारण को जानना चाहते हैं, परन्तु यीशु उन्हें अन्धेपन का उद्देश्य बताता है, और इस प्रकार चंगाई के विषय में बाइबल आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। ध्यान दें कि यीशु कैसे उत्तर देता है:
“न तो इसने पाप किया था, न इसके माता-पिता ने परन्तु यह इसलिए हुआ, कि परमेश्वर के काम उसमें प्रगट हों।” (आ. 3)
हम उत्पत्ति 3 और रोमियों 8 से जानते हैं कि पाप के कारण दुःख संसार में आया। यीशु इस सत्य का इन्कार नहीं करता है। परन्तु यहाँ वह दृष्टिकोण बदल देता है। इस मनुष्य के अन्धेपन का अन्तिम स्पष्टीकरण उसके अतीत के किसी पापपूर्ण कारण में नहीं, वरन् परमेश्वर की प्रभुता के भविष्य के उद्देश्य में पाया जाता है। इसका स्पष्टीकरण अन्ततः उसके पीछे नहीं—परन्तु उसके आगे है!
परमेश्वर दुःख को देखकर बाद में प्रतिक्रिया नहीं करता और फिर उसे किसी भलाई के लिए उपयोग करने का उपाय नहीं खोजता। वह उस पर भी प्रभुता रखता है। बीमारी चाहे जितनी भी अव्यवस्थित और नियंत्रण से बाहर होने वाली प्रतीत हो—और बीमारी वास्तव में ऐसा ही अनुभव करा सकती है!—फिर भी हम यहाँ देखते हैं कि कोई भी दुःख परमेश्वर के उद्देश्यों से बाहर नहीं है। कोई भी बात उसकी दृष्टि से बच नहीं सकती है। इससे दुःख सरल नहीं हो जाता, परन्तु वह अर्थपूर्ण हो जाता है।
चंगाई में या सम्भाले रखने में
यूहन्ना 9 में यीशु उस मनुष्य को चंगा करता है। परमेश्वर के कार्य अद्भुत और तुरन्त प्रकट होते हैं। परन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: परमेश्वर की महिमा केवल चंगाई पर निर्भर नहीं है। अन्ततः यह महत्व नहीं रखता कि वह मनुष्य चंगा हुआ या नहीं। परन्तु परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति में और प्रत्येक व्यक्ति के माध्यम से अपनी सामर्थ्य को प्रकट कर सकता है और करेगा, यहाँ तक कि जब हम परमेश्वर में विश्राम पाना सीख रहे होते हैं। मेरी पत्नी की शारीरिक अक्षमता का उद्देश्य केवल चंगाई की सम्भावना नहीं था—वरन् यह था कि परमेश्वर के कार्य प्रकट हों।
कभी-कभी परमेश्वर की सामर्थ्य चंगाई के द्वारा प्रकट होती है। और कभी-कभी वह सम्भाले रखने वाले अनुग्रह के द्वारा प्रकट होती है। पौलुस ने इसे गहराई से सीखा, जैसा कि हम 2 कुरिन्थियों 12:9 में पढ़ते हैं, जब प्रभु उससे कहता है:
मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।
निर्बलता में सामर्थ्य सिद्ध होती है। निर्बलता में महिमा प्रकट होती है। निर्भरता में सामर्थ्य दिखाई देती है। चाहे काँटा हटा देने के द्वारा हो या उसके बीच में हमें सम्भाले रखने के द्वारा हो, परमेश्वर के कार्य प्रकट होते हैं।
अपनी दृष्टि उठाना
परमेश्वर की प्रभुता हमारी दृष्टि को अव्यवस्थित, पीछे की ओर के कारण खोजने वाली सोच से ऊपर उठाती है—“मैं यहाँ कैसे पहुँचा? मैं ही क्यों? कौन-सी घटनाओं की कड़ी इसके होने का कारण बनी?
और परमेश्वर की प्रभुता हमारी दृष्टि को भविष्य की ओर केन्द्रित करती है—“परमेश्वर इसमें अपने कार्यों को कैसे प्रकट करेगा? इस परीक्षा के द्वारा उसकी महिमा कैसे हो सकती है?”
अतीत के कारणों को लेकर निराशा में फँसे रहने के बजाय, हमें भविष्य में परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए आमंत्रित किया जाता है—और यही दृष्टिकोण बीमारी को बदल देता है। अब बीमारी केवल एक आकस्मिक घटना नहीं रह जाती। वह अर्थहीन नहीं है। वह परमेश्वर के उद्देश्यों से बाहर नहीं है। यीशु, जो संसार की ज्योति है, अन्धकार में प्रवेश करता है और इस पूरी परिस्थिति को देखने के हमारे दृष्टिकोण को बदल देता है।
इसलिए, जब बीमारी घेर लेती है और जीवन फिर कभी पहले जैसा नहीं रहता, जब नियंत्रण चला जाता है और भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है, तब यूहन्ना 9 वह सहारा है जिसकी हमें आवश्यकता है। क्योंकि जब इसके पीछे के कारण हमारी छोटी मानवीय समझ से परे होते हैं, तब हम परमेश्वर के उद्देश्य पर भरोसा कर सकते हैं, क्योंकि ‘ज्योति आ गई है। वह देखता है। वह निकट आता है। और उन तरीकों से जिन्हें हम अभी समझ नहीं सकते, परमेश्वर के कार्य प्रकट होंगे—चाहे चंगाई के द्वारा या सम्भाले रखने वाले अनुग्रह के द्वारा हों।
यह इन्कार नहीं है। यह प्रभुता में स्थिर आशा है। इसलिए बीमारी परमेश्वर की महिमा से बाहर नहीं है। यहाँ तक कि मसीह में, इस स्थिति में भी परमेश्वर के कार्य चमक सकते हैं।
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मनन के लिए प्रश्न:
जब दुःख आता है, तो स्वाभाविक रूप से आप उसके कारणों को समझने के लिए कहाँ देखते हैं?
आपकी दुर्बलता में परमेश्वर के कार्यों के प्रगट होने का क्या अर्थ होगा?
परमेश्वर की प्रभुता पर विश्वास करना आपकी दृष्टि को किस प्रकार ऊँचा उठाता है?
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भाग III: बीमारी हल्की और क्षण भर की है
हमने अपनी पहचान पर विचार किया था—बीमारी यह निर्धारित नहीं कर सकती कि आप कौन हैं। उसका स्वर ऊँचा हो सकता है, परन्तु वह अन्तिम नहीं है। इसके बाद हमने अपनी दृष्टि परमेश्वर की ओर उठाई और देखा कि बीमारी कभी भी उसकी प्रभुता और उसकी भली योजनाओं से बाहर नहीं होती। अब हम 2 कुरिन्थियों 4:16–18 की ओर मुड़ते हुए, पहचान और प्रभुता से आगे बढ़कर तुलना और सही दृष्टिकोण पर विचार करेंगे, जहाँ प्रेरित पौलुस कहता है:
“इसलिए हम साहस नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तो भी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है। क्योंकि हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं।
मसीही लोगों के दुःख का विरोधाभास
ये शब्द किसी आरामदायक परिस्थिति में नहीं लिखे गए थे। इन्हें ऐसे व्यक्ति ने लिखा था जिसने मार, जहाज़ के डूबने, विश्वासघात, कारावास और दुर्बलता का अनुभव किया था। फिर भी वह आश्चर्यजनक रूप से कहता है: हम साहस नहीं छोड़ते।
यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व क्षीण होता जा रहा है…
बीमारी इस वास्तविकता को स्पष्ट कर देती है, कि जब शरीर दुर्बल होने लगते हैं, तब सामर्थ्य घटने लगती है और आत्मनिर्भरता कम होती चली जाती है। परन्तु यहाँ किसी बात से इनकार नहीं किया गया है और बाइबल कभी भी यह दिखाने का प्रयास नहीं करती कि शरीर का क्षीण होना वास्तविक नहीं है। पौलुस इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है। बाहरी मनुष्यत्व क्षीण होता जा रहा है। परन्तु पूरी कहानी केवल इतनी ही नहीं है।
हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन-प्रतिदिन नया होता जा रहा है।
यही मसीहियों के दुःख का विरोधाभास है: बाहर की ओर गिरावट, परन्तु भीतर की ओर नयापन होता है। हममें से बहुतों ने देखा है कि जब शरीर दुर्बल होता गया, तब भीतरी जीवन और अधिक सामर्थी होता चला गया। जब मांसपेशियाँ दुर्बल होती गईं, तब विश्वास और अधिक गहरा होता चला गया। जब आत्मनिर्भरता घटती गई, तब मसीह पर निर्भरता और अधिक बढ़ती चली गई। परन्तु नयापन अपने आप नहीं होता है।
यह तब होता है जब हम पवित्रशास्त्र खोलते हैं, जब हम अपनी निर्बलता में प्रार्थना करते हैं, और जब सब कुछ साथ छोड़ देता है तब भी हम मसीह को दृढ़ता से थामे रहते हैं। परमेश्वर दुःख और बीमारी को व्यर्थ नहीं जाने देता है। वरन्, वह इन्हीं को भट्ठी के समान प्रयोग करके हमें तपाकर शुद्ध करता है (भजन 66:10; 1 पतरस 1:6–7)। इसलिए, जहाँ संसार केवल हानि और दुर्बलता देखता है, वहीं स्वर्ग उन्नति और नवीनीकरण देखता है।
क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश…
हम इस वाक्यांश से विचलित हो जाते हैं। हल्का? पल भर का? लम्बे समय तक रहने वाले दर्द में कुछ भी हल्का नहीं होता है। वर्षों तक चलने वाली बीमारी और उपचार में कुछ भी पल भर का नहीं होता है। जिस व्यक्ति से आप प्रेम करते हैं, उसे धीरे-धीरे दुर्बल होते देखना भी कोई साधारण बात नहीं है। परन्तु पौलुस दुःख को कम करके नहीं बता रहा है। वह उसकी तुलना कर रहा है।
वह दुःख को एक तराजू पर रखता है। एक ओर—दशकों तक चलने वाली बीमारी, शोक और दुःख है। दूसरी ओर अनन्त महिमा है। जब आप समय की तुलना अनन्तकाल से करते हैं, तो पूरा जीवनकाल भी क्षणिक प्रतीत होता है। जब आप क्लेश की तुलना महिमा से करते हैं, तो सबसे भारी बोझ भी हल्का हो जाता है। प्रसिद्ध भजन-रचयिता विलियम काउपर इस बात को समझते थे। काउपर अपने जीवन के अधिकांश समय पीड़ा और बीमारी से ग्रस्त रहे। उन्होंने एक बार लिखा:
उसकी योजनाएँ शीघ्र ही पूर्ण होने लगेंगी,
हर घड़ी वे प्रकट होती जाएँगी;
कली का स्वाद भले ही कड़वा हो,
परन्तु फूल मीठा होगा।
(“परमेश्वर अद्भुत रीति से कार्य करता है” — विलियम काउपर)
बीमारी कड़वी कली है और महिमा उसका फूल है। यह बीमारी को छोटा नहीं करता—आँसू वास्तविक हैं। परन्तु वे अन्तिम नहीं हैं। पौलुस आगे कहता है कि ये क्लेश हैं:
हमारे लिये अत्यधिक अनन्त महिमा तैयार कर रहा है।
अर्थात्, दुःख कार्य करता है। परन्तु वह उद्धार नहीं करता—केवल मसीह ही उद्धार करता है। परन्तु दुःख हमें आकार देता है, क्योंकि वह घमण्ड को तोड़ता है और हमारी मूर्तियों को प्रकट करता है। वह हमें बीमारों के लिए किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए, इसकी ओर प्रेरित करता है, टूटे हुए मन से की जाने वाली प्रार्थना को प्रोत्साहित करता है, और हमें उस संसार से अलग करता है जो कभी हमें संतुष्ट करने के लिए बनाया ही नहीं गया था—परमेश्वर की व्यवस्था में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता है।
बीमारी पीड़ा सहने वाले व्यक्ति को शुद्ध करती है, परन्तु यह देखने वालों को भी शुद्ध करती है। परिवार बदल जाते हैं। मित्र सचेत हो जाते हैं। कलीसियाएँ दीन हो जाती हैं। कुछ लोग मसीह को और अधिक दृढ़ता से थामे रहते हैं, क्योंकि उन्होंने किसी और को उसे थामे हुए देखा है और उनके उदाहरण में मसीही आशा पाई है।
यहाँ एक रहस्य है—और कभी-कभी क्रोध भी है। महिमा के इस पार हम बीमारी के सभी कारणों को कभी नहीं समझ पाएँगे। परन्तु पवित्रशास्त्र दृढ़ता से कहता है कि दुःख व्यर्थ नहीं है। वह कुछ भारी और अनन्त कार्य को पूरा कर रहा है, जो दुर्बलता में परमेश्वर की सामर्थ्य को प्रकट करता है। इसलिए, जो बात घटती हुई प्रतीत होती है (बीमारी), वह प्रायः किसी ऐसी बात की तैयारी होती है जो कहीं अधिक उत्तम है। ध्यान दें कि भाषा कैसी है:
ऐसी अनन्त महिमा का भार, जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है।
महिमा का भी भार होता है। जैसे बीमारी और दुःख बहुत भारी प्रतीत होते हैं—वैसे ही महिमा उनसे भी अधिक भारी होती है। वह शोक से अधिक भारी है। वह पछतावे से अधिक भारी है। वह कब्र से भी अधिक भारी है। अर्थात्, अनन्तकाल केवल दुःख की भरपाई नहीं करेगा; वरन् उसका प्रभाव दुःख पर पूरी रीति से छा जाएगा।
जिस नृत्य को बीमारी ने रोक दिया था, वह सदा के लिए स्थगित नहीं रहेगा। जो क्षमताएँ क्षीण हो गई थीं, वे कल्पना से भी परे फिर से बहाल की जाएँगी। जो कुछ यहाँ बाधित हुआ था, वह वहाँ बिना किसी रुकावट के होगा। और जब अनन्तकाल हमारे सामने फैला होगा—अर्थात् अन्तहीन, तेजोमय, अखण्ड—तब हम देखेंगे कि यह वर्तमान जीवन, अपनी सारी पीड़ाओं सहित, वास्तव में कितना छोटा था।
जो दिखाई नहीं देता, उस पर दृष्टि लगाए रखना
परन्तु आज, विशेषकर जब हम बीमारी का सामना कर रहे होते हैं—तो आज का दिन बहुत ही भारी प्रतीत हो सकता है। अतः हम क्या करें?
हम दिखाई देने वाली वस्तुओं को नहीं, परन्तु उन वस्तुओं को देखते हैं जो दिखाई नहीं देती हैं।
यह विश्वास का अनुशासन है। अस्पताल के कमरे दिखाई देते हैं। जाँच के परिणाम दिखाई देते हैं। दुर्बलता दिखाई देती है। आर्थिक कठिनाई दिखाई देती है। शोक दिखाई देता है। परन्तु जो दिखाई नहीं देता, उसके लिए विश्वास की आवश्यकता होती है।
— अदृश्य मसीह, सिंहासन पर विराजमान।
— अदृश्य विरासत, सुरक्षित।
— अदृश्य महिमा, आने वाली है।
जो दिखाई नहीं देता, उस पर दृष्टि लगाए रखना या अपनी आँखें उस पर टिकाए रखना सच्चाई से दूर भागना नहीं है। यह वास्तविकता को स्वीकार करना है; क्योंकि दिखाई देने वाला संसार अस्थायी है और जो दिखाई नहीं देता, वह अनन्त है। भौतिक सुख-सुविधाएँ धोखा दे सकती हैं और जीवन की अच्छी परिस्थितियाँ हमारी दृष्टि को भटका सकती हैं। यहाँ तक कि अच्छी भेंटें भी चुपचाप हमारी भक्ति को परमेश्वर से दूर कर सकती हैं। इस दृष्टि से बीमारी एक विचित्र दया है—यह भ्रम को दूर करती है और उस बात की नाजुकता को प्रकट करती है जिस पर हम पहले भरोसा करते थे, और हमें आत्मिक चंगाई की ओर ले जाती है, क्योंकि यह हमें पूछने के लिए विवश करती है कि वास्तव में क्या स्थायी है।
इसलिए, अपनी दृष्टि स्थिर रखें… मनुष्य की सामर्थ्य पर नहीं; संस्थाओं पर नहीं; प्रतिष्ठा पर नहीं; यहाँ तक कि उत्तम से उत्तम लोगों पर भी नहीं। परन्तु जो दिखाई नहीं देता, उस पर दृष्टि लगाए रखें।
और आगे बढ़ना मत छोड़िए! दुःख हमें रुक जाने के लिए उकसाता है। आत्म-दया एक कोमल और आरामदायक ठिकाना है, और शोक आसानी से हमारी पहचान बन सकता है और पीड़ा एक बहाना बन सकती है। परन्तु मसीह में हम पीड़ित नहीं हैं। जैसा पौलुस कहता है, हम “विजेता से भी बढ़कर हैं।” इसलिए नहीं कि दुःख छोटा है, परन्तु इसलिए कि मसीह उससे भी बड़ा है, और मृत्यु के सामने हमें विश्वास प्रदान करता है।
सुसमाचार प्रचार-प्रसारक डेविड ब्रेनर्ड, जो कम आयु में ही भयंकर पीड़ा में मृत्यु का सामना कर रहे थे, उन्होंने एक बार प्रार्थना की, “हे प्रभु, ऐसा न हो कि मैं अपनी स्वर्गीय यात्रा में रुक जाऊँ।” यह उन लोगों की प्रार्थना है जो दुःख को आज्ञाकारिता में बाधा नहीं बनने देते हैं। हाँ, हमें मसीह में विश्राम करना, शोक करना और दुःख तथा हानि को समझना आवश्यक है, साथ ही सहायता को स्वीकार करना भी आवश्यक है। परन्तु रुकना नहीं है। उन वरदानों का उपयोग करें जिन्हें परमेश्वर ने दया करके आपको दिया है। अपने लोगों से प्रेम करें। पवित्रता का पीछा करें। आनन्द की खोज करें। मसीह की सेवा करें। इन परिस्थितियों में प्रभु की बाट जोहते हुए, कि हम अपनी सामर्थ्य को फिर से नया पाते हैं। बीमारी आपकी क्षमता को सीमित कर सकती है, परन्तु स्मरण रखें… “हम हियाव नहीं छोड़ते हैं।”
यह बीमारी की पीड़ा का इन्कार नहीं करता। यह केवल कठिन समय में आशा खोजकर उन्हें नए रूप में प्रस्तुत करता है।
मसीह के कारण: बीमारी वह नहीं है जो आप हैं। बीमारी परमेश्वर की महिमा से बाहर नहीं है। और आने वाली बातों की तुलना में बीमारी हल्की और क्षणिक है। जब हम चंगाई और दीर्घकालिक बीमारी के लिए बाइबल की आयतों को देखते हैं, तो हम देखते हैं कि हमारी वर्तमान परीक्षाएँ हमें महिमा के अनन्त भार के लिए तैयार कर रही हैं।
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मनन के लिए प्रश्न:
कौन सी व्यावहारिक आदतें यह सुनिश्चित करने में सहायता करती हैं कि दुःख शुद्धिकरण का स्थान बने, न कि रोष का?”
यदि अनन्त महिमा की तुलना में बीमारी और दुःख केवल एक ‘हल्का और पल भर का क्लेश’ है, तो अनन्तकाल पर नियमित रूप से मनन करना वर्तमान कठिनाई को समझने के लिए आपके दृष्टिकोण को किस प्रकार से बदल सकता है?
कौन सी ‘देखी जाने वाली’ वस्तुएँ आपको सबसे सरलता से विचलित या निराश करती हैं (आराम, प्रतिष्ठा, सुरक्षा, अन्याय, शोक)? और इस सप्ताह व्यावहारिक रूप से, अदृश्य मसीह और उसकी आने वाली महिमा पर अधिक उद्देश्यपूर्वक दृष्टि लगाने का क्या अर्थ होगा?
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भाग IV: बीमारी का भी एक गीत है
भजन संहिता को बार-बार पढ़ते रहें, जब तक कि आपके पास विलाप में अपने हृदय को परमेश्वर के सामने उण्डेलने के लिए आवश्यक शब्दावली, व्याकरण और वाक्य-विन्यास न हो जाए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आपके पास अपने दुःख, निराशा और हृदय-विदारक पीड़ा के समयों का सामना करने के लिए, और यहाँ तक कि सबसे अन्धकारमय समयों में भी आराधना करते रहने और परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक साधन होंगे। (कार्ल ट्रूमैन, “व्हाई डू मिसरेबल क्रिश्चियन्स सिंग”)
बीमारी का जो एक गीत है; वह हमेशा विजय का गीत नहीं होता और प्रायः वह एक कराहने …और विलाप के रूप में आरम्भ होता है। आइए, हम मिलकर भजन संहिता 13 में से होकर चलें, क्योंकि हमें विलाप के भजनों की आवश्यकता है—विशेषकर तब जब हम बीमारी का सामना कर रहे होते हैं।
भजन संहिता 13 सबसे छोटे भजनों में से एक है, फिर भी यह एक दुःख उठाने वाले विश्वासी के हृदय का पूरा भार अपने ऊपर लिए हुए है। यह भरोसे के साथ नहीं, वरन् बार-बार कहे जाने के साथ आरम्भ होता है:
हे परमेश्वर, तू कब तक? क्या सदैव मुझे भूला रहेगा?
तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रखेगा?
मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ,
और दिन भर अपने हृदय में दुखित रहा करूँ?
कब तक मेरा शत्रु मुझ पर प्रबल रहेगा? (भजन संहिता 131-2 बी.एस.आई.)
भजनकार चार बार पुकारता है, कि “कब तक?” यह थके हुए विश्वास की पुकार है। जैसे लम्बी यात्रा में गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा बच्चा पूछता है—“क्या हम अभी तक नहीं पहुँचे?”—वैसे ही दाऊद का प्रश्न जानकारी प्राप्त करने के लिए नहीं है। यह पीड़ा व्यक्त करने वाला प्रश्न है। समस्या केवल दुःख नहीं है; समस्या समय भी है, कि इसका अन्त कब होगा, क्योंकि दुःख इतना लम्बा प्रतीत होता है कि मानो यह उस समय से भी आगे बढ़ गया है जिसकी अनुमति परमेश्वर की दया को देनी चाहिए थी।
यदि आप बीमारी और बढ़ती हुई दुर्बलता के साथ जीवन बिता रहे हैं, तो आप इस पुकार को जानते हैं। केवल इसलिए नहीं कि “क्यों”? परन्तु “कब तक?” और यहाँ पहली शान्ति देने वाली बात यह है: कि बाइबल समझती है।
विलाप के भजनों में सबसे बड़ी प्रतिज्ञा यह है कि परमेश्वर का दूर प्रतीत होना सदैव अस्थायी होता है।” (सफरिंग वाइज़ली एंड वेल: द ग्रीफ ऑफ जॉब एंड द ग्रेस ऑफ गॉड, एरिक ऑर्टलुंड)
भजन संहिता 13 हमारी पीड़ा को चुप नहीं कराता; वरन् उसे गाने के लिए शब्द देता है। हमारे सबसे अन्धकारमय क्षणों में भी, पवित्रशास्त्र हमें गाने के लिए एक गीत देता है। सुनिए, सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में जॉन फ्लैवेल ने अपने पाठकों को विलाप करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया था:
एक मसीह व्यक्ति के लिए यह कहीं अधिक उचित है कि वह बिना किसी बनावट के सच्चे मन से अपनी पीड़ाओं को परमेश्वर के सामने प्रकट करे, बजाय इसके कि वह उन्हें उदासीनता से अपने भीतर दबाए रखे। परमेश्वर से अपनी पीड़ा के विषय में कहना पाप नहीं है, परन्तु परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करना बड़ा दुष्ट काम है। (पृष्ठ. 20, जॉन फ्लैवेल, फ़ेसिंग ग्रीफ़ – काउन्सल फॉर मॉर्नर्स)
दाऊद की शिकायत
दाऊद की शिकायत तीन विषयों के सम्बन्ध में सामने आती है।
— क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? (आ 1)। उसकी सबसे गहरी पीड़ा शारीरिक संकट नहीं, वरन् ईश्वरीय अनुपस्थिति का अनुभव करना है। उसे लगता है कि उसे भुला दिया गया है।
— और दिन भर अपने हृदय में दुखित रहा करूँ? (आ 2)। उसका आन्तरिक संसार उथल-पुथल स्थिति में है। उसके विचार उसे थका रहे हैं।
— कब तक मेरा शत्रु मुझ पर प्रबल रहेगा? (आ 3)। बाहरी दबाव भी हैं—जैसे कि विरोध, अपमान और असुरक्षा।
पीड़ा कभी भी एकरंगी नहीं होती। बीमारी शायद ही कभी केवल एक ही क्षेत्र तक सीमित रहती है। उसने दाऊद के ईश्वर विज्ञान सम्बन्धी विचारों को प्रभावित किया (“क्या परमेश्वर ने मुझे त्याग दिया है?”), उसके मनोवैज्ञानिक जीवन को प्रभावित किया (चिन्ता, थकावट, निराशा), और उसके सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया (दूसरों पर निर्भरता, गलत समझा जाना, अकेलापन)।
परन्तु एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान दीजिए। दाऊद पुकारता है, “हे यहोवा, कब तक?” वह वाचा के नाम—याहवेह (यहोवा) का प्रयोग करता है। जब परमेश्वर दूर प्रतीत होता है, तब भी दाऊद उसे व्यक्तिगत रूप से उस विश्वासयोग्य और अटल प्रेम करने वाले यहोवा के रूप में सम्बोधित करता है।
जब बीमारी सामर्थ्य, आत्मनिर्भरता और यहाँ तक कि मन की स्पष्टता को भी छीन लेती है—तब सहज रूप से आप किसे पुकारते हैं? मित्र परमेश्वर के दिए हुए वरदान हैं। परिवार अनमोल है। चिकित्सक आवश्यक हैं। परन्तु इनमें से कोई भी आपका पूरा भार नहीं उठा सकता है। दाऊद की सहज प्रवृत्ति यह है कि वह यहोवा को पुकारता है, और यह प्रवृत्ति प्रकट करने वाली भी है और सांत्वना देने वाली भी। दुर्बल विश्वास भी जब सही परमेश्वर तक पहुँचने का प्रयास करता है, तो वह वास्तविक विश्वास बन जाता है।
परन्तु इस तनाव पर ध्यान दीजिए। भजन संहिता 13 के अनेक सारांश इसे “संकट से आनन्द तक” कहते हैं। संरचना की दृष्टि से यह सही है, परन्तु वास्तविक जीवन का अनुभव प्रायः इतना सरल नहीं होता है, क्योंकि कई बार संकट बना रहता है। यह भजन केवल परिवर्तन को नहीं दिखाता, वरन् तनाव को प्रकट करता है—जैसे संकट के बीच आनन्द। दाऊद परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा नहीं करता कि तब वह भरोसा करना आरम्भ करेगा। वास्तव में, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि उसकी परिस्थितियाँ बिल्कुल बदल गई थीं। अपनी पीड़ा का विलाप करने के बाद, वह विनती करता है:
“हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे।” (आ 3)
तर्क की दृष्टि से यह बहुत सार्थक नहीं लगता। क्योंकि यदि परमेश्वर दूर है और कोई उत्तर नहीं दे रहा है, तो फिर उससे दोबारा विनती क्यों की जाए? ईश्वर विज्ञानी डेल राल्फ डेविस ने एक बार इस पंक्ति पर टिप्पणी करते हुए कहा था:
यह तर्क की दृष्टि से कमजोर है, परन्तु विश्वास की दृष्टि से उत्तम है। (डेल राल्फ डेविस)
सहज प्रवृत्ति विश्वासयोग्यता को प्रकट करती है
जिस प्रकार एक पिता बार-बार अपने पुत्र की ओर गेंद उछालता है, तो कुछ समय बाद पुत्र उसे पकड़ने के लिए सहज रूप से अपने हाथ बढ़ा देता है। उसी प्रकार यहाँ दाऊद सहज रूप से परमेश्वर की ओर मुड़ता है, और अपनी सहज प्रतिक्रिया प्रकट करता है कि उसका समर्पण किसके प्रति है। जब बीमारी आपको जकड़ लेती है, तब आप किसकी ओर मुड़ते हैं? ध्यान भटकाने वाली बातों की ओर? कड़वाहट की ओर? स्वयं पर निर्भर होने की ओर? या निराश होकर हार मान लेने की ओर? जीवित विश्वास, यहाँ तक कि काँपता हुआ विश्वास भी, फिर से परमेश्वर की ओर लौटता है—“हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे”
बीमारी यह प्रकट कर देती है कि हम परमेश्वर को अपनी इच्छाएँ पूरी करने वाले किसी जादुई सामर्थी प्राणी के समान समझते हैं या अपनी वाचा के प्रभु के समान। फिर भी, आँसुओं के बीच दाऊद कहता है, “हे यहोवा, मेरे परमेश्वर।” यहाँ “मेरे” सर्वनाम का बहुत महत्व है।
फिर दाऊद प्रार्थना करता है, “मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी।”
(आ 3ब)
वाक्यांश “मेरी आँखों में ज्योति आने दे” नया जीवन-बल मिलने की बात करता है। 1 शमूएल 14 में, योनातान मधु खाता है और कहता है, “देखो, मेरी आँखें कैसी चमक उठीं।” यह सामर्थ्य की एक नई लहर थी। दाऊद भी यही माँग रहा है—अर्थात् सहन करने के लिए नई सामर्थ्य।
फिर वह परमेश्वर के साथ तर्क करता है। तीन बार वह “ ऐसा न हो कि” कहता है—ऐसा न हो कि मैं मृत्यु की नींद सो जाऊँ; ऐसा न हो कि मेरा शत्रु कहे, “मैं उस पर प्रबल हुआ हूँ”; ऐसा न हो कि मेरे विरोधी मेरे डगमगाने के कारण आनन्द मनाएँ। यह कोई अस्पष्ट विनती नहीं है, वरन् विचारपूर्ण प्रार्थना है। इसमें भावनाएँ और तर्क दोनों साथ-साथ हैं। वह परमेश्वर के नाम की प्रतिष्ठा की चिन्ता करता है।’ वह इस बात की चिन्ता करता है कि उसका स्वयं गिरना क्या संकेत देगा। उसकी प्रार्थना यह नहीं है, कि “ जीवन को सरल बना दे।” वरन् यह है, कि “हे यहोवा, कृपया अपने नाम’ के निमित्त कार्य कर।”
फिर आयत 5 में एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है: “परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है।”
इब्रानी शब्द हेसेद है, जिसका अर्थ “अटल प्रेम” या “वाचा की प्रेम पूर्वक भलाई” है।
जब परमेश्वर ने निर्गमन 34:6 में मूसा पर अपने आपको प्रकट किया, तो उसने अपने विषय में यह घोषणा की कि वह “करुणा और अनुग्रह से भरपूर, विलम्ब से क्रोध करने वाला और अटल प्रेम (हेसेद) तथा विश्वासयोग्यता से परिपूर्ण” है। यह इस्राएल ’ के सोने के बछड़े के साथ किए गए विद्रोह के बाद हुआ था। वे (हेसेद) के योग्य नहीं थे—फिर भी परमेश्वर ’ का प्रेम बना रहा, क्योंकि यह उनके योग्य होने पर नहीं, वरन् उसके अपने स्वभाव से प्रवाहित होता है। और यही आश्चर्यकर्म है।
परमेश्वर का अटल प्रेम
परमेश्वर’ का आपके प्रति अटल प्रेम आपके स्वास्थ्य, मनोदशा या कार्यों के अनुसार घटता-बढ़ता नहीं है। यह इस बात में स्थिर रहता है कि वह कौन है। दाऊद’ की परिस्थितियाँ बदली हुई दिखाई नहीं देती हैं। उसके शत्रु अभी भी वास्तविक हैं। दुःख में वह अब भी विलाप कर सकता है, उसका शरीर अब भी पीड़ा सह सकता है। परन्तु वह हेसेद पर निर्भर रहता है। और इसलिए, वह कह सकता है:
आ 5ब “मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।”
ध्यान दें कि इसमें कितना दृढ़ निश्चय है। वह किसी भावना की प्रतीक्षा नहीं करता कि वह उसे ऊपर उठा दे। वह स्वयं से बात करता है। “मैं आनन्दित होऊँगा।” “मैं गाऊँगा।” विश्वास निष्क्रिय नहीं होता। वह अपने आधार को चुनता है।
वह विलाप करने से भरोसे की ओर इसलिए नहीं बढ़ता कि पीड़ा समाप्त हो गई है या तूफान थम गया है; परन्तु इसलिए कि उसने स्मरण किया है कि परमेश्वर कौन है।
आ 6 “मैं यहोवा के नाम का भजन गाऊँगा, क्योंकि उसने मेरी भलाई की है।”
“मेरी भलाई” भरपूरी की बात करता है। पर्याप्त होने की बात करता है। दाऊद संकट में ऐसा कैसे कह सकता है? क्योंकि भरपूरी उसकी परिस्थितियों से परिभाषित नहीं होती है। यह उसके प्रभु—अटल प्रेम करने वाले परमेश्वर से परिभाषित होती है, और इसी में वह निश्चय के साथ गा सकता है।
मसीही लोग अर्थात् हम जब यीशु की ओर देखते हैं, तो भजन 13 और भी गहराई से हमारे हृदय को छू लेता है।
इब्रानियों 5:7 हमें बताता है कि अपने पृथ्वी के जीवन में यीशु ने ऊँचे शब्दों से पुकारकर और आँसू बहाकर प्रार्थनाएँ की। वह भयानक विलाप को जानता है। क्रूस पर उसने सबसे बड़े “कब तक?” का अनुभव किया—जब उसके पिता का मुख उससे फिर गया। उसे त्यागा गया, ताकि हम कभी अन्ततः त्यागे न हों। उसने पीड़ा के बगीचे में प्रवेश किया, ताकि हम अनन्त आनन्द के बगीचे में प्रवेश कर सकें। उसने मृत्यु का सामना किया, ताकि “मृत्यु की नींद” हम पर अन्तिम अधिकार न रख सके। यीशु के कारण… जय ने मृत्यु को निगल लिया है (1 कुरिन्थियों 15:55)। हमारे शत्रु पराजित हो चुके हैं (कुलुस्सियों 2:15)। हमारा अनन्त भविष्य सुरक्षित है (रोमियों 8:37-39)। उसमें परमेश्वर ने हमारे साथ भलाई की है।
बीमारी बनी रह सकती है, पीड़ा बढ़ सकती है और शरीर दुर्बल हो सकते हैं। परन्तु यदि आप मसीह के साथ एकता में जुड़े हुए हैं, तो आप उसके अटल प्रेम में पूर्ण हैं। इसी कारण भजन का अन्त स्तुति के साथ होता है। यह न तो अनुभवहीन इनकार है और न ही बल पूर्वक सकारात्मक सोच है। यह अडिग विश्वास है, जो परिस्थितियों के सामने झुकता नहीं है। क्या आप भजन के प्रवाह को देखते हैं? भरोसा रखो। आनन्दित रहो। और गाओ।
कभी-कभी आप आँसुओं के बीच गाएँगे। कभी-कभी आपके पास गाने की सामर्थ्य भी नहीं होगी। इसी कारण परमेश्वर ने हमें विश्वासियों के एक परिवार में रखा है, ताकि जब हम अपनी आवाज भी न उठा सकें, तब दूसरे हमारे कानों में सत्य का गीत गाएँ। परन्तु स्मरण रखें: बीमारी का भी एक गीत है।
प्रायः इसका आरम्भ “कब तक?” से होता है। परन्तु इसका समापन वहीं होना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यदि आपकी परिस्थितियाँ न भी बदलें, तब भी आप बदल सकते हैं। जब आप प्रभु के अटल प्रेम के निकट आते हैं और उसी पर आश्रित रहते हैं, अर्थात् उस प्रेम पर जिसका कभी अन्त नहीं होता…और इस सत्य को हृदय में बसा लेते हैं कि वह “प्रति भोर नया होता है” (विलापगीत 3:22–23)।
अतः आज—चाहे आप स्वयं को कितना ही दुर्बल क्यों न अनुभव करें—प्रसिद्ध दाऊद के और भी अधिक महान पुत्र (यीशु) पर भरोसा रखते हुए दाऊद के साथ यह कहें:
“ परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है;
मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।
मैं यहोवा के नाम का भजन गाऊँगा,
क्योंकि उसने मेरी भलाई की है।” (भजन संहिता 13:5-6 बी.एस.आई.)
—
मनन के लिए प्रश्न:
जब बीमारी या दुःख बना रहता है, तो आपकी सहज प्रतिक्रिया क्या होती है? आप सबसे पहले किसके पास या किस वस्तु की ओर मुड़ते हैं—और वह क्या प्रकट करता है कि आपका वास्तविक आधार कहाँ स्थित है?
भजन संहिता 13 प्रार्थना में भावनाओं और विचार को एक साथ रखता है। आप किस प्रकार अधिक ईमानदारी से प्रार्थना करना आरम्भ कर सकते हैं—अर्थात् अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हुए और परमेश्वर पर अपने दृढ़ भरोसे को उसके सामने रखते हुए?
आपकी वर्तमान परिस्थितियों में जानबूझकर यह कहने का क्या अर्थ होगा, “मेरा हृदय आनन्दित होगा”? मसीह में परमेश्वर का अटल प्रेम किस प्रकार आपके दुःख को देखने और समझने के ढँग को बदल सकता है?
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भाग V: बीमारी आनन्द-रहित नहीं है।
हम में से बहुत लोग परमेश्वर की भलाई को अपनी परिस्थितियों की सहजता से मापते हैं। जब काम स्थिर होता है, पारिवारिक जीवन आनन्दमय होता है, स्वास्थ्य अच्छा होता है और योजनाएँ सफल हो रही होती हैं, तब अनजाने में हम यह सोच सकते हैं, “कि परमेश्वर भला है।” परन्तु जब बीमारी आती है तब क्या होता है? जब हानि, शोक, मानसिक पीड़ा या शारीरिक दुर्बलता होती है, तब क्या होता है? क्या तब भी परमेश्वर भला है?
बीमारी से स्वतंत्र आनन्द
बहुतों के लिए, दुःख परमेश्वर के स्वभाव के विषय में संदेह उत्पन्न करता है। आनन्द ऐसा प्रतीत होता है कि वह सुख-सुविधा से जुड़ा हुआ है, इस प्रकार जब सुख-सुविधा समाप्त हो जाती है, तो आनन्द भी उसके साथ मिट जाता है, और हम सूक्ष्म रूप से यह मान लेते हैं कि कठिनाई प्रसन्नता को समाप्त कर देती है।
बीमारी विशेष रूप से आनन्द-रहित अनुभव हो सकती है, परन्तु पवित्रशास्त्र इस धारणा को चुनौती देता है, जैसा कि विलियम काउपर ने अपने भजन “कभी-कभी एक ज्योति अचानक चमक उठती है” में बहुत सुन्दरता से व्यक्त किया है:
कभी-कभी एक ज्योति मसीही व्यक्ति को चकित कर देती है, जब वह गाता है;
वह प्रभु ही है जो अपने पंखों में चंगाई लेकर प्रकट होता है।
जब सुख-सुविधाएँ घट रही होती हैं, तब वह प्राण को फिर से
निर्मल ज्योति का एक समय देता है, ताकि वर्षा के बाद उसे आनन्दित करे। (विलियम काउपर, 1779)
बाद में इसी भजन में, काउपर हबक्कूक 3 का उल्लेख करते हैं, जो हमें दिखाता है कि विश्वासी के लिए दुःख—और बीमारी—आनन्द-रहित नहीं है। हबक्कूक ऐसे व्यक्ति के रूप में लिखता है जो विनाश का सामना कर रहा होता है। बेबीलोन के वासी/कसदी आ रहे हैं। हिंसा, विनाश और आर्थिक पतन निश्चित हैं (देखें अध्याय 1 और 2)। फिर भी अन्त में वह गा सकता है:
“ तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा;
और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा।” (हबक्कूक 3:18, बी एस आई)
हबक्कूक 3 गीत और प्रार्थना दोनों है। वह स्मरण करने के द्वारा आरम्भ करता है:
“ हे यहोवा, मैं तेरी कीर्ति सुनकर डर गया।
हे यहोवा, वर्तमान युग में अपने काम को पूरा कर;
इसी युग में तू उसको प्रगट कर;
क्रोध करते हुए भी दया करना स्मरण कर।” (3:2)
हबक्कूक भयभीत है। वह इसका ढोंग नहीं करता कि ऐसा नहीं है। बाद में वह कहता है:
“ यह सब सुनते ही मेरा कलेजा काँप उठा,
मेरी हड्डियाँ सड़ने लगीं, और मैं खड़े-खड़े काँपने लगा।
मैं शान्ति से उस दिन की बाट जोहता रहूँगा
जब दल बाँधकर प्रजा चढ़ाई करे। मेरे होंठ थरथराने लगे।” (3:16)
दुःख ऐसा ही अनुभव कराता है—बीमारी शरीरों को कंपा देती है। बाइबल ऐसे भय को नकारती नहीं है। परन्तु इस अध्याय का अधिकांश भाग हबक्कूक ’ की परिस्थितियों के विषय में नहीं है; यह परमेश्वर के विषय में है। हबक्कूक स्मरण करता है कि परमेश्वर कौन है। वह प्रभु ’ के सामर्थी कार्यों को स्मरण करता है—निर्गमन में उसकी सामर्थ्य, सृष्टि पर उसका अधिकार, बुराई के विरुद्ध उसका न्याय और अपने लोगों को बचाने की उसकी प्रतिज्ञा। वह यह स्मरण करते हुए घोषणा करता है कि परमेश्वर उद्धारकर्ता है:
“ तू अपनी प्रजा के उद्धार के लिये निकला,
हाँ, अपने अभिषिक्त के संग होकर उद्धार के लिये निकला।” (3:16)
परमेश्वर को स्मरण करना
यह दुःख में आनन्द की पहली कुंजी है: स्मरण करना। जब बीमारी हमारी दृष्टि को जाँच के परिणामों और उपचारों तक सीमित कर देती है, तब हमें अपनी दृष्टि को विस्तृत करके प्रभु के स्वभाव को देखना चाहिए। वह पवित्र है। वह प्रभुता करता है। वह दयालु है। वह उद्धार करता है।
स्मरण करना फिर से जुड़ना है—अपने आप को फिर से परमेश्वर से जोड़ना है। जब हम स्मरण करते हैं कि वह कौन है, तो दुःख समाप्त नहीं होता है, परन्तु उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। बीमारी वास्तविक है, परन्तु वह अन्तिम सत्य नहीं है—परमेश्वर ही अन्तिम सत्य है। इसके बाद हबक्कूक सबसे निराशाजनक स्थिति का चित्र प्रस्तुत करता है:
क्योंकि चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें,
और न दाख लताओं में फल लगें,
जैतून के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए
और खेतों में अन्न न उपजे,
भेड़शालाओं में भेड़-बकरियाँ न रहें,
और न थानों में गाय बैल हों। (3:17)
यह पूर्ण विनाश है—कृषि, आर्थिक और सामाजिक विनाश। कुछ भी काम नहीं कर रहा है, और ऐसी परिस्थितियों में आनन्द का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिखाई देता है। फिर भी ध्यान दें कि वह क्या कहता है:
तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा,
और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा। (3:18)
दोहराए जाने पर ध्यान दें: “मैं आनन्दित रहूँगा।” “मैं आनन्द मनाऊँगा।” इब्रानी कविता में प्रायः किसी सत्य पर जोर देने के लिए उसे दोहराया जाता है, जिससे वह हृदय में और अधिक गहराई तक उतर जाए। हबक्कूक जानता है कि दुःख में आनन्दित होना सहज प्रवृत्ति नहीं है। इसे चुनना और घोषित करना पड़ता है। यहाँ क्रियाएँ महत्वपूर्ण हैं: “मैं करूँगा।” यहाँ आनन्द कोई निष्क्रिय भावना नहीं है, वरन् सक्रिय दृढ़ निश्चय है। हबक्कूक यह नहीं कह रहा है, कि “मैं आनन्दित महसूस करता हूँ।” परन्तु वह कह रहा है, कि “मैं आनन्दित होने का चुनाव करता हूँ।”
बीमारी बहुत-सी योग्यताओं को छीन सकती है। यह चलने-फिरने की क्षमता, शक्ति, भूख, और यहाँ तक कि बोलने की सामर्थ्य को भी सीमित कर सकती है। परन्तु यह परमेश्वर में आनन्दित होने की इच्छा को नहीं छीन सकती है। सबसे निर्बल विश्वासी भी अपने हृदय और मन में यह कह सकता है, कि “मैं अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित होऊँगा।”
इस प्रकार से दोहराया जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि बीमारी और दुःख हमारे मन को धुँधला कर देते हैं। हम उन बातों को भी भूल जाते हैं जिन्हें हम जानते हैं। मैं अपने घर में ऊपर की मंज़िल तक जाता हूँ, और वहाँ पहुँचने में लगने वाले केवल दस सेकण्ड के भीतर ही यह भूल जाता हूँ कि मैं ऊपर क्यों आया था! इसलिए हमें सत्य को बार-बार सुनने की आवश्यकता है—पवित्रशास्त्र के द्वारा, प्रचार के द्वारा, गीतों के द्वारा, और मित्रों के द्वारा। सुसमाचार को बार-बार सुनाया जाना चाहिए। जहाँ सुसमाचार का की सच्चाई बार-बार दोहरायी जाती है, वहाँ आनन्द बढ़ता चला जाता है।
यह लगभग बहुत सरल लगता है: कि आनन्दित होने के लिए हमें आनन्दित होना चाहिए। परन्तु पवित्रशास्त्र हमें इसकी आज्ञा देता है, क्योंकि आनन्दित होना विश्वास का एक कार्य है। प्रभु में आनन्दित होने का अर्थ है कि उसे अपना बहुमूल्य धन समझना। इसका अर्थ उद्धारकर्ता के रूप में उसमें आनन्द लेना है। हबक्कूक अंजीरों, पशुओं या आर्थिक सुरक्षा में आनन्दित नहीं होता। वह “यहोवा में” आनन्दित होता है और “अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में” आनन्द पाता है।
यह वाक्यांश अत्यन्त महत्वपूर्ण है: “मेरे उद्धार का परमेश्वर।” उसका आनन्द छुटकारे में दृढ़ता से जुड़ा हुआ है।
हमारे लिए उद्धार और भी स्पष्ट है। हम उस बड़े छुटकारे की ओर देखते हैं—अर्थात् क्रूस की ओर। यीशु मसीह, जो सच्चा और उत्तम मेम्ना है, उसने हमें पाप और मृत्यु से छुड़ाने के लिए अपना लहू बहाया। यदि वह उद्धार सुरक्षित है, तो वह सबसे गहरी भलाई हमसे कभी नहीं छीनी जा सकती है।
बीमारी सामर्थ्य को छीन सकती है। यह स्वतंत्रता को छीन सकती है। यह वर्षों को छीन सकती है। परन्तु यह मसीह को नहीं छीन सकती हैं। यह जीवन की पुस्तक से हमारे नामों को नहीं मिटा सकती है। यह धर्मी ठहराए जाने को पलट नहीं सकती है। यह हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती है।
इसीलिए बीमारी और दुःख आनन्द-रहित नहीं हैं।
टिम केलर ने एक बार एलन गार्डनर की कहानी सुनाई थी; वे ब्रिटिश रॉयल नेवी के अधिकारी और दक्षिण अमेरिका के पाटागोनिया क्षेत्र में सुसमाचार प्रचार-प्रसारक थे। उन्होंने और उनके दल ने स्वयं को चिली के सबसे दक्षिणी भाग में, केप हॉर्न के निकट पिक्टन द्वीप के ठीक बाहर एक अलग-थलग स्थान पर पाया। यह 1851 के आरम्भ की बात थी। उनके दल के लिए भेजी गई आवश्यक सामग्री खराब मौसम के कारण उनसे सैकड़ों मील दूर फ़ॉकलैंड द्वीपों में ही फँसी रह गई। इसलिए धीरे-धीरे, एक-एक करके, उनके साथी भूख से मरते गए। गार्डनर सबसे अन्त में मरे, और उनकी डायरी की अन्तिम प्रविष्टि में पाया गया कि उन्होंने भजन संहिता 34:10 लिखा था:
जवान सिंहों को तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं;
परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी न होगी।
गार्डनर क्या कर रहे थे? वह अपने प्रभु का स्मरण कर रहे थे, और इसी कारण वह अपने दुःख में भी आनन्दित हो सके। उनकी डायरी में लिखे गए अन्तिम शब्द ये थे:
‘ मैं परमेश्वर की भलाई की गहरी अनुभूति से अभिभूत हूँ ’।
पौलुस इसी विरोधाभास को तब व्यक्त करता है जब वह 2 कुरिन्थियों 6:10 में अपने आप को “दुःखी, होने के बावजूद भी सदा आनन्दित” बताता है। संसार जैसा प्रायः सिखाता है, दुःख और आनन्द एक के बाद एक आने वाली बातें नहीं हैं। पौलुस कहता है कि दुःख और आनन्द एक ही समय में उपस्थित हो सकते हैं। हम प्रायः चाहते हैं कि दुःख समाप्त हो जाए और आनन्द आ जाए, परन्तु यह प्रायः केवल एक कल्पना होती है जो कि वास्तविकता से दूर होती है। इसके बजाय, पवित्रशास्त्र दुःख में आनन्द के इस सुन्दर तनाव को बनाए रखता है—“दुःखी, फिर भी सदा आनन्दित।” हम इसे हबक्कूक के निष्कर्ष में देखते हैं:
यहोवा परमेश्वर मेरा बल मूल है,
वह मेरे पाँव हिरनों के समान बना देता है’,
वह मुझ को मेरे ऊँचे स्थानों पर चलाता है।” (3:19)
यह छवि बहुत प्रभावशाली है: एक हिरन जो ऊँची चट्टानों पर मार्ग बनाता हुआ चलता है—अपने पैरों पर दृढ़, फुर्तीला और खतरे से ऊपर उठा हुआ होता है। दुःख हमें कड़वाहट और अपने ऊपर दया करने की भावना में नीचे गिरा सकता है। या फिर, परमेश्वर के अनुग्रह से, यह हमें और गहरे विश्वास की ऊँचाइयों तक ऊपर उठा सकता है।
हमारे आनन्दित होने को कौन रोकता है?
बीमारी में आनन्दित होने का अर्थ यह दिखावा करना नहीं है कि बीमारी सुखद है। इसका अर्थ यह विश्वास रखना है कि परमेश्वर उसमें भी हमारा बल है। चढ़ाई कठिन है, परन्तु ऊँचाई से दिखाई देने वाला दृश्य अधिक स्पष्ट होता है, क्योंकि ऊँचाइयों पर हम देखते हैं कि परमेश्वर अब भी भला है। तो फिर, हमें आनन्दित होने से कौन रोकता है?
— पाप ऐसा कर सकता है। दाऊद ने प्रार्थना की, “अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे” (भजन संहिता 51:12, बी एस आई)। अंगीकार न किया गया पाप परमेश्वर में आनन्द को धीमा कर देता है।
— सुख-सुविधा भी ऐसा कर सकती है। आराम के प्रति समर्पित जीवन स्थायी आनन्द उत्पन्न नहीं करेगा। यदि हम केवल परिस्थितियों में आनन्दित होते हैं, तो जब वे बदलेंगी, तब हम टूट जाएँगे।
परन्तु यदि हम प्रभु में आनन्दित होते हैं—यदि हम अपने उद्धारकर्ता की सेवा करते हैं और उसमें आनन्द पाते हैं—तो आनन्द बीमारी, आँसुओं और काँपने के साथ भी बना रह सकता है। हबक्कूक हमें दिखाता है कि विश्वास भय को नकारता नहीं है; वरन् उसके बीच में भी गाता है। वह आयत 16 में काँपता है और आयत 18 में आनन्दित होता है। कसदी लोग अब भी आ रहे हैं, और खेत अब भी उजाड़ पड़े हुए हैं—फिर भी वह आनन्दित होता है।
बीमारी वास्तविक है, दुःख वास्तविक है, परन्तु विश्वासी के लिए इनमें से कोई भी आनन्द-रहित नहीं है। जब स्वास्थ्य असफल हो जाता है, तब भी परमेश्वर बना रहता है, और जब सामर्थ्य क्षीण हो जाती है, तब भी उद्धार स्थिर रहता है।
तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा,
और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा
उनके भजन का समापन देखिए। एक मनुष्य के रूप में, विलियम काउपर अपने पूरे जीवन भर मानसिक संघर्षों से जूझते रहे। परन्तु यीशु मसीह पर भरोसा रखने वाले व्यक्ति के रूप में, वे ये शब्द लिख सके:
यद्यपि दाखलता और अंजीर का वृक्ष अपने सामान्य फल न दें,
यद्यपि सब खेत सूख जाएँ और न भेड़-बकरियाँ रहें, न गाय-बैल,
तौभी परमेश्वर वैसा ही बना रहता है; मेरा स्वर उसकी स्तुति गाएगा।
क्योंकि जब तक मेरा भरोसा उस पर है, मैं आनन्दित हुए बिना नहीं रह सकता।
बीमारी में भी—हाँ, बीमारी में भी—हम आनन्दित हो सकते हैं।
—
मनन के लिए प्रश्न:
जब जीवन अच्छा चल रहा होता है, तब आपका आनन्द सबसे स्वाभाविक रूप से किससे जुड़ जाता है—स्वास्थ्य, स्थिरता, सफलता या सम्बन्धों से?
हबक्कूक आयत 16 में काँपता है, फिर भी आयत 18 में आनन्दित होता है। परमेश्वर के स्वभाव के विषय में कौन-कौन से विशेष सत्य (उसकी प्रभुता, दया, उद्धार, विश्वासयोग्यता) भय उत्पन्न होने पर आपकी सबसे अधिक सहायता करते हैं? कौन सी व्यावहारिक आदतें बीमारी या दुःख के समय, जब आपका दर्शन सीमित हो जाता है, उन सत्यों को “स्मरण” रखने में आपकी सहायता कर सकते हैं?
हबक्कूक दोहराता है, “मैं आनन्दित रहूँगा… मैं आनन्द मनाऊँगा।” जब दुःख आपकी सोच को धुंधला कर देता है, तब आपके आस-पास कौन आपको सुसमाचार के सत्य का स्मरण करा सकता है—और आप भी उनके लिए ऐसा कैसे कर सकते हैं?
—
निष्कर्ष
प्रभु को यह भाया कि वह मेरी प्रिय और विश्वासयोग्य पत्नी को अपने पास बुला ले, जिसके साथ मैंने लगभग 42 वर्ष जीवन बिताया। मेरे प्रति उसकी कोमलता और परमेश्वर के प्रति उसकी विश्वासयोग्यता ऐसी थी, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि वह मेरे सभी दुःखों में निरन्तर मेरे साथ सहानुभूति रखती थी। मैं सचमुच कह सकता हूँ कि मेरे या उसके जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियों के बीच मैंने उसे कभी भी थोड़ा सा भी असन्तोष प्रकट करते हुए नहीं सुना। उसने हमारे सभी दुःखों में परमेश्वर के हाथ को देखा और इस प्रकार वह निरन्तर मुझे परमेश्वर के मार्गों पर चलने के लिए प्रोत्साहित करती रही। उसकी मृत्यु मेरे लिए संसार में आए सभी दुःखों में से सबसे बड़ा दुःख था।
ये इंग्लैंड के बैपटिस्ट पास्टर विलियम किफिन के शब्द थे, जो उन्होंने अपनी पत्नी हन्ना के विषय में कहे थे, जिनकी मृत्यु 6 अक्टूबर 1682 को हुई थी। मैंने जनवरी 2024 में अपनी दिवंगत पत्नी सारा के जीवन का उत्सव मनाने के लिए एकत्र हुए लोगों के सामने ये शब्द पढ़े। किफिन के शब्दों को दोहराने के बाद मैंने केवल इतना कहा: “आज मैं भी उनके शब्दों को दोहराता हूँ।”
हम पहले ही देख चुके हैं कि बीमारी का सामना करना जीवन की ’ सबसे अधिक विचलित कर देने वाली यात्राओं में से एक है। यह भ्रम को दूर कर देता है, हमारी निर्बलता को प्रकट करता है और हमें उस वास्तविकता का सामना करने के लिए विवश करता है जिससे हम बचना चाहते हैं: हमारे शरीर क्षीण हो रहे हैं, और इस संसार में हम जो सबसे बड़ा दुःख कभी जानेंगे, वह और अधिक स्पष्ट होकर हमारे सामने आ जाता है। फिर भी मसीही व्यक्ति न तो इनकार से आरम्भ करता है और न ही ऊपरी आशावाद से। हम ईमानदारी से आरम्भ करते हैं— और मसीह के साथ करते हैं।
हम देख चुके हैं कि बीमारी आपकी पहचान नहीं है। यीशु के साथ एक होकर हमारी पहचान लक्षणों से कहीं अधिक गहराई में स्थिर है। आप “मसीह में” हैं—अर्थात् सुरक्षित, प्रेम किए हुए और दोषी ठहराए जाने से स्वतंत्र हैं। आपका शरीर निर्बल हो सकता है, परन्तु मसीह के साथ आपकी एकता कम नहीं होती है।
हम देख चुके हैं कि बीमारी परमेश्वर के उद्देश्यों से बाहर नहीं है। “क्यों?” के प्रश्नों के उत्तर प्रायः नहीं मिलते हैं, परन्तु पवित्रशास्त्र हमारी दृष्टि को कारणों से उठाकर उद्देश्यों की ओर ले जाता है। चाहे चंगाई के द्वारा या सम्भालने वाले अनुग्रह के द्वारा, परमेश्वर के कार्य प्रकट होते हैं—कभी अद्भुत छुटकारे के रूप में, और अधिकतर शान्त धीरज के रूप में होते हैं।
हम देख चुके हैं कि अनन्त महिमा की तुलना में बीमारी हल्की और क्षणिक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पीड़ा को तुच्छ ठहराता है; वरन् यह उसे सही परिप्रेक्ष्य में रखता है। जब इसे अनन्तकाल के भार के सामने रखा जाता है, तो दशकों तक चलने वाला दुःख भी केवल एक छोटा-सा अध्याय लगता है।
हम देख चुके हैं कि बीमारी का भी एक गीत होता है। यह “जो कब तक?” से आरम्भ होता है, परन्तु इसका अन्त वहीं नहीं होता है। बीमारी के विषय में विलाप करना विश्वासहीनता नहीं है; वरन् यह वह विश्वास है जो आँसुओं के बीच से प्रभु के उस अटल प्रेम तक पहुँचता है, जो बना रहता है, यहाँ तक कि जब हमारी भावनाएँ डगमगा जाती हैं।
और हमने यह भी देखा है कि बीमारी आनन्द-रहित नहीं होती है। आराम से जुड़ा हुआ आनन्द टूट जाएगा। परन्तु उद्धार से जुड़ा हुआ आनन्द सदा बना रहेगा। इसलिए, “दुखी होते हुए भी सदा आनन्दित” रहना कोई विरोधाभास नहीं है, वरन् मसीही वास्तविकता है।
आश्चर्यजनक रूप से, कब्र का सबसे बड़ा दुःख भी विजय प्राप्त नहीं करता। बीमारी और नाश हमारी पहचान को निर्धारित नहीं करते। अर्थात्, आपके दुःख और बीमारी का अन्तिम शब्द नहीं है—वह मसीह का है। और वह घोषणा करता है कि बीमारी का अन्त है और अपनी दयालुता में उसने यूहन्ना को प्रकाशितवाक्य 21:1–4 में इसे प्रकट किया।
वहाँ यीशु हमारी आँखों को बीमारी और दुःख के निश्चित अन्त की ओर उठाता है। यूहन्ना “नया आकाश और नई पृथ्वी” देखता है, जहाँ “परमेश्वर का निवास मनुष्यों के साथ है।” उस बहाल की गई सृष्टि में, परमेश्वर स्वयं “उनके साथ वास करेगा, और वे उसकी प्रजा होंगे।” यह प्रतिज्ञा प्रत्येक अस्पताल के कमरे तक और कब्र के पास तक पहुँचती है: “और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी” (आ4अ)। और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं” (आ4ब)। बीमारी उन पुरानी बातों में से है। परन्तु मसीह में उसका अन्त है।
इसलिए बीमारी का सामना करें। विश्वास के लिए संघर्ष करें। अपनी आँखों को उन अदृश्य बातों पर लगाए रखें और अपने क्षीण होते हुए शरीर में उस अटल आशा को थामे रहें, जो हमें मसीह में मिलती है।
परमेश्वर ने बहुत से सुन्दर फूल बनाए हैं, परन्तु उन सब में सबसे सुन्दर फूल स्वर्ग है, और सभी फूलों का फूल मसीह है। जब हम अपने घर पहुँचेंगे और अपने भाई के सुन्दर राज्य के अधिकार में प्रवेश करेंगे, और जब हमारे सिर अनन्त महिमा के मुकुट का भार धारण करेंगे, और जब हम पीछे मुड़कर अपने दुखों और पीड़ाओं को देखेंगे; तब हम देखेंगे कि जीवन और दुःख, कैदखाने से महिमा तक पहुँचने के लिए उठाए गए एक कदम या डग से भी कम हैं; और यह कि हमारे थोड़े समय के दुःख का छोटा सा अंश स्वर्ग में हमारे घर पहुँचने की पहली रात के स्वागत के योग्य भी नहीं है। (शमूएल रदरफोर्ड, ‘द लवलिनेस ऑफ क्राइस्ट’)
लेखक के बारे में
एण्डी फेण्टन अभी ग्रेस चर्च गिल्डफोर्ड (यूनाइटेड किंगडम) में पास्टर हैं; इससे पहले उन्होंने लंदन में एक कलीसियाओं की स्थापना करने वाले समूह के साथ 20 से अधिक वर्षों तक पास्टर के रूप में सेवा की है। उनका विवाह सारा से हुआ था और वे 26 वर्षों तक एक साथ रहे। विवाहित जीवन के अधिकांश समय में सारा तंत्रिका तंत्र की एक दीर्घकालिक बीमारी “मल्टीपल स्क्लेरोसिस” से जूझती रहीं, और सन् 2023 के दिसम्बर महीने में उनका निधन हो गया। एण्डी के दो बेटे हैं और दोनों ही यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं।
विषयसूची
- भाग I: बीमारी आपकी पहचान नहीं है।
- बीमारी का सामना करना
- विजेता से भी बढ़कर
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: परमेश्वर की महिमा के लिए बीमारी
- जब बीमारी घेर लेती है
- यीशु हमें देखता है
- चंगाई में या सम्भाले रखने में
- अपनी दृष्टि उठाना
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: बीमारी हल्की और क्षण भर की है
- मसीही लोगों के दुःख का विरोधाभास
- जो दिखाई नहीं देता, उस पर दृष्टि लगाए रखना
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: बीमारी का भी एक गीत है
- दाऊद की शिकायत
- परमेश्वर का अटल प्रेम
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग V: बीमारी आनन्द-रहित नहीं है।
- बीमारी से स्वतंत्र आनन्द
- परमेश्वर को स्मरण करना
- हमारे आनन्दित होने को कौन रोकता है?
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में