#87 परमेश्वर में आशा: दुर्बल होते शरीर के साथ बीमारी का सामना करना

By Andy Fenton

परिचय

चाहे बीमारी अल्पकालिक हो या दीर्घकालिक, घातक हो या उपचार के योग्य हो, बीमारी का निदान मिलना और दीर्घकालिक बीमारी के साथ जीवन बिताना थका देने वाला और प्रायः अकेलापन उत्पन्न करने वाला होता है। कुछ दिन ऐसे लगते हैं मानो जीवन की ऑक्सीजन ही बन्द कर दी गई हो; जिसके कारण प्रतिदिन का जीवन असहनीय रूप से भारी लगने लगता है। आशाएँ और सपने टूट जाते हैं। जहाँ कभी भविष्य उज्ज्वल रंगों से चित्रित दिखाई देता था, अब वहीं अन्धकार होने लगता है और धीरे-धीरे जीवन-पटल के प्रत्येक भाग को ढक लेता है।

सारा 28 वर्ष की थी। मैं उस समय सेमिनरी में अध्ययन कर रहा था। हमारे पहले पुत्र का जन्म अभी-अभी हुआ था। फिर, 2002 के अन्त में, वह समाचार मिला जिसने हमारे जीवन को बदल कर रख दिया: जाँच से पता चला कि सारा को मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एम.एस.) है। यह केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) को प्रभावित करने वाली दीर्घकालिक बीमारी है। इक्कीस वर्ष बाद, 22 दिसम्बर 2023 को, सारा ने पीड़ा से भरी अपनी अन्तिम साँस ली और अपने स्वर्गीय घर चली गई।

आरम्भिक वर्षों में तो हम धन्यवादी थे। चिकित्सकों ने उसके विभिन्न लक्षणों का कारण समझ लिया था; केवल अनुमान लगाने की अपेक्षा उत्तर मिल जाना हमें बेहतर लगा। यह हमारी तर्कसंगत सोच थी। परन्तु भावनात्मक रूप से हमारा मन अधिक अन्धकारमय, कम तर्कसंगत और प्रायः स्वयं पर केन्द्रित प्रश्नों से घिरा रहता था: जैसे परमेश्वर बीमारी क्यों आने देता है? यह तंत्रिका रोग कितनी शीघ्रता से बढ़ेगा? क्या हम यात्रा कर पाएँगे? क्या हमारे और भी बच्चे हो सकेंगे? इसका हमारे वैवाहिक जीवन की घनिष्ठता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

यदि आप स्वयं किसी बीमारी का सामना करते हुए यह पुस्तक पढ़ रहे हैं, या किसी बीमार मित्र अथवा परिवार के सदस्य के साथ दृढ़ता से खड़े हैं, या केवल भविष्य में किसी पीड़ित व्यक्ति की और भी अच्छी रीति से सेवा करने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहते हैं—तो आपका धन्यवाद। आप ऐसे लोगों में से हैं जो बहुत कम मिलते हैं। दीर्घकालिक बीमारी से पीड़ित लोगों में तलाक की बढ़ती हुई घटनाओं और उन्हें घेर लेने वाले गहरे अकेलेपन पर ही दृष्टि डालिए। ऐसे समय में विश्वासयोग्य उपस्थिति अत्यन्त बहुमूल्य होती है, परन्तु बहुत कम देखने को मिलती है।

बीमारी का सामना करना

सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती केवल बीमारी का सामना करना है। इसका सामना करने का अर्थ है कि उसे स्वीकार करना और उसे नकारने से इन्कार करना। इसका अर्थ है कि अन्धे आशावाद या सतही मसीही कथनों के पीछे छिपने के बजाय पीड़ादायक वास्तविकता में कदम रखना। हाँ, हम भरोसा रखते हैं कि परमेश्वर भला है और प्रभुता करता है—यह महिमामय सत्य है। परन्तु इन सत्यों को आपके सामने उपस्थित वास्तविकता के प्रति आपको संवेदनहीन न बना दें। अपनी बीमारी का ईमानदारी से सामना करें और यह पहचानें कि आप ऐसा करते समय भी… बीमारी के दौरान परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं।

दुर्बल होते हुए शरीर में

एक समय था जब दर्पण में देखना किसी डरावने सपने जैसा अनुभव नहीं होता था। परन्तु वास्तविकता यह है कि हर दिन हमारे शरीर धीरे-धीरे दुर्बल होते जा रहे हैं। हमारी ताजगी और आकर्षण घटने लगते हैं; जीवन के संघर्षों में तराशे हुए चेहरे की बनावट भी धीरे-धीरे मुरझा जाती है। यदि हम विवाहित हैं, तो यही बात हमारे जीवनसाथी के विषय में भी सत्य है।

हमारे विवाह के दिन, हमने वाचा की प्रतिज्ञाएँ बोली थीं: “बीमारी में और तंदुरुस्ती में,” “अच्छे समय में और बुरे समय में।” उस आनन्दमय दिन पर, बिना गहराई से विचार किए गए ये शब्द सरलता से हमारी जीभ पर आ जाते हैं—और यह ठीक भी है। दम्पतियों को निराशा में उतरने के बजाय प्रेम और आनन्द के मधुर वातावरण का आनन्द लेना चाहिए। परन्तु अन्ततः हममें से प्रत्येक जन जीवन के उन क्षणों तक पहुँचता है जिन्हें “बीमारी में” और “बुरे समय में” रहना कहा जाता है। चाहे हमारा विवाह हुआ हो या नहीं, हम इसे नकारने का प्रयास करते हैं। हम बाहरी आवरण को चमकाने का प्रयास करते हैं। फिर भी, शारीरिक प्राणी होने के नाते, हम सभी ऐसे शरीरों से बंधे हुए हैं जो धीरे-धीरे दुर्बल होते चले जाते हैं।

संघर्ष

बीमारी हमारे शरीर के दुर्बल होने की गति को बढ़ा देती है—परन्तु यह एक ऐसा संघर्ष है जिससे हममें से कोई भी बच नहीं सकता है, और इसके लिए शारीरिक दुर्बलता में भी सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। इसलिए बीमारी का सामना और संघर्ष करें।

दुर्बल होते हुए शरीर में बीमारी और पीड़ा भीतर तक झकझोर देने वाली भयानक होती है। दुःख हमें पूरी तरह से घेर सकता है। इसमें हानि, निराशा और उन अवसरों के छूट जाने की पीड़ा होती है जिन्हें हम प्राप्त नहीं कर सके। यह अन्याय पूर्ण लगता है, विशेषकर ऐसी संस्कृति में जो शारीरिक सामर्थ्य और सौन्दर्य को बहुत अधिक महत्व देती है। इसलिए संघर्ष करें।

जो कुछ आपके पास है, उसके लिए कृतज्ञ रहने का संघर्ष करें, जैसे अपने परिवार, मित्रों, कार्य और सुरक्षा के लिए। चाहे आशीष कितनी ही छोटी क्यों न लगे, उसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए अनुशासित बनें रहें। मैं स्वयं प्रायः ताजा सेके हुए स्कोन पर लगी गाढ़ी मलाई और उत्तम स्ट्रॉबेरी जैम के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। हाँ, मैं ब्रिटिश हूँ, और यह वास्तव में मेरे प्रार्थना-जीवन का एक अनमोल रत्न है।

शारीरिक मनुष्य के रूप में सृजे जाने की गरिमा और सुन्दरता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करें। जब शरीर दुर्बल होने लगता है, तो यह बात सरलता से भुला दी जाती है कि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं। हार मान लेना सहज लगता है—परन्तु ऐसा न करें। हमें अपने शरीरों को मूर्ति बनाकर उनकी उपासना नहीं करनी है, परन्तु परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए लोगों के रूप में (उत्पत्ति 1:27–28), हमें उनकी देखभाल करते हुए उनका प्रबन्ध करने के लिए बुलाया गया है। जब पीड़ाएँ निरन्तर बनी रहती हैं और बाहरी रूप निराश करने लगता है, तब यह कठिन होता है, परन्तु प्रेम के साथ जो कुछ भी आप कर सकते हैं, वह करते रहें।

एक बार यीशु मसीह के जन्म दिवस के दिन, मेरे एक धनी मित्र ने मेरी पत्नी को क्रिश्चियन डायर ब्राण्ड की हाथों पर नमी बनाए रखने वाली क्रीम दी। उसकी सुगंध मनमोहक थी और वह अत्यधिक सुख-विलास देने वाली थी। जब मैंने उसे उसके हाथों पर लगाया, तो उसे लगा कि उसकी देखभाल की जा रही है। उसके शरीर का शेष भाग दुर्बल हो रहा था, परन्तु उस छोटे से कार्य में हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए व्यक्ति के रूप में उसकी गरिमा को बनाए रखा। और शायद वह स्वर्ग में ऐसे सबसे कोमल, गुलाब की सुगंध वाले हाथों के साथ पहुँची होगी, जिसकी कल्पना की जा सकती है।

सबसे बढ़कर, मसीह पर भरोसा बनाए रखने के लिए संघर्ष करें, तब भी जब आपको लगे कि आपकी सामर्थ्य समाप्त हो रही है और आपके प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले हैं। जब यीशु ने क्रूस पर से पुकारा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” तो यह एकमात्र अवसर था जब उसने अपने पिता को “पिता” कहकर संबोधित नहीं किया। उस क्षण उसने परमेश्वर को धर्मी न्यायी के रूप में अनुभव किया। उसने त्यागे जाने की पीड़ा को सहा और पाप के कारण होने वाले परमेश्वर के न्याय का पूरा भार अपने ऊपर उठा लिया। यह ऐसा दुःख था जिसकी हम किसी भी प्रकार से कल्पना नहीं कर सकते हैं। जैसा कि यह प्रिय भजन स्मरण कराता है:

लज्जा और कठोर उपहास सहते हुए,
मेरे स्थान पर वह दोषी ठहराया गया;
अपने लहू से उसने मेरी क्षमा पर मुहर लगा दी;
हल्लिलूय्याह, कैसा उद्धारकर्ता है! (पी. पी. ब्लिस, “दुखी पुरुष”)

जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में, हम कभी भी वह सब सहन नहीं करेंगे जो मसीह ने सहन किया। यह सत्य हमारे दुःखों को महत्वहीन नहीं बनाता, परन्तु उन्हें उचित परिप्रेक्ष्य में देखने में सहायता करता है। साथ ही, यह हमें ऐसे व्यक्ति की ओर मुड़ने का आश्वासन देता है, जिसके पास हम जा सकते हैं:

क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी न हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तो भी निष्पाप निकला। (इब्रानियों 4:15)

जब कोई और नहीं समझता, तब यीशु समझता है। इसलिए अपने ही विचारों में लगातार उलझे रहने से बचें और उसकी ओर मुड़ें। वह जानता है कि आप किस परिस्थिति से होकर गुजर रहे हैं—अर्थात् आपसे भी अधिक अच्छी रीति से जानता है।

आगे छह छोटे बाइबल आधारित मनन दिए गए हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि ये आपको बीमारी का सामना करने और क्षीण होते हुए शरीर में आशा पाने में सहायता करें।

“हे यहोवा पर आशा रखने वालों, हियाव बाँधो और तुम्हारे हृदय दृढ़ रहें!” (भजन संहिता 31:24)

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